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कोरोना से संकट में अफ्रीका

By डॉ नेहा सिन्हा
Updated Date
कोरोना वायरस ने थाईलैंड में ली एक नागरिक की जान.
कोरोना वायरस ने थाईलैंड में ली एक नागरिक की जान.

डॉ नेहा सिन्हा, फेलो, विश्व मामलों की भारतीय परिषद

nsinha.rnc@gmail.com

कोरोना वायरस का प्रसार चीन के बाहर के देशों में होना जारी है, तो यह आशंका वाजिब ही है कि एशिया के बाद अफ्रीका महादेश सबसे बुरी तरह प्रभावित होगा. इसके संक्रमण में बढ़ोतरी की वजह से चीनी अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ा है, जिस वजह से वैश्विक स्तर पर भी आर्थिक गिरावट महसूस की जा रही है. पूरे विश्व में तेल एवं धातुओं की मांग में भी कमी आ गयी है, जो कई अफ्रीकी देशों के लिए प्राणवायु का काम करती है.

इस संदर्भ में यह देखना अहम है कि कोरोना से अपने नागरिकों को बचाने में अफ्रीका कितना सक्षम है. इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जहां चीन में 2,788 लोग काल के गाल में समा चुके, वहीं चीन तथा अन्य देशों को मिलाकर लगभग 80 हजार से अधिक लोग इस गंभीर वायरस से संक्रमित हो चुके हैं.

पिछले कुछ दशकों के दौरान चीन और अफ्रीका के बीच लोगों की आवाजाही बड़ी तेजी से बढ़ी है. यह अनुमान लगाया जाता है कि दो लाख से भी अधिक चीनी श्रमिक अफ्रीका की विभिन्न परियोजनाओं में कार्यरत हैं, जिस वजह से अफ्रीकी देशों तथा चीन के बीच सीधी विमान सेवाओं में 600 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी है. इन चीनी श्रमिकों में से ज्यादातर अफ्रीका के पांच देशों- अंगोला, अल्जीरिया, इथोपिया, नाइजीरिया तथा जांबिया में केंद्रित हैं, जिनकी संख्या इस महादेश में उनकी कुल तादाद की लगभग 60 प्रतिशत है.

अभी लगभग 61 हजार अफ्रीकी छात्र चीन में अध्ययन करते हैं, जिनमें से 46 हजार तो अकेले वुहान में ही हैं, जो इस महामारी का केंद्र है. ऐसे में यह समस्या चीन के साथ-साथ कई अफ्रीकी देशों के लिए चेतावनी बन रही है. नतीजतन, अफ्रीकी राष्ट्र कोरोना वायरस के प्रसार के प्रति खासे संवेदनशील हैं. मिस्र, दक्षिण अफ्रीका एवं अल्जीरिया सबसे अधिक जोखिमवाले राष्ट्रों में शामिल हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के महानिदेशक ने एक कांफ्रेंस में यह कहा है कि अधिकतर अफ्रीकी देशों में स्वास्थ्य देखरेख प्रणाली कमजोर है. इसके अलावा इस महादेश की स्वास्थ्य प्रणालियां इबोला, जिका, मलेरिया, श्वास नली संक्रमण जैसी बीमारियों और वायरसों के संक्रमण की वजह से पहले से ही संकटग्रस्त रही हैं. अब यदि यहां कोरोना का कहर भी आ धमका, तो उसे नियंत्रित कर पाना बेहद मुश्किल होगा.

अफ्रीकी देशों में मिस्र ऐसा पहला देश था, जहां कोरोना वायरस के पहले मामले की पुष्टि हुई. अब अल्जीरिया दूसरा देश है, जो इस फंदे में आ पड़ा है. स्वास्थ्य अधिकारियों की रिपोर्ट के अनुसार, 17 फरवरी, 2020 को एक इतालवी नागरिक वहां आया, जिसकी जांच में उसे इस वायरस से ग्रस्त पाया गया. यह अफ्रीका के उन देशों में पहला मामला है, जो डब्ल्यूएचओ के सदस्य हैं.

इसके पूर्व ही डब्ल्यूएचओ ने अफ्रीका के जिन देशों की पहचान कोरोना संक्रमण प्रवण देशों के रूप में की थी, उनमें अल्जीरिया को इथोपिया, दक्षिण अफ्रीका और नाइजीरिया के साथ ही शामिल कर रखा था, जहां इस वायरस के संक्रमण और उससे बचाव की तैयारियां विशेष रूप से करनी थीं.

इन देशों के चयन का आधार यही था कि इन देशों के लोगों का चीन से प्रत्यक्ष संपर्क और आवागमन रहा है. डब्ल्यूएचओ इन देशों के स्वास्थ्य अधिकारियों की मदद हेतु विशेषज्ञों को भी वहां भेजने की योजना बना रहा है. अफ्रीका में सेनेगल एवं दक्षिण अफ्रीका ऐसे दो ही देश हैं, जहां कोरोना वायरस संक्रमण की प्रयोगशाला जांच की सुविधाएं मौजूद हैं.

सहारा मरुभूमि के दक्षिण में स्थित देशों में नाइजीरिया ऐसा पहला देश है, जहां 28 फरवरी, 2020 को पहले कोरोना संक्रमित मरीज की पहचान पुष्ट हुई. आज अफ्रीकी देशों समेत ऐसे कई विकसित देश हैं, जो आयात-निर्यात समेत अपने व्यापार के लिए चीन पर आश्रित हैं. चूंकि, इस वायरस की वजह से व्यापार पर चोट पहुंच रही है, इसलिए व्यापार विशेषज्ञों, अध्येताओं एवं अर्थशास्त्रियों का यह मानना है कि अब यह महामारी सिर्फ चीन तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि एक वैश्विक चुनौती में बदल गयी है तथा यह पूरे वैश्विक व्यापार पर विपरीत प्रभाव डालेगी.

यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी अफ्रीका की आर्थिक वृद्धि को लेकर अपने पूर्वानुमानों को कम कर दिया है. तेल की कीमतों में कमी के कारण नाइजीरिया से तेल निर्यात में ढाई से दो प्रतिशत की गिरावट आयी है. कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, जांबिया को भी इस वजह से बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि चीन से मांग में कमी आ रही है. इस वर्ष कच्चे तेल, तांबे एवं लोहे की कीमतों में भी गिरावट आयी है. यहां तक कि अफ्रीका के बैंकों ने भी संकट की चेतावनियां देनी शुरू कर दी हैं.

संक्षेप में, हम यह पाते हैं कि कोरोना वायरस के प्रकोप की मानवीय और आर्थिक लागतें बढ़ती हुईं पूरे चीन के साथ ही बाहर के देशों को भी अपनी चपेट में लेती जा रही हैं. चारों ओर जो क्षति पहुंच रही है, उसकी वजह सिर्फ यह वायरस ही नहीं, बल्कि उसके प्रसार को रोकने में प्रयासों की कमी भी है. अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए इस मौके की जरूरत यह है कि वे एकजुट होकर इस दिशा में अत्यंत सकारात्मक और परिपक्व रूप से काम करें.

(ये लेखिका के निजी िवचार है़ं)

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