लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं

Published at :07 Mar 2014 5:44 AM (IST)
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लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावी महापर्व की तिथियों की घोषणा के कुछ घंटे बाद ही भाजपा और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पों की खबरें आना चिंताजनक है. अरविंद केजरीवाल को गुजरात में पुलिस हिरासत में लिये जाने की अपुष्ट खबर के बाद खबर आयी कि केजरीवाल की गाड़ी का […]

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दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावी महापर्व की तिथियों की घोषणा के कुछ घंटे बाद ही भाजपा और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पों की खबरें आना चिंताजनक है. अरविंद केजरीवाल को गुजरात में पुलिस हिरासत में लिये जाने की अपुष्ट खबर के बाद खबर आयी कि केजरीवाल की गाड़ी का शीशा तोड़ा गया है. तब आप के नेता-कार्यकर्ता भाजपा के दिल्ली स्थित राष्ट्रीय कार्यालय पर प्रदर्शन करने पहुंच गये.

यहां दोनों पक्षों में काफी देर तक मारपीट, पत्थरबाजी और तोड़फोड़ हुई. यह सिलसिला लखनऊ और इलाहाबाद भी पहुंचा. इस सिलसिले में भाजपा और आप की ओर से पुलिस और चुनाव आयोग में शिकायतें दर्ज करायी गयी हैं. इस घटनाक्रम को सिर्फ कानूनी नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं होगा. केजरीवाल की गिरफ्तारी की अपुष्ट खबर का फैलना संकेत देता है कि चुनावी माहौल में मतदाताओं को खबरों की विश्वसनीयता के प्रति अधिक चौकस रहने की जरूरत है. आप और भाजपा कार्यकर्ताओं का हिंसक व्यवहार हर लिहाज से निंदनीय है.

राजनीति में टीका-टिप्पणी, निंदा-आलोचना, आरोप-प्रत्यारोप आदि तो एक हद तक बर्दाश्त किये जा सकते हैं, लेकिन किसी भी तरह की हिंसा स्वीकार्य नहीं है. अच्छी बात है कि केजरीवाल ने अपने समर्थकों के व्यवहार के लिए माफी मांगी है और गुजरात पुलिस भी उनके कार पर हुए हमले की जांच कर रही है. उम्मीद है कि दिल्ली पुलिस और चुनाव आयोग जल्दी जांच पूरी कर दिल्ली की घटना के लिए दोषियों को दंडित करेंगे. लोकसभा चुनाव 2014 की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. ऐसे में यह और भी जरूरी है कि हिंसक और हुड़दंगी मनोवृत्तियों को अभी से ही यह संकेत मिल जाये कि चुनाव में कोई बाधा नाकाबिल-ए-बर्दाश्त है.

यह भी समझना होगा कि चुनाव विचारों और नीतियों से लड़ा जाता है, घातक हथियारों और अभद्र भाषा से नहीं. चुनाव के जरिये अगले पांच साल के लिए देश का भविष्य तय होना है. इसमें राजनीतिक दलों को बहस-मुबाहिसे के माध्यम से अपनी बात रखनी चाहिए, हुड़दंग और हंगामे से नहीं. उम्मीद यह भी की जानी चाहिए कि मतदाताओं को बरगलाने और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने की कोई भी कोशिश राजनीतिक दलों को महंगी पड़ेगी.

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