देश को चाहिए नये तरह का जनादेश

।। पुण्य प्रसून वाजपेयी।। (वरिष्ठ पत्रकार) लोकसभा चुनाव 2014 की तारीखों का एलान होने के कुछ घंटे के भीतर दिल्ली से लेकर यूपी और गुजरात तक में भाजपा और आप कार्यकर्ताओं की भिड़ंत हुईं. दिल्ली में भाजपा मुख्यालय के बाहर आप कार्यकर्ताओं के जो तेवर दिखे, वह राजनीतिक दलों के बीच हिंसा या अराजकता भर […]
।। पुण्य प्रसून वाजपेयी।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
लोकसभा चुनाव 2014 की तारीखों का एलान होने के कुछ घंटे के भीतर दिल्ली से लेकर यूपी और गुजरात तक में भाजपा और आप कार्यकर्ताओं की भिड़ंत हुईं. दिल्ली में भाजपा मुख्यालय के बाहर आप कार्यकर्ताओं के जो तेवर दिखे, वह राजनीतिक दलों के बीच हिंसा या अराजकता भर नहीं है. असल में राजनीति की नजर सिर्फ इकोनॉमी पर है, जिस पर कब्जा करने के लिए सत्ता चाहिए. इसी कड़ी में संघ परिवार देख रहा है कि उसके विस्तार के लिए सत्ता उसके राजनीतिक स्वयंसेवक के पास होनी चाहिए.
औद्योगीकरण, ढांचागत विकास, अंधाधुंध शहरीकरण, प्राकृतिक संसाधनों के कॉरपोरेटीकरण से उपजी परिस्थितियों को टटोलने के लिए ही अरविंद केजरीवाल गुजरात गये हैं. मोदी का गुजरात मॉडल वर्तमान में मनमोहन मॉडल को चुनौती दे रहा है या उससे आगे की बात कर रहा है, यह सवाल कॉरपोरेट घरानों के भीतर हो सकता है, राजनेताओं के बीच हो सकता है, लेकिन यह सवाल हाशिये पर खड़े तबके के भीतर नहीं है, जिसकी इसमें जमीन छीनी जा रही है, जो न्यूनतम पाने की लड़ाई लड़ रहा है. इसलिए भाजपा व आप के कार्यकर्ताओं की भिड़ंत के पीछे राजनीति के उस महीन धागे को पकड़ने की जरूरत है कि आखिर वह कौन सी वजह है, जिससे गुजरात मॉडल पर उंगली उठेगी तो भाजपा कार्यकर्ता सहन नहीं करेंगे, जबकि केजरीवाल को थोड़ी देर के लिए भी पुलिस हिरासत में लेगी तो इसे सहन नहीं किया जायेगा.
जरा सोचिए, आखिर वह कौन सी वजह है जिसमें कानून-व्यवस्था एक झटके में राजनीति के आगे नत-मस्तक हो जाती है. यूपी में सपा सरकार है, दिल्ली में राष्ट्रपति शासन है, गुजरात में मोदी शासन है, पर पुलिस ने कहीं कोई पहल नहीं की. इसका एक मतलब साफ है कि राजनीतिक व्यवस्था सिर्फ संस्थानों को अपने दायरे में नहीं ले रही, बल्कि राजनीतिक तौर पर ही पूरे देश को चलाना चाह रही है. इसलिए बड़ा सवाल यह नहीं है कि राजनीति संयम खो रही है या उसमें कहीं सहनशीलता की कमी आ रही है, इससे बड़ी बात यह है कि राजनीतिक सत्ता न सिर्फ हर संस्थान को अपने दायरे में ले रही है, बल्कि मान रही है कि देश को राजनीतिक सत्ता ही चलायेगी और बाकी संस्थान इसके आगे कोई मायने नहीं रखेगा. कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन को सत्ता की राजनीति के दायरे में लिया जा सकता है, योजना आयोग को इसमें रखा जा सकता है. इससे देश में संस्थाओं के जरिये ‘चेक एंड बैलेंस’ की स्थितियां खत्म हो रही हैं. यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है. यही वह चीज है, जो कांग्रेस और भाजपा के साथ-साथ संघ परिवार को भी लालच दे रही है कि तरीका कोई भी हो, उससे अगर दिल्ली की सत्ता मिल सकती है तो उसे हासिल किया जाये, बाकी चीजें बाद में ठीक कर ली जाएंगी. यानी यह लड़ाई किसी भी तरह से सत्ता पाने की है.
हालांकि सरोकार की राजनीति से परिस्थितियां बदली हैं. 2009 के चुनाव से 2014 के चुनाव के बीच करीब दस करोड़ नये वोटर खड़े हो गये हैं. इसे इस रूप में समझा जाये. भाजपा को 2009 में सिर्फ साढ़े आठ करोड़ वोट मिले थे. उससे ज्यादा तादाद में पिछले पांच वर्षो में नये वोटर तैयार हो गये हैं. 2009 में कांग्रेस को करीब साढ़े ग्यारह करोड़ वोट हासिल हुए थे. यह नया वोटर कांग्रेस के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को नहीं समङोगा, जिसे कांग्रेस का गांधी परिवार समझाना चाहता है. नया वोटर मंडल और कमंडल के समीकरण को भी तवज्जो नहीं देगा. उसके सामने ज्यादा बड़ी परिस्थितियां उभर रही हैं. उसे लगता है कि उसके लिए जो कुछ भी होना चाहिए इस देश में, वह होना चाहिए. यानी उसके लिए कांग्रेस या भाजपा की राजनीति और राजनीति के कॉरपोरेटीकरण से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है उसकी अपनी जरूरतें.
चूंकि 2014 के चुनाव एकदम नजदीक है, ऐसे में कांग्रेस की फिसलन और यूपीए के सत्ता में न लौट पाने की संभावनाओं ने यह बतला दिया है कि जो लोगों से ज्यादा बेहतर तरीके से जुड़ कर राजनीति करता है, उसके साथ ही नया वोटबैंक जुड़ सकता है. इसीलिए मोदी को चाय पीने सड़क पर आना पड़ा. राहुल को महिलाओं, खोमचेवालों, रिक्शा वालों, कूलियों से मिलने के लिए सड़क पर आना पड़ा. आप की पूरी राजनीति सड़क पर हो रही है, चाहे वह सरकार में रहे या सरकार से बाहर हो. सरोकार की राजनीति का यह एक नया चेहरा है, जिसमें सड़क पर संघर्ष होगा और सड़क पर ही नीतियां तय होंगी. राजनीति का यह नया चेहरा यदि सड़क पर हिंसा के रूप में भी सामने आ रहा है तो इसलिए कि अस्तित्व की लड़ाई हर कोई लड़ना चाह रहा है.
भारतीय राजनीति में कांग्रेस और भाजपा की पारंपरिक परिस्थितियां एक-दूसरे को संभालती व बचाती रही है. इसका लाभ केजरीवाल ने उठाया है, यह कह कर कि दोनों पार्टियां एक हैं. मतदाता मूकदर्शक है. लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि जिस वक्त मंडल और कमंडल की लड़ाई हुई थी, उसमें मंडल ने कई छत्रपों को भी पैदा किया था, खासकर पूरी हिंदी पट्टी में. देश में करीब 262 सीटें ऐसी हैं, जिसमें कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा सामना नहीं है. इसमें यूपी, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु की ज्यादातर सीटें हैं. यानी 272 का आंकड़ा छूने के लिए दोनों राष्ट्रीय दलों की निजी हैसियत नहीं है. इन्हें अपने गंठबंधन को विस्तार देना होगा. इस विस्तार के समानांतर एक नयी चीज आयी है कि क्या इसमें तीसरे मोरचे की भूमिका राष्ट्रीय दलों के साथ खड़े होकर होगी या तीसरा मोरचा खुद एकजुट होकर नेतृत्व करेगा. तीसरे मोरचे के लिए 11 दलों ने जो एकता दिखायी है, 2009 में उन्हें 92 सीटें मिली थी. यह तादाद समर्थन मांगेगी. वह समर्थन कांग्रेस से मिल सकता है और कांग्रेस इसके संकेत भी दे रही है कि भाजपा को रोकने के लिए वह तीसरे मोरचे को समर्थन दे सकती है. लेकिन तीसरे मोरचे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसकी अगुवाई कौन करेगा.
चुनावी राजनीति पहले विचारधारा से बनती थी. विचारधारा से ही देश की अर्थव्यवस्था की दिशा तय होती थी. युवा किस रास्ते चले, कल्याणकारी योजनाएं किस तरह की होंगी, देश की विदेश नीति कैसी होगी आदि तय होता था. लेकिन अब सत्ता में आने का हर गणित हर राजनीतिक दलों को मंजूर है. खासकर भाजपा और कांग्रेस का गणित साफ है कि किसको जोड़ने से कितनी सीटों का लाभ होगा. ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि किसी एक पार्टी को बहुमत मिलना चाहिए, जबकि यह ऐतिहासिक सच है कि भारत में अलग-अलग राज्यों की जरूरतें अलग-अलग हैं. इसलिए देश का जनादेश ऐसा होना चाहिए, जिसमें लगे कि कहीं कहीं चेक एंड बैलेंस की स्थिति मजबूत हो रही है.
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