एक किसान ऐसा भी

Updated at : 24 Jan 2017 6:38 AM (IST)
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एक किसान ऐसा भी

गिरींद्र नाथ झा ब्लॉगर एवं किसान खेती से विमुख होते जा रहे किसानी समाज में बदलाव की जरूरत है. ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा सुन कर खुश होनेवालों को अब नये नारे गढ़ने होंगे. यदि किसान वक्त के संग कदम बढ़ाता चला गया, तो यकीन मानिये उसी दिन से किसानी की कहानी बदल जायेगी. […]

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गिरींद्र नाथ झा
ब्लॉगर एवं किसान
खेती से विमुख होते जा रहे किसानी समाज में बदलाव की जरूरत है. ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा सुन कर खुश होनेवालों को अब नये नारे गढ़ने होंगे. यदि किसान वक्त के संग कदम बढ़ाता चला गया, तो यकीन मानिये उसी दिन से किसानी की कहानी बदल जायेगी. जीवन की आपाधापी में किसानों को सबसे अधिक समय के साथ कदम मिलाने की जरूरत है.
बिहार के खगड़िया जिला स्थित शीरिनिया गांव की कहानी शायद मुल्क के अन्य गांवों से अलग है. यहां की जीवनशैली अन्य गांवों से साफ अलग है. गांव में हमें कस्बाई खुशबू का एहसास हुआ. मसलन रिहाइशी इलाकों का रोड-मैप, व्यवस्थित स्कूली व्यवस्था, बिजली आपूर्ति, सड़क आदि. लेकिन, इस गांव में जिस चीज ने मुझे सबसे अधिक आकर्षित किया था, वह है- चहारदिवारी. हर घर यहां चहारदिवारी से घिरा मिला. इसी गांव में हमारी मुलाकात एक ऐसे किसान से हुई, जो खेती के संग व्यापार जगत में भी कदम बढ़ा रहा है. गांव घूमते हुए हमारी नजर अच्छी नस्ल के कुछ मवेशियों पर टिकती है. एक युवा, जिसकी उम्र 35 के आसपास होगी, बड़ी जतन से मवेशियों की सेवा कर रहा है. उनका नाम मिलिंद कुमार झा है, जो काॅमर्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन दिनों गांव में बड़े स्तर पर खेती-बाड़ी कर रहे हैं, साथ ही ऑटोमोबाइल क्षेत्र में भी कदम रख चुके हैं. उन्हें मवेशियों से आत्मीय लगाव है.
मैं सोचने लगा कि यदि कोई किसान खेती के साथ ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में भी पांव पसार रहा है, तो यह तो गांव की तस्वीर बदलने के लिए एक मिसाल बन सकता है. मिलिंद एक वाहन कंपनी के ग्रामीण क्षेत्र के डीलर हैं. बाजार के अनुरूप समय के साथ वे कदम बढ़ा रहे हैं, लेकिन इसका अर्थ आप यह कतई न लगायें कि वे किसानी को छोड़े रहे हैं.
मिलिंद ने गांव के रिहाइशी इलाके से पांच-छह किमी की दूरी पर खेती-किसानी का अड्डा बना रखा है. एकदम मनोरम जगह, जहां चिड़ियों की आवाजें, खेत से आती फसलों की सरसराहट और फलों की खुशबू आपको बांध लेगी. खगड़िया जिला के गोगरी प्रखंड स्थित इस इलाके में मिलिंद खेती की नयी तस्वीर पेश कर रहे हैं. वहां गाय-भैंस से लेकर बकरी तक वे तकरीबन 40 मवेशी पाले हुए हैं.
मवेशियों को वे संतान की तरह मानते हैं. हमने वहां कुछ बूढ़ी गायों को देखा, जो अब दूध नहीं देती हैं. हमने जब पूछा कि बहुत जगह तो ऐसी गायों को पशुपालक खुला छोड़ देते हैं, तो इस सवाल पर मिलिंद के उत्तर ने मुझे सोचने के लिए मजबूर कर दिया. मिलंद का जवाब था- ‘यदि मां-बाप और बड़े-बुजुर्ग बूढ़े हो जाते हैं, या कहिये तो काम करने की स्थिति में नहीं होते हैं, तो क्या हम उन्हें घर से निकाल देते हैं?’ मवेशियों के प्रति ऐसा आत्मीय राग सुनाने की जरूरत है.
बड़े स्तर पर आम के पौधे लगानेवाले मिलिंद के लिए आम नकदी फसल है. वे मौसम के अनुरूप खेती करते हैं. अपने व्यस्त व्यावसायिक काम-काज के बीच खेती के लिए वे हर रोज समय निकालते हैं.
मिलिंद का मानना है कि खेती से जुड़े लोगों को रिस्क उठाना चाहिए. समाज को लेकर मिलिंद का सुलझा हुआ नजरिया आकर्षित करता है. वे गांव में बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए कुछ नया करना चाहते हैं. उन्होंने बताया कि वे अपने पिता के जन्मदिन पर किसानों को कुछ खेती से संबंधित सामान जैसे- कुदाल, खुरपी, हंसुआ, हल आदि बाटेंगे. इससे पता चलता है कि गांव के प्रति उनका लगाव कितना गहरा है. बिहार में किसानी के बदलते रंग-रूप की खोज में मुझे ऐसे किसानों से मिलने की ख्वाहिश है. ऐसे लोगों से किसानी समाज को बड़ी उम्मीदें हैं.
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