पाकिस्तान से दूरी बनाते तारिक रहमान, पढ़ें सुबीर भौमिक का आलेख

Updated at : 01 Apr 2026 7:42 PM (IST)
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Tariq Rehman

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान

Bangladesh: बांग्लादेश ने 26 मार्च को नरसंहार दिवस के रूप में मनाया, और प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने 25-26 मार्च, 1971 को पाकिस्तान द्वारा लाखों बांग्लादेशियों की हत्या की निंदा करते हुए उसे नरसंहार का दर्जा दिलाने के बारे में कहा. भारत ने स्वाभाविक ही इसका समर्थन किया. मुख्य विपक्षी दल जमात से अलग दिखने के लिए बीएनपी शायद खुद को 1971 के मुक्तियुद्ध के साथ खड़ा दिखाना चाहती है. इसका अर्थ यह भी है कि नयी सरकार भारत से बेहतर रिश्ता बनाना चाहती है. जबकि पाकिस्तान के लिए यह झटका है, क्योंकि पिछली अंतरिम सरकार के दौर में बांग्लादेश के पाकिस्तान से रिश्ते बेहतर होने लगे थे.

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सुबीर भौमिक, वरिष्ठ पत्रकार

Bangladesh: बांग्लादेश ने विगत 26 मार्च को ‘नरसंहार दिवस’ के रूप में मनाया और नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने इस अवसर पर 1971 में पाकिस्तानी सेना द्वारा किये गये ‘क्रूर और सुनियोजित’ हत्याकांडों की कड़ी आलोचना करते हुए दुनिया का ध्यान इस ओर दिलाते हुए उसे नरसंहार की मान्यता दिलाने की कोशिश की. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने कहा कि स्वतंत्रता प्रेमी बांग्लादेश के इतिहास में 25-26 मार्च, 1971 का दिन ‘सबसे शर्मनाक और क्रूर दिनों’ में से एक था. उन्होंने कहा, “उस अंधेरी रात में पाकिस्तानी कब्जे वाली सेना ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ के नाम पर निहत्थे बांग्लादेशी लोगों के खिलाफ इतिहास के सबसे जघन्य नरसंहारों में से एक को अंजाम दिया था. उन्होंने ढाका विश्वविद्यालय, पिलखाना और राजारबाग पुलिस लाइंस सहित कई जगहों पर शिक्षकों, बुद्धिजीवियों व निर्दोष नागरिकों पर अंधाधुंध गोलियां चलायीं, जिससे अनेक लोग मारे गये थे.”

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री ने 25 मार्च, 1971 की रात से शुरू हुई हत्याओं को ‘पूर्व नियोजित नरसंहार’ बताया और राष्ट्र से शहीदों के बलिदान को याद रखते हुए उन्हें गहरी श्रद्धांजलि देने का आह्वान किया. प्रधानमंत्री रहमान की इन टिप्पणियों ने स्वाभाविक ही पाकिस्तान को आहत किया, जो अगस्त, 2024 में शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के हटने के बाद बांग्लादेश के साथ संबंध सुधारने की कोशिश कर रहा था. दरअसल, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने अपने 18 महीनों के कार्यकाल में पाकिस्तान के साथ संबंधों को काफी हद तक गर्मजोशी दी और उनके कार्यकाल में दोनों तरफ से उच्चस्तरीय कूटनीतिक और सैन्य यात्राएं भी हुईं.

प्रधानमंत्री रहमान द्वारा 1971 की घटनाओं को नरसंहार कहे जाने से आहत होकर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम को ‘जटिल और विभिन्न तरह की व्याख्याओं के लिए खुला’ बताकर मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने एक मीडिया ब्रीफिंग में कहा, “पाकिस्तान 1971 की घटनाओं को जटिल मानता है और विभिन्न व्याख्याओं के लिए खुला समझता है. इस पर रचनात्मक संवाद, आपसी सम्मान और ऐतिहासिक तथ्यों की सटीकता के प्रति साझा प्रतिबद्धता आवश्यक है.”

उन्होंने आगे कहा, “पाकिस्तान बांग्लादेश की जनता के साथ आपसी सम्मान और रचनात्मक सहयोग पर आधारित भविष्य-दृष्टि वाले संबंधों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराता है, जो जन-जन के संबंधों, आर्थिक सहयोग व क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करेंगे”. बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने पाकिस्तान द्वारा किये गये 1971 के नरसंहार को वैश्विक चर्चा में लाने की जो पहल की, उसे भारत की तरफ से स्वाभाविक ही मजबूत समर्थन मिला. विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “हम सभी 1971 में ऑपरेशन सर्चलाइट के दौरान पाकिस्तान द्वारा किये गये भयानक अत्याचारों से अवगत हैं. उस नरसंहार में लाखों निर्दोष बांग्लादेशियों की योजनाबद्ध हत्या और महिलाओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर यौन अपराध शामिल थे”. उन्होंने आगे जोड़ा, “उस अत्याचार के कारण लाखों लोग देश छोड़कर भारत में शरण लेने को मजबूर हुए. उन अत्याचारों ने विश्व की अंतरात्मा को झकझोर दिया, लेकिन पाकिस्तान आज भी उन अपराधों से इनकार करता है.

हम न्याय की मांग में बांग्लादेश का समर्थन करते हैं.” भारत के लिए प्रधानमंत्री रहमान का यह रुख संतोषजनक है, क्योंकि भारत लंबे समय से पाकिस्तान की सेना को दोनों देशों के बीच संबंधों के सामान्यीकरण में सबसे बड़ी बाधा मानता रहा है. नयी दिल्ली इसे इस संकेत के रूप में देख रही है कि बांग्लादेश की रहमान सरकार भारत के साथ संबंध सुधारने की दिशा में आगे बढ़ेगी. कुछ भारतीय अधिकारियों का यह भी मानना है कि बांग्लादेश की नयी सरकार 1971 के मुक्ति संग्राम की भावना को अपनी राजनीति का आधार बनाने की कोशिश कर सकती है. उनका कहना है कि अगर ऐसा होता है, तो ढाका नयी दिल्ली के साथ बेहतर संबंध बनाने की कोशिश करेगा.

गौरतलब है कि 1948 में हुए संयुक्त राष्ट्र नरसंहार सम्मेलन और 1951 में उसके अनुमोदन के बाद अब तक केवल तीन ही नरसंहारों-1975-79 के कंबोडिया में पोल पॉट के शासन के दौरान हुए नरसंहार, 1994 में रवांडा में हुए नरसंहार और 1995 के बोस्निया के स्रेब्रेनिका में हुए नरसंहार को आधिकारिक रूप से मान्यता मिली है, और उन्हें अंजाम देने वालों पर मुकदमे चले हैं. बांग्लादेश लंबे समय से 1971 के नरसंहार को संयुक्त राष्ट्र से मान्यता दिलाने की मांग करता रहा है. वर्ष 2009 में शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद यह मांग और तेज हुई.

शेख हसीना के प्रधानमंत्री काल में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाने वाली एक युवा मंत्री तराना हलीम थीं, जो राजनीति में आने से पहले एक चर्चित अभिनेत्री और वकील थीं. उनका कहना था कि पाकिस्तानी सेना द्वारा अंजाम दिये गये 1971 के नरसंहार को मान्यता देकर संयुक्त राष्ट्र अपनी छवि सुधार सकता है. इस संबंध में उन्होंने तीन मुख्य तर्क दिये थे. पहला तर्क यह था कि मार्च से दिसंबर, 1971 तक पाक सेना और उसके सहयोगियों द्वारा मारे गये लोगों की संख्या संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त अन्य नरसंहारों से कहीं अधिक थी-आठ महीनों में लगभग 30 लाख बंगालियों की हत्या की गयी थी.

वर्ष 1971 का नरसंहार केवल अंधाधुंध हत्याओं तक सीमित नहीं था, बल्कि बुद्धिजीवियों की लक्षित हत्या, लगभग तीन लाख महिलाओं के साथ बलात्कार और व्यापक आगजनी भी उसमें शामिल थी. और तीसरा तर्क यह कि उस नरसंहार को पाकिस्तान की मिलिशिया ने नहीं, बल्कि नियमित सेना ने अंजाम दिया था. फिर भी संयुक्त राष्ट्र ने 1971 के इस नरसंहार को मान्यता क्यों नहीं दी? तराना हलीम के अनुसार, इसका कारण पश्चिमी शक्तियां, विशेषकर अमेरिका है, जो रणनीतिक कारणों से पाकिस्तान की सेना को अपना सहयोगी मानता है.

हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि बांग्लादेश की नयी सरकार इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में कितनी मजबूती से उठायेगी. वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में उसके सामने अन्य चुनौतियां भी हैं, लेकिन अवामी लीग के राजनीतिक परिदृश्य से बाहर होने के बाद बीएनपी खुद को 1971 के मुक्ति संग्राम की विरासत का वाहक बताने की कोशिश कर सकती है, खासकर तब जब उसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी जमात-ए-इस्लामी है, जिसने 1971 में पाकिस्तान की सेना का साथ दिया था. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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