भुगतान संतुलन ही रुपये की कमजोरी का हल है

Author : प्रो अश्विनी महाजन Published by : Rajneesh Anand Updated At : 21 May 2026 11:21 AM

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रुपया

Indian Rupees : आम तौर पर रुपये की स्थिरता के बारे में दो तरह के विचार हैं. एक वर्ग मानता है कि विनिमय दर, बाजार द्वारा निर्धारित एक मूल्य से ज्यादा कुछ नहीं है और यदि मुद्रा का मूल्य गिरता है, तो भी किसी को चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि आयात-निर्यात विनिमय दर के अनुसार अपने आप समायोजित हो जायेंगे.

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Indian Rupees : भारतीय रुपया लंबे समय से कमजोर हो रहा है, पर रुपये के मूल्य में आयी हालिया गिरावट नीति निर्माताओं के लिए चिंता का बड़ा कारण बन गयी है. भले ही, भारतीय रुपये के मूल्य में गिरावट का सीधे तौर पर जिक्र नहीं किया गया, पर यह कोई भी समझ सकता है कि जब 10 मई, 2026 को प्रधानमंत्री ने राष्ट्र से पेट्रोल और डीजल बचाने की अपील की, तो असल में यह नागरिकों से विदेशी मुद्रा बचाकर भारतीय रुपये की रक्षा करने की अपील ही थी. इसी संदर्भ में, प्रधानमंत्री की नागरिकों से सोने की खरीद से बचने, खाना पकाने के तेल की खपत कम करने, विदेशी ब्रांड के सामान न खरीदने और स्वदेशी उत्पादों का उपयोग करने, रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करने और प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ने की अपील का उद्देश्य भी विदेश पर निर्भरता कम करना और कीमती विदेशी मुद्रा बचाना है. यहां ध्यान देने योग्य है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 38 अरब अमेरिकी डॉलर कम होकर 27 फरवरी के 728.5 अरब डॉलर से 12 मई, 2026 तक 690.7 अरब डॉलर पर पहुंच गया.


आम तौर पर रुपये की स्थिरता के बारे में दो तरह के विचार हैं. एक वर्ग मानता है कि विनिमय दर, बाजार द्वारा निर्धारित एक मूल्य से ज्यादा कुछ नहीं है और यदि मुद्रा का मूल्य गिरता है, तो भी किसी को चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि आयात-निर्यात विनिमय दर के अनुसार अपने आप समायोजित हो जायेंगे. उसके अनुसार, घरेलू मुद्रा के मूल्य में गिरावट आयात को हतोत्साहित और निर्यात को प्रोत्साहित कर सकती है. भारतीय रुपये के बारे में, कभी-कभी उसका मानना होता है कि इसका मूल्य जरूरत से ज्यादा है, और इसलिए यदि रिजर्व बैंक रुपये में किसी भी गिरावट को रोकने के लिए हस्तक्षेप करता है, तो इससे अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा, क्योंकि इससे आयात को बढ़ावा मिलेगा और निर्यात हतोत्साहित होगा. दूसरा वर्ग मजबूत रुपये में विश्वास रखता है. उसे लगता है कि केवल मजबूत रुपया ही मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है और विदेशी मुद्रा के बहिर्प्रवाह को नियंत्रण में रख सकता है.


हमें समझना होगा कि सरकार कृत्रिम रूप से विनिमय दर तय नहीं कर सकती और न ही इसे बढ़ाने में मदद कर सकती है. विनिमय दर विदेशी मुद्राओं (जैसे डॉलर) की मांग और आपूर्ति द्वारा तय होती है. जहां विदेशी मुद्रा की मांग वस्तुओं और सेवाओं के आयात, ऋण चुकाने, लाभांश, रॉयल्टी, तकनीकी शुल्क, वेतन और अन्य आय हस्तांतरण के कारण होती है, वहीं विदेशी मुद्रा की आपूर्ति वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के शुद्ध प्रवाह, और विदेशों से प्राप्त विदेशी पोर्टफोलियो निवेश आदि से होती है. यदि सरकार रुपये को मजबूत बनाना चाहती है, तो वह प्रशासनिक रूप से विनिमय दर तय करके कृत्रिम रूप से ऐसा हासिल नहीं कर सकती.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि कभी-कभी भारतीय रिजर्व बैंक बाजार में हस्तक्षेप करता है और बाजार में विदेशी मुद्रा की आपूर्ति बढ़ाकर रुपये में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव को रोकने की कोशिश करता है. पर, यदि चालू खाते पर भुगतान संतुलन में लगातार घाटे के कारण रुपये का मूल्य गिरता है, तो लंबे समय में इस प्रकार के हस्तक्षेप का प्रभाव बहुत सीमित होता है. रुपये के मूल्य को कृत्रिम रूप से बनाये रखने के लिए आरबीआइ को अपने विदेशी मुद्रा भंडार से लगातार अधिक से अधिक डॉलर बाजार में डालने पड़ते हैं. यदि रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करना जारी रखता है, तो यह खतरा बना रहता है कि उसका विदेशी मुद्रा भंडार समाप्त हो सकता है. अतः, रुपये का मूल्य सुधारने के लिए हमें इस घाटे के लिए जिम्मेदार मूल कारणों को ठीक करने की आवश्यकता है.


हाल के वर्षों में भारत में रुपये के मूल्य पर विचार करें, तो हम पाते हैं कि एक अप्रैल, 2024 से 31 मार्च, 2025 के बीच रुपये का मूल्य अपेक्षाकृत स्थिर रहा और इस अवधि के दौरान इसमें मात्र 2.3 प्रतिशत की गिरावट आयी. पर एक अप्रैल, 2025 से अब तक, रुपये का मूल्य 11.7 प्रतिशत गिर गया है. इस दौरान सबसे बड़ी गिरावट 27 फरवरी, 2026 को युद्ध शुरू होने से लेकर 13 मई, 2026 तक के समय में हुई. इस अवधि में रुपये के मूल्य में 4.4 प्रतिशत की गिरावट आयी और यह 91.1 रुपये प्रति डॉलर से 95.5 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गया. रुपये की कीमत में गिरावट का मुख्य कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं, जिससे व्यापार घाटा तेजी से बढ़ रहा है, और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा शेयर बाजारों में भारी बिकवाली भी जारी है.

हालांकि, उम्मीद है कि युद्ध खत्म होने पर रुपया स्थिर हो जायेगा, लेकिन रुपये की समस्या का दीर्घकालिक समाधान देश के भुगतान संतुलन को ठीक करके ही निकाला जा सकता है. वैश्विक संघर्षों, बाधित मूल्य शृंखलाओं और हमारे विदेशी मुद्रा भंडार के खत्म होने के खतरे के कारण लगातार गिरते रुपये की समस्या को देखते हुए तेजी से कदम उठाने होंगे. यदि हम सार्वजनिक परिवहन और इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग करें, सोना खरीदना टाल दें, विदेश यात्रा को कम से कम एक वर्ष के लिए स्थगित कर दें, खाद्य तेल की खपत कम करें, प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ें, तो हम कीमती विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं, और रुपये के मूल्य को बचाने में मदद कर सकते हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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