पीरियड लीव पर सुप्रीम कोर्ट का रुख सही है

Updated at : 31 Mar 2026 11:13 AM (IST)
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supreme court of india

सुप्रीम कोर्ट

Period Leave : अरसे से पीरियड को लेकर बहुत-सी बातें हो रही हैं. पिछले काफी समय से समाज में पीरियड्स से जुड़ी रूढ़ियों को खत्म करने की पहल की जा रही है. जैसे कि 'लेट अस टॉक अबाउट पीरियडस' से संबंधित अभियान-यानी कि हमें पीरियड्स के बारे में बात करनी चाहिए. या कि यह एक जैविक प्रक्रिया है, इसलिए इसमें शर्माना कैसा.

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Period Leave : हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने पीरियड के लिए अनिवार्य रूप से छुट्टी दिये जाने की याचिका खारिज कर दी. शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर हम पीरियड लीव को अनिवार्य कर देंगे, तो कंपनियां स्त्रियों को नौकरी देने से बचेंगी. इससे एक नये तरह का लैंगिक भेदभाव पैदा होगा. शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि सभी पक्षों से बात कर सरकार इस संबंध में कोई नीति बना सकती है. सर्वोच्च न्यायलय के इस फैसले को अगर सराहा गया है, तो इसकी आलोचना भी हुई है. उदाहरण के लिए, पीरियड लीव के पक्ष में यह कहा गया कि पीरियड के दौरान स्त्रियों के काम करने से उनकी कार्यक्षमता कम होती है, क्योंकि उन्हें दर्द से गुजरना पड़ता है. इसी को देखते हुए बहुत से देशों में इस तरह की छुट्टियां दी जाती हैं.


अरसे से पीरियड को लेकर बहुत-सी बातें हो रही हैं. पिछले काफी समय से समाज में पीरियड्स से जुड़ी रूढ़ियों को खत्म करने की पहल की जा रही है. जैसे कि ‘लेट अस टॉक अबाउट पीरियडस’ से संबंधित अभियान-यानी कि हमें पीरियड्स के बारे में बात करनी चाहिए. या कि यह एक जैविक प्रक्रिया है, इसलिए इसमें शर्माना कैसा. साथ ही, घर वालों को इस बारे में लड़कियों को बताना चाहिए. नैपकिन खरीदते हुए शर्माना नहीं चाहिए. यह भी कहा गया कि मेडिकल स्टोर वाले और दुकानदार छिपाकर काले थैलों में नैपकिन क्यों देते हैं? इस मामले में शर्म और चुप्पी ठीक नहीं. लड़कियों, स्त्रियों की साफ-सफाई का ध्यान रखते हुए स्कूलों और कार्यालयों में सेनिटरी नैपकिन या पैड देने की मशीनें लगायी जानी चाहिए. बहुत से स्कूलों, कॉलेजों और दफ्तरों ने अब ऐसा किया भी है. पीरियड्स से जुड़ी रूढ़ियां मिटाने से संबंधित कई तरह की पहल देखने को मिलती है. अक्षय कुमार ने ‘पैडमैन’ नामक फिल्म भी इसी समस्या पर बनायी थी.


अलबत्ता सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है, वह वास्तविकता ही है कि पीरियड लीव महिलाओं के रोजगार के लिए नुकसानदेह होगा. एक समय ऐसा था जब कंपनियां महिलाओं को नौकरी देने से बचती थीं, क्योंकि उनका मानना था कि स्त्रियां आयेंगी, फिर उनका विवाह हो जायेगा, फिर बच्चे होंगे, तो वे छुट्टियां ही लेती रहेंगी. काम कब करेंगी? निजी क्षेत्र की यह सच्चाई भी है कि वहां नौकरी आपके काम से जुड़ी होती है. एक तो वहां साल में ही बहुत कम छुट्टियां मिलती हैं. ऐसे में यदि महीने में स्त्रियों को तीन दिन की अनिवार्य छुट्टी मिलने लगे, तो इन छुट्टियों की संख्या ही छत्तीस हो जायेगी. इसके अलावा बाकी की छुट्टियां तो हैं ही.

इन तीन दिनों के काम का बोझ अन्य कर्मचारियों, यानी पुरुषों पर पड़ेगा और उनमें एक हताशा पैदा होगी कि वेतन तो स्त्री-पुरुष, दोनों का बराबर है, लेकिन छुट्टियां स्त्रियों को ज्यादा मिलती हैं. कुछ साल पहले जब सरकार ने मातृत्व अवकाश को तीन महीने से बढ़ाकर छह महीने का किया था, तब बहुत से उद्योगों के मालिकों ने कहा था कि महिलाओं को नौकरी देना उनके लिए घाटे का सौदा है, क्योंकि छह महीने की छुट्टी हो, तो काम के लिए उन्हें किसी और को रखना पड़ेगा. ऐसे में उन पर दोहरी आर्थिक मार पड़ेगी, क्योंकि मातृत्व अवकाश सवैतनिक ही होता है. इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय का यह आकलन सही जान पड़ता है कि पीरियड लीव को अनिवार्य करने से स्त्रियों के लिए रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं.

देखने की बात यह भी है कि हमारे यहां संगठित क्षेत्र के मुकाबले असंगठित क्षेत्र में बड़ी संख्या में स्त्रियां काम करती हैं. एक अनुमान के अनुसार, इनकी संख्या 15 करोड़ से ऊपर है. इन क्षेत्रों में खेती-किसानी, निर्माण उद्योग, चमड़ा, कपड़ा, घरेलू सहायिकाएं, बाजार के काम आदि शामिल हैं. असंगठित क्षेत्र में काम नहीं, तो वेतन नहीं का नियम काम करता है. इन स्त्रियों को न पीएफ मिलता है, न पेंशन मिलती है. इन्हें छुट्टियां भी नहीं मिलतीं. जिसे आकस्मिक अवकाश कहते हैं कि कोई आपदा आन पड़ी, तो छुट्टी ले ली, असंगठित क्षेत्र में उसके भी पैसे कटते हैं. ऐसे में क्या इन स्त्रियों के बारे में नहीं सोचा जाना चाहिए? ये स्त्रियां घोर अमानवीय स्थितियों में भी काम करने को अभिशप्त होती हैं. क्या ये महिलाएं पीरियड से नहीं गुजरतीं? इस लेखिका ने तो विनिर्माण उद्योग में लगी एक स्त्री को बच्चे को जन्म देने के अगले दिन से ही ईंटें ढोते देखा था.


इसके अलावा, हमारे घरों में जो असंख्य स्त्रियां रहती हैं, उनकी छुट्टियों का क्या? वे तो चौबीस घंटे काम ही काम करती हैं. संगठित क्षेत्र में काम करने वाली स्त्रियों की तरह उन्हें तो कोई साप्ताहिक अवकाश तक नहीं मिलता. क्या वे समस्याग्रस्त नहीं होतीं? एक समय था, जब हमारे घरों में पीरियड्स के दौरान स्त्रियों को काम करने की मनाही थी. तब इसे एक अंधविश्वास की तरह देखा जाता था. जयपुर साहित्य महोत्सव में इस लेखिका ने एक सत्र के दौरान जब यह बात कही, तब मशहूर अभिनेत्री शबाना आजमी का कहना था कि इसका सकारात्मक पक्ष भी देखा जाना चाहिए कि स्त्रियां जब तीन दिन काम नहीं करती थीं, तो इस बहाने उन्हें कुछ आराम मिल जाता था. उनकी इस बात में दम है.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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क्षमा शर्मा

लेखक के बारे में

By क्षमा शर्मा

वरिष्ठ टिप्पणीकार

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