सिर्फ 10 साल की उम्र में नक्सली बन गया था करण उर्फ डांगुर, पूरी कहानी जानें पिता की जुबानी
Published by : KumarVishwat Sen Updated At : 21 May 2026 5:34 PM
रांची में पुलिस के सरेंडर करते नक्सली. फोटो: प्रभात खबर
Naxalite Surrender: सारंडा का कुख्यात नक्सली करण उर्फ डांगुर महज 10 साल की उम्र में नक्सली संगठन से जुड़ गया था. पिता फाड़ तियूर ने बताया कि कैसे बेटे के हाथों में किताबों की जगह बंदूक थमा दी गई और अब उसने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में वापसी की है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.
पश्चिमी सिंहभूम गोइलकेरा संजय पांडेय की रिपोर्ट
Naxalite Surrender: सारंडा का कुख्यात नक्सली करण उर्फ डांगुर ने गुरुवार 21 मई 2026 को रांची में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. उसके सरेंडर के बाद पहली बार उसके पिता फाड़ तियूर ने बेटे के नक्सली बनने और फिर मुख्यधारा में लौटने की कहानी प्रभात खबर से साझा की. पिता के अनुसार, करण महज 10 साल की उम्र में नक्सलियों के संपर्क में आ गया था. जिस उम्र में उसके हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, उस उम्र में उसे बंदूक थमा दी गई.
चौथी-पांचवीं कक्षा में आया नक्सलियों के संपर्क में
करण उर्फ डांगुर पश्चिमी सिंहभूम जिले के सांगा जटा गांव का रहने वाला है. उसके पिता फाड़ तियूर ने बताया कि जब करण चौथी-पांचवीं कक्षा में पढ़ता था, तभी गांव के ही नक्सली सागेन अंगारिया उर्फ श्याम लाल ने उसे बहला-फुसलाकर संगठन से जोड़ दिया. शुरुआत में करण को माओवादी संगठन के मिलिशिया दस्ते में शामिल किया गया. उससे पुलिस की गतिविधियों की जानकारी जुटाने, राशन-पानी की व्यवस्था करने और गांवों में संदेश पहुंचाने का काम कराया जाता था. धीरे-धीरे संगठन में उसकी भूमिका बढ़ती चली गई.
किताब की जगह हाथ में थमा दी गई बंदूक
पिता फाड़ तियूर बताते हैं कि जिस उम्र में बच्चों को स्कूल में पढ़ाई करनी चाहिए, उस समय करण को जंगलों में ट्रेनिंग दी जाने लगी. संगठन ने उसे हथियार चलाने और पुलिस से बचने की तकनीक सिखाई. कुछ समय बाद उसे मिलिशिया सदस्य से एरिया कमिटी मेंबर बना दिया गया. संगठन की ओर से उसे एसएलआर बंदूक भी दी गई. इसके बाद वह सक्रिय रूप से नक्सली गतिविधियों में शामिल हो गया.
लेवी वसूली के दौरान हुआ था गिरफ्तार
फाड़ तियूर ने बताया कि वर्ष 2017 में करण अपने साथियों के साथ गोइलकेरा के डेरवा इलाके में एक ठेकेदार से लेवी वसूलने पहुंचा था. इसी दौरान पुलिस ने चारों ओर से घेराबंदी कर उसे गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने उसके पास से एक देसी पिस्टल, जिंदा गोली और नक्सली पर्चा बरामद किया था. गिरफ्तारी के बाद करण कुछ वर्षों तक जेल में रहा. जेल से बाहर आने के बाद वह घर लौटा, लेकिन कुछ समय बाद फिर से संगठन में शामिल हो गया.
छह महीने में एक बार आता था घर
पिता के अनुसार संगठन में दोबारा शामिल होने के बाद करण कभी-कभी छह महीने में एक बार घर आता था. हाल के दिनों में कोल्हान क्षेत्र में चल रहे नक्सल विरोधी अभियान और माओवादी इजराइल पूर्ति के मारे जाने के बाद परिवार की चिंता बढ़ गई थी. फाड़ तियूर ने बताया कि एक मुठभेड़ के बाद करण घर आया था. उसने खाना खाया और फिर जंगल की ओर चला गया. इस दौरान सुरक्षा बलों ने उसके घर की तलाशी भी ली थी. पुलिस ने उस पर दो लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा था.
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पिता चाहते थे बेटा लौट आए मुख्यधारा में
करण के पिता ने कहा कि अब वे बेटे को जंगल और हिंसा की जिंदगी से बाहर निकालना चाहते थे. उन्होंने करण को आत्मसमर्पण कर सामान्य जीवन जीने की सलाह दी. लगातार सुरक्षा दबाव, परिवार की चिंता और बदलते माहौल के बीच आखिरकार करण उर्फ डांगुर ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला लिया. स्थानीय लोगों का मानना है कि करण की वापसी क्षेत्र के अन्य भटके युवाओं के लिए भी एक बड़ा संदेश है कि हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन अपनाया जा सकता है.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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