कोल्हान के युवक-युवतियों ने क्यों थामा बंदूक? पढ़ें सरेंडर करने वाले नक्सलियों की कहानी
Published by : KumarVishwat Sen Updated At : 21 May 2026 4:03 PM
रांची में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करते नक्सली. फोटो: प्रभात खबर
Naxalite Surrender: सारंडा और कोल्हान क्षेत्र के कई युवक-युवतियां गरीबी, बेरोजगारी और विकास की कमी के कारण नक्सली नेटवर्क से जुड़ गए. सुलेमान हांसदा समेत कई लोगों की कहानी बताती है कि कैसे जंगल क्षेत्रों में नक्सलवाद ने अपनी पकड़ बनाई और अब आत्मसमर्पण से तस्वीर बदल रही है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.
गुवा से संदीप कुमार प्रसाद की रिपोर्ट
Naxalite Surrender: पश्चिमी सिंहभूम जिले का सारंडा और कोल्हान क्षेत्र कभी नक्सली गतिविधियों का बड़ा गढ़ माना जाता था. घने जंगल, दुर्गम पहाड़ियां, सीमित संसाधन और प्रशासनिक पहुंच की कमी ने इस इलाके को लंबे समय तक उग्रवाद प्रभावित बनाए रखा. गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा के कारण कई युवक-युवतियां नक्सली संगठनों के प्रभाव में आ गए. इनमें सुलेमान हांसदा, बासुमती जेराई, रघु कायम, किशोर सिरका, वंदना, बसंती देवगम, सपना कालुंडिया और सुसारी कालुंडिया जैसे नाम शामिल रहे.
सुलेमान हांसदा बना संगठन का सक्रिय सदस्य
सुलेमान हांसदा उर्फ सुनी हांसदा उर्फ चंबरा सारंडा क्षेत्र के लग्जरी गांव का निवासी था. उसके पिता का नाम स्वर्गीय जुनू हांसदा था. जंगल और पहाड़ी इलाकों की अच्छी जानकारी होने के कारण वह धीरे-धीरे नक्सलियों के संपर्क में आया. शुरुआत में उसने संगठन के लिए संदेश पहुंचाने, भोजन और अन्य जरूरतों की व्यवस्था करने का काम किया. बाद में वह हथियारबंद दस्तों के साथ सक्रिय हो गया. पुलिस रिकॉर्ड में उसके खिलाफ लेवी वसूली, नक्सली गतिविधियों और सुरक्षा बलों के खिलाफ कार्रवाई से जुड़े कई मामले दर्ज बताए जाते रहे हैं. गुवा, किरीबुरू, मनोहरपुर और छोटानागरा थाना क्षेत्रों में उसका नाम चर्चा में रहा.
बासुमती जेराई महिला नेटवर्क का हिस्सा बनी
बासुमती जेराई उर्फ बासू उर्फ सरस्वती ग्रामीण महिला नेटवर्क के माध्यम से नक्सली संगठन तक पहुंची थी. उसके पिता का नाम पीयूष जेराई बताया जाता है. संगठन में शामिल होने के बाद वह महिला दस्ते का हिस्सा बन गई. उस पर ग्रामीण क्षेत्रों में बैठक आयोजित कराने, सूचना पहुंचाने और लोगों को संगठन के पक्ष में प्रभावित करने के आरोप लगे. पुलिस के अनुसार सारंडा क्षेत्र के कई थाना क्षेत्रों में उससे जुड़े नक्सली मामलों का रिकॉर्ड मौजूद रहा है.
रघु कायम कम उम्र में आया नक्सली प्रभाव में
रघु कायम उर्फ गुणा के पिता का नाम गोलटा कायम था. बताया जाता है कि वह कम उम्र में ही नक्सली विचारधारा से प्रभावित हो गया था. जंगलों में सक्रिय दस्तों के साथ रहकर उसने संगठन के लिए काम करना शुरू किया. स्थानीय पुलिस को उसकी गतिविधियों की जानकारी मिलने के बाद उसके खिलाफ कई प्राथमिकी दर्ज की गईं. गुवा और मनोहरपुर थाना क्षेत्रों में उसका नाम अक्सर सामने आता रहा.
किशोर सिरका पर कई आरोप
किशोर सिरका उर्फ दुर्गा सिरका आर्थिक तंगी और सीमित अवसरों के कारण नक्सली संगठन से जुड़ा. उसके पिता का नाम स्वर्गीय दिगम सिरका था. संगठन ने उसे प्रशिक्षण देकर सक्रिय सदस्य बनाया. पुलिस के अनुसार उस पर नक्सली बैठकों में शामिल होने, जंगलों में संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लेने और नक्सलियों को सहयोग देने के आरोप थे. उसके खिलाफ भी कई थाना क्षेत्रों में मामले दर्ज बताए जाते रहे हैं.
महिला दस्ते में सक्रिय थीं वंदना और बसंती
वंदना उर्फ शांति के पिता का नाम दातुन कोड़ा था. शुरुआत में उसने नक्सलियों को भोजन, दवा और सूचना उपलब्ध कराई. बाद में वह सक्रिय महिला दस्ते का हिस्सा बन गई. उस पर संगठनात्मक गतिविधियों में शामिल रहने और नक्सलियों की सहायता करने के आरोप लगे. वहीं बसंती देवगम भी ग्रामीण क्षेत्रों में नक्सलियों के प्रचार अभियान से प्रभावित हुई थी. उसके पिता का नाम सिनु देवगम बताया जाता है. संगठन ने उसे गांवों में संपर्क बढ़ाने और सूचनाएं पहुंचाने का काम सौंपा था. पुलिस रिकॉर्ड में उसका नाम नक्सली सहयोगियों की सूची में शामिल बताया जाता रहा.
सपना और सुसारी कालुंडिया की भूमिका
सपना उर्फ शुरु कालुंडिया कम उम्र में ही नक्सली संगठन से जुड़ गई थी. उसके पिता का नाम गोपी कालुंडिया था. महिला दस्ते के साथ जंगलों में रहकर उसने संगठन के लिए काम किया. उस पर रसद पहुंचाने और स्थानीय सहयोग उपलब्ध कराने के आरोप लगे. सुसारी उर्फ दशमा कालुंडिया भी महिला नेटवर्क से जुड़ी रही. ग्रामीण इलाकों में बैठकों और संपर्क अभियान में उसकी भूमिका बताई जाती है. पुलिस ने उस पर भी नक्सली गतिविधियों से जुड़े मामलों में संलिप्तता का आरोप लगाया था.
कैसे फैलता गया नक्सली नेटवर्क
सारंडा और कोल्हान क्षेत्र में लंबे समय तक विकास की कमी नक्सलियों के लिए सबसे बड़ा अवसर बन गई. गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार की स्थिति कमजोर थी. जंगल आधारित जीवन और प्रशासन से दूरी के कारण ग्रामीण खुद को अलग-थलग महसूस करते थे. नक्सली संगठन गांवों में जाकर युवाओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते थे. कुछ लोग डर के कारण संगठन से जुड़े, जबकि कुछ रोजगार और सुरक्षा के लालच में उनके संपर्क में आए. कई युवाओं को सरकारी व्यवस्था के खिलाफ भड़काया गया.
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अब बदल रही है सारंडा की तस्वीर
पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों के लगातार अभियान और सरकार की पुनर्वास नीति के कारण सारंडा क्षेत्र में नक्सली नेटवर्क काफी कमजोर हुआ है. कई उग्रवादी मुठभेड़ों में मारे गए, जबकि बड़ी संख्या में लोगों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला लिया. प्रशासन अब क्षेत्र में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी योजनाओं पर काम कर रहा है. स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर विकास की रफ्तार इसी तरह जारी रही, तो आने वाले समय में सारंडा पूरी तरह शांति और सामान्य जीवन की ओर लौट सकेगा.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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