गुमला में 1990 में हुआ था नक्सलवाद का उदय, 35 साल बाद जिले में छाई शांति
Published by : KumarVishwat Sen Updated At : 21 May 2026 3:40 PM
रांची में सरेंडर करते नक्सली. फोटो: प्रभात खबर
Naxalite Surrender: गुमला में 1990 के दशक में शुरू हुआ नक्सलवाद 35 साल बाद कमजोर पड़ गया है. पुलिस अभियान और आत्मसमर्पण नीति के कारण जेजेएमपी के बड़े नक्सलियों ने सरेंडर किया. अब जिले में शांति और विकास का माहौल लौटता दिखाई दे रहा है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.
गुमला से दुर्जय पासवान की रिपोर्ट
Naxalite Surrender: झारखंड के अंतिम छोर पर स्थित गुमला जिला कभी अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और आदिवासी संस्कृति के लिए पहचाना जाता था. लेकिन 1990 के दशक में नक्सलवाद के उदय ने इस शांत इलाके को हिंसा और दहशत की आग में झोंक दिया. लगभग 35 वर्षों तक गुमला नक्सली गतिविधियों से प्रभावित रहा. अब लगातार सुरक्षा अभियानों, पुलिस कार्रवाई और आत्मसमर्पण नीति के कारण जिले में शांति लौटती दिख रही है.
1990 के दशक में शुरू हुआ नक्सल प्रभाव
गुमला जिले में नक्सलवाद का प्रभाव 1990 के शुरुआती वर्षों में बढ़ना शुरू हुआ. उस समय जिले के कई इलाके विकास से दूर थे. गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और सरकारी योजनाओं की कमी ने ग्रामीणों और आदिवासी युवाओं में असंतोष पैदा किया. नक्सली संगठनों ने इसी असंतोष का फायदा उठाया. जल, जंगल और जमीन के अधिकारों का मुद्दा उठाकर उन्होंने स्थानीय लोगों के बीच अपनी पकड़ मजबूत की. धीरे-धीरे भाकपा माओवादी और अन्य उग्रवादी संगठनों ने गुमला के जंगलों में अपने ठिकाने बना लिए.
जंगल और दुर्गम इलाकों का मिला फायदा
गुमला के बिशुनपुर, चैनपुर और घाघरा जैसे घने जंगल और पहाड़ी इलाके नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाने बन गए थे. पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ और झारखंड के अन्य नक्सल प्रभावित इलाकों से उग्रवादी यहां पहुंचने लगे. स्थानीय युवाओं को संगठन से जोड़ने के लिए उन्हें रोजगार, अधिकार और व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई का सपना दिखाया गया. धीरे-धीरे कई युवक नक्सली संगठनों से जुड़ते चले गए.
झारखंड गठन के बाद बढ़ीं गतिविधियां
साल 2000 में झारखंड राज्य बनने के बाद भी गुमला में नक्सली गतिविधियां कम नहीं हुईं. भाकपा माओवादी के अलावा पीएलएफआई और बाद में झारखंड जन मुक्ति परिषद (जेजेएमपी) जैसे संगठनों ने भी जिले में अपनी पकड़ मजबूत कर ली. इन संगठनों ने पुलिस स्टेशनों, सरकारी भवनों, सड़क निर्माण और विकास कार्यों को निशाना बनाया. लेवी वसूली और हथियारबंद घटनाओं से इलाके में भय का माहौल बना रहा. कई बार सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ भी हुई.
पुलिस अभियान से टूटी नक्सलियों की कमर
पिछले कुछ वर्षों में झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ और अन्य सुरक्षा बलों ने गुमला में लगातार अभियान चलाया. जंगलों में सर्च ऑपरेशन, खुफिया कार्रवाई और आधुनिक तकनीक की मदद से नक्सल नेटवर्क कमजोर किया गया. कई बड़े नक्सली कमांडर मुठभेड़ों में मारे गए, जबकि कई उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला लिया. सरकार की पुनर्वास नीति ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई.
2025 में गुमला हुआ नक्सलमुक्त
लगातार कार्रवाई और नक्सलियों के कमजोर पड़ने के बाद वर्ष 2025 में गुमला जिले को नक्सलमुक्त घोषित कर दिया गया. इसके बाद जिले से सीआरपीएफ की सभी बटालियनों को भी हटा लिया गया. हालांकि कुछ नक्सली अब भी सक्रिय बताए जाते हैं, लेकिन पुलिस का दावा है कि वे भी धीरे-धीरे सरेंडर कर रहे हैं. गुरुवार 21 मई 2026 को रांची में जेजेएमपी के दो बड़े नक्सलियों सचिन बेक और श्रवण गोप ने आत्मसमर्पण किया.
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जेजेएमपी का गुमला से खत्म हुआ प्रभाव
सचिन बेक संगठन में सबजोनल कमांडर था, जबकि श्रवण गोप एरिया कमांडर के रूप में सक्रिय था. दोनों लंबे समय तक पुलिस के लिए चुनौती बने रहे. इनके सरेंडर के बाद पुलिस अधिकारियों का दावा है कि गुमला जिले से जेजेएमपी का पूरी तरह सफाया हो गया है. स्थानीय लोगों का कहना है कि अब जिले में पहले की तुलना में काफी शांति है. सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी योजनाएं गांवों तक पहुंच रही हैं. प्रशासन का मानना है कि विकास और विश्वास के जरिए ही नक्सलवाद जैसी समस्या को स्थायी रूप से खत्म किया जा सकता है.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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