Naxalite Surrender: पुलिस के लिए चुनौती बना रहा 5 लाख का इनामी सुलेमान हांसदा, आर्थिक तंगी में बीता बचपन

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सारंडा के जंगल में नक्सली. फाइल फोटो

Naxalite Surrender: सारंडा क्षेत्र का पांच लाख का इनामी नक्सली सुलेमान हांसदा लंबे समय तक पुलिस के लिए चुनौती बना रहा. आर्थिक तंगी और अशिक्षा के बीच पले सुलेमान का जीवन धीरे-धीरे नक्सली संगठन से जुड़ गया. अब आत्मसमर्पण नीति से क्षेत्र में बदलाव दिख रहा है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.

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गुवा से संदीप गुप्ता की रिपोर्ट

Naxalite Surrender: पश्चिमी सिंहभूम जिले के सारंडा जंगल क्षेत्र में सक्रिय रहे पांच लाख रुपये के इनामी नक्सली सुलेमान हांसदा उर्फ सुनी हांसदा उर्फ चंबरा का नाम लंबे समय तक पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बना रहा. जंगल और पहाड़ी इलाकों की गहरी जानकारी रखने वाला सुलेमान नक्सली संगठन का सक्रिय सदस्य बन गया था. पुलिस रिकॉर्ड में उसका नाम कई नक्सली गतिविधियों से जुड़ा रहा है.

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आर्थिक तंगी और अशिक्षा में बीता बचपन

सुलेमान हांसदा मूल रूप से सारंडा क्षेत्र के लग्जरी गांव का रहने वाला था. उसके पिता का नाम स्वर्गीय जुनू हांसदा था. ग्रामीण और पिछड़े माहौल में पले-बढ़े सुलेमान का बचपन आर्थिक तंगी और अशिक्षा के बीच गुजरा. परिवार की हालत कमजोर होने के कारण उसे बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर नहीं मिल सके. सारंडा और कोल्हान क्षेत्र लंबे समय तक विकास की कमी, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझता रहा है. यही कारण रहा कि यहां के कई युवा धीरे-धीरे नक्सली संगठनों के प्रभाव में आते चले गए. सुलेमान भी इन्हीं परिस्थितियों के बीच नक्सलियों के संपर्क में आया.

छोटे कामों से शुरू हुआ नक्सली सफर

ग्रामीणों के मुताबिक शुरुआत में सुलेमान संगठन के लिए संदेश पहुंचाने, राशन उपलब्ध कराने और जंगल के रास्तों की जानकारी देने जैसे छोटे-छोटे काम करता था. धीरे-धीरे संगठन के नेताओं का भरोसा उस पर बढ़ने लगा और उसे सक्रिय दस्तों के साथ रखा जाने लगा. जंगलों और पहाड़ी रास्तों की अच्छी समझ होने के कारण वह संगठन के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाने लगा. उसने स्थानीय स्तर पर नेटवर्क तैयार करने में भी अहम भूमिका निभाई. समय बीतने के साथ वह हथियारबंद दस्तों के साथ रहने लगा और कई बड़ी नक्सली गतिविधियों में उसका नाम सामने आने लगा.

पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हैं कई मामले

पुलिस के अनुसार सुलेमान हांसदा पर कई नक्सली मामलों में संलिप्तता के आरोप थे. सुरक्षा एजेंसियों के लिए वह लंबे समय तक सिरदर्द बना रहा. उसकी गतिविधियों को देखते हुए सरकार ने उस पर पांच लाख रुपये का इनाम घोषित किया था. सारंडा क्षेत्र में नक्सलियों की मौजूदगी के दौरान सुरक्षा बलों को कई बार कठिन अभियानों का सामना करना पड़ा. पुलिस अधिकारियों का मानना है कि स्थानीय युवाओं को बहकाकर नक्सली संगठन उन्हें अपने साथ जोड़ते थे. रोजगार और शिक्षा की कमी का फायदा उठाकर संगठन ग्रामीण युवाओं को सरकार और प्रशासन के खिलाफ भड़काता था.

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आत्मसमर्पण नीति का दिख रहा असर

हाल के वर्षों में झारखंड सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति का असर नक्सल प्रभावित इलाकों में दिखाई देने लगा है. सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और विकास योजनाओं के कारण कई नक्सली मुख्यधारा में लौट रहे हैं. सुलेमान हांसदा का नाम भी सारंडा क्षेत्र के चर्चित नक्सलियों में गिना जाता रहा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर समय रहते क्षेत्र में शिक्षा, रोजगार और विकास की बेहतर व्यवस्था होती, तो शायद कई युवा नक्सलवाद की राह पर नहीं जाते. अब प्रशासन की कोशिश है कि प्रभावित क्षेत्रों में युवाओं को मुख्यधारा से जोड़कर स्थायी शांति कायम की जाए.

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