सरकार द्वारा निर्धारित सीमा से पार जा सकती है महंगाई

Updated at : 02 Apr 2026 12:01 PM (IST)
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Inflation in india

बाजारों पर महंगाई का असर

Inflation : मुद्रास्फीति को मापने के लिए ऐसी वस्तुएं और सेवाएं चुनी जाती हैं, जो इसकी वृद्धि में सबसे अधिक योगदान देती हैं. इन वस्तुओं को उनके महत्व के आधार पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) में वजन दिया जाता है.

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Inflation : ईरान के अमेरिका-इस्राइल के साथ चल रहे संघर्ष के बावजूद, सरकार ने 25 मार्च को तय किया कि महंगाई की सीमा चार प्रतिशत से दो प्रतिशत अधिक या दो प्रतिशत कम रहेगी. हालांकि, मौजूदा परिदृश्य में इस लक्ष्य को हासिल करना सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के लिए आसान नहीं होगा. बहरहाल, यह अधिसूचना, अर्थात लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (एफआइटी) ढांचा एक अप्रैल, 2026 से 31 मार्च, 2031 तक प्रभावी रहेगा. इस ढांचे की हर पांच वर्षों में समीक्षा की जाती है. पिछली बार इसे मार्च, 2021 से मार्च, 2026 तक के लिए लागू किया गया था. भारत ने भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 में संशोधन के बाद 2016 में एफआइटी ढांचे को अपनाया था. फिलहाल दुनिया के तीन विकसित देशों सहित 26 देशों ने इस व्यवस्था को अपनाया है.


इस संकल्पना में मूल्य स्थिरता को मौद्रिक नीति का प्राथमिक उद्देश्य बताया गया है. इस व्यवस्था के अंतर्गत मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की स्थापना की गयी थी, जिसमें रिजर्व बैंक के तीन अधिकारी और तीन बाहरी सदस्य होते हैं और मौद्रिक नीति की ब्याज दर को मतदान के बहुमत से तय करते हैं. महंगाई का स्तर मांग और आपूर्ति के संतुलन पर निर्भर करता है. जब लोगों के पास अधिक पैसा होता है, तो वे अधिक वस्तुएं खरीदते हैं, जिससे मांग बढ़ती है. यदि आपूर्ति मांग के अनुरूप नहीं है, तो कीमतें बढ़ेंगी. इसके विपरीत, जब मांग कम होती है और आपूर्ति अधिक होती है, तो महंगाई घट जाती है. वर्तमान में युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, जिस कारण भारत में भी पेट्रोल, डीजल, सीएनजी और रसोई गैस की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं. इनकी कीमतों में और वृद्धि हो सकती है, क्योंकि भारत अपनी आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा रूस, इराक, सऊदी अरब, अमेरिका, यूएइ, कतर, रूस, ऑस्ट्रेलिया आदि से आयात करता है.


विदित हो कि सरकार और रिजर्व बैंक ने महंगाई की निर्धारित सीमा को बनाये रखने का निर्णय लिया है, यह मानते हुए कि आधार वर्ष में बदलाव से इस सीमा पर कोई दबाव नहीं पड़ेगा और यह निर्धारित स्तर पर कायम रहेगी. बारह फरवरी से सरकार ने महंगाई का मापन आधार 2012 से बदलकर 2024 कर दिया है. नये आधार वर्ष में कई पुरानी वस्तुओं को उनकी अप्रासंगिकता के कारण हटा दिया गया है, और नयी वस्तुओं को जोड़ा गया है. साथ ही, खाद्य वस्तुओं का भार घटाया गया है और कुछ गैर खाद्य वस्तुओं का भार जोड़ दिया गया है, जिनका आमतौर पर महंगाई पर प्रभाव पड़ता है. इसलिए माना जा रहा है कि लंबे समय तक युद्ध के चलते महंगाई सरकार द्वारा निर्धारित सीमा चार प्रतिशत से दो प्रतिशत अधिक या दो प्रतिशत कम के स्तर पर अक्षुण्ण बनी रहेगी.

मुद्रास्फीति को मापने के लिए ऐसी वस्तुएं और सेवाएं चुनी जाती हैं, जो इसकी वृद्धि में सबसे अधिक योगदान देती हैं. इन वस्तुओं को उनके महत्व के आधार पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) में वजन दिया जाता है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) हर महीने खुदरा महंगाई का आकलन सीपीआइ सूचकांक से करता है, जिसमें वे वस्तुएं और सेवाएं शामिल हैं, जिनका रोजमर्रा के जीवन में अधिक उपयोग होता है. नये आधार वर्ष के अंतर्गत ऐसी वस्तुएं और सेवाएं भी जोड़ी गयी हैं, जिन पर अब लोग अधिक खर्च कर रहे हैं. जैसे, स्मार्टफोन, इंटरनेट, ईयरफोन, फिटनेस बैंड आदि. नेटफ्लिक्स, जियो हॉटस्टार, प्राइम वीडियो जैसी ओटीटी सेवाएं, इ-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, हवाई टिकट, एप आधारित टैक्सी सेवाएं, ऑनलाइन सेवाएं, शॉपिंग की कीमतें, और ग्रामीण इलाकों में मकान के किराये भी अब सूचकांक में शामिल हैं.


अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने के बाद भारत में नायरा एनर्जी ने पेट्रोल की कीमत में पांच रुपये प्रति लीटर और डीजल में तीन रुपये प्रति लीटर की वृद्धि की है. वहीं, होटल-रेस्टोरेंट ग्राहक से सरकारी टैक्स के साथ एलपीजी चार्ज भी वसूल रहे हैं. हालांकि, सरकार ने इस पर रोक लगायी है, पर जमीनी स्तर पर इस रोक का कोई प्रभाव नहीं दिख रहा है. महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10-10 रुपये की कटौती की है. पेट्रोल पर ड्यूटी 13 रुपये प्रति लीटर से घटाकर तीन रुपये कर दी गयी है, जबकि डीजल पर 10 रुपये से शून्य कर दी गयी है. अमेरिका और इस्राइल के साथ ईरान की जंग के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 70 डॉलर से बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गये हैं. इससे तेल कंपनियों को 30 रुपये प्रति लीटर तक घाटा हो रहा है. आमतौर पर जब तेल की कीमत बढ़ती है, तो परिवहन की लागत बढ़ती है, साथ ही वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा होता है.

उल्लेखनीय है कि भारत दैनिक जीवन में इस्तेमाल की जाने वाली कई वस्तुओं का आयात दूसरे देशों से करता है. इसलिए, नये आधार वर्ष में महंगाई की गणना करने वाली वस्तुओं में बदलाव करने के बाद भी महंगाई में अभूतपूर्व इजाफा होने की प्रबल आशंका है और मौजूदा परिदृश्य में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि महंगाई सरकार द्वारा निर्धारित चार प्रतिशत से दो प्रतिशत अधिक या दो प्रतिशत कम के दायरे को आगामी महीनों में पार कर सकती है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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सतीश सिंह

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By सतीश सिंह

सतीश सिंह is a contributor at Prabhat Khabar.

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