अच्छेपन की कैदी लड़कियां

Updated at : 18 Jan 2017 6:25 AM (IST)
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अच्छेपन की कैदी लड़कियां

सुजाता युवा कवि एवं लेखिका मशहूर शायर ‘मजाज लखनवी’ की शायरी में हाजिरजवाबी और प्रगतिशीलता के किस्से हैं. एक बार वे अलीगढ़ मुस्लिम विवि में लड़कियों के बीच शेर पढ़ने के लिए बुलाये गये, तो उनके और लड़कियों के बीच ब्लैकबोर्ड लगा दिया गया. उस वक्त उन्होंने यह गजल पढ़ी- हिजाब-ए-फितनापरवर अब उठा लेती तो […]

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सुजाता
युवा कवि एवं लेखिका
मशहूर शायर ‘मजाज लखनवी’ की शायरी में हाजिरजवाबी और प्रगतिशीलता के किस्से हैं. एक बार वे अलीगढ़ मुस्लिम विवि में लड़कियों के बीच शेर पढ़ने के लिए बुलाये गये, तो उनके और लड़कियों के बीच ब्लैकबोर्ड लगा दिया गया. उस वक्त उन्होंने यह गजल पढ़ी-
हिजाब-ए-फितनापरवर अब उठा लेती तो अच्छा था।
खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था।।
तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन।
तू इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।।
लेकिन, ‘अच्छी लड़किया’ तो कायदों में कैद होती हैं, वे उतना ही तरक्कीपसंद होती हैं, जितना कि घर-परिवार-समाज की जरूरत या ख्वाहिश होती है. अच्छी लड़की मतलब अपनी स्वाभाविक मानवीय इच्छाओं को दबानेवाली. घर से सीधा कॉलेज और कॉलेज से सीधा घर जानेवाली. जो मुखर न हो. बहस न करती हो. कोई मां-बहन की गाली सरेआम दे, तो कान बंद कर नजर झुकाये अपने रास्ते सीधी जाये. यानी शरीफजादियां, जो शाम ढलने से पहले अपने ही भीतर और शाम ढलने के बाद एक चारदीवारी में कैद हो जायें. कभी उन जगहों पर न निकलें, जो सार्वजनिक हैं, लेकिन सिर्फ मर्दों के लिए हैं. वे खुद से कम सोचती हैं. निर्देशों का पालन करती हैं, अपेक्षाएं पूरी करती हैं. फिर अच्छेपन के सर्टिफिकेट इकट्ठे करती हैं. मरते दम तक यह ‘अच्छापन’ न स्त्री से छूटता है, न उससे जुड़ी तमाम बातों से.
इस अच्छेपन की कीमत चुकाने के लिए वे छोटी-से-छोटी जरूरत और बड़ी-से-बड़ी ख्वाहिश का त्याग कर सकती हैं. उन्हें ऐसा ही बनाया जाता है और बदले में उन्हें एक सुरक्षित सामाजिक जीवन मिलता है. इन अलिखित नियमों का पालन न करने पर ही वे हादसों की शिकार होती हैं, ऐसा हम मानते आये हैं. गलत या सही- यह अब लड़कियों को तय करना है और वे कर भी रही हैं.
‘अच्छी लड़की’ वाले इमेज में लड़कियां ही नहीं, उनके कॉलेज भी कैद होते हैं. देश के अलग-अलग कॉलेजों, विश्वविद्यालयों से कभी मोबाइल, कभी जींस, कभी पुस्तकालय के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाये जाने की खबरें आती रही हैं. हाल ही में दिल्ली के एक प्रतिष्ठित महिला कॉलेज की नॉन कॉलेजिएट छात्राओं के लिए प्रधानाचार्य की ओर से यह फरमान जारी हुआ कि लड़कियां कॉलेज परिसर में न सेल्फी लेंगी और न बाल बनायेंगी, क्योंकि यह समय का दुरुपयोग है और कॉलेज की जो सेल्फी वे अपनी फेसबुक वॉल पर लगाती हैं, उनसे बाहर यह संदेश जाता है कि इस कॉलेज में गंभीर पढ़ाई नहीं होती. इसके लिए लड़कियों को सस्पेंड किया जा सकता है.
किसी कॉलेज को यह चिंता होनी ही क्यों चाहिए? इसलिए कि ‘फूल और कांटे’ जैसी फिल्मों से जो छवि कॉलेजों की बनती है, उसके चलते ‘अच्छे घरों’ की लड़कियों के माता-पिता अपनी बेटियों को सह-शिक्षा से बचाना चाहते हैं. शायद यह भी कि इतनी आजादी जो समाज के मानकों पर लड़कियों को नहीं मिलनी चाहिए, अगर एक कॉलेज वह देगा, तो अपनी ‘अच्छी’ छवि से हाथ धो बैठेगा.
अच्छा कॉलेज इमेज की यह चिंता दरअसल एक सामंती पिता की चिंता है, जो वक्त के हिसाब से इतना तो बदला है कि बेटियों की पढ़ाई को लेकर बेहद गंभीर है, लेकिन आजादी मिलने पर लड़कियों के चाल-चलन को लेकर और भी ज्यादा चिंतित है कि कहीं मोहल्ले में कोई यह न कह दे कि आपकी लड़की रास्ते में आइसक्रीम खा रही थी और बाल लहरा कर जोर-जोर से हंस रही थी. यह आजादी और समय का दुरुपयोग है.
यही स्थिति महिला छात्रावासों की भी है. शाम को साढ़े छह बजे या सात बजे लड़कियों को लौटना होता है, वर्ना उन्हें लिखित में एक लंबा स्पष्टीकरण देना होता है और अभिभावकों को भी सूचित किया जाता है- देख लीजिये, जिसे आप पढ़ने भेजे हैं, वह गुलछर्रे उड़ा रही है.
संभालिए! यह पूरे समाज का कर्तव्य है कि वह लड़की के चाल-चलन की रक्षा करे. लेकिन, बलात्कारियों और असामाजिक तत्वों को नियंत्रित कर सकने की जिम्मेवारी किसी की नहीं है. दिल्ली की छात्राओं का ‘पिंजरा तोड़’ आंदोलन इसी कॉलेज हॉस्टल्स की तानाशाही और समाज की दकियानूसी सोच के खिलाफ लगातार खड़ा है.
जम्मू-कश्मीर की श्री मातावैष्णों देवी यूनिवर्सिटी, जयपुर में मनिपाल यूनिवर्सिटी, पंजाब यूनिवर्सिटी की छात्राएं लगातार इस आंदोलन से जुड़ रही हैं. उनके फेसबुक पेज पर उनकी आपबीती पढ़िये. लगातार की सीसीटीवी निगरानी, सुरक्षागार्डों से बहस, गेटपास, सस्पेंड किया जाना, सात बजे कमरों में कैद हो जाना, अटेंडेंस लिया जाना, ऐसे अनुशासन हैं, जिन्हें हॉस्टल में लड़कों को नहीं भुगतना होता.
उच्च शिक्षा संस्थानों में जो आजाद खयाल होने का, आजादी से जीने का सपना लेकर लड़कियां आती हैं, वही फीस चुकाती हैं, जो लड़के चुकाते हैं. लेकिन, फिर भी उन्हें पिंजरे में कैद होना होता है, क्योंकि उनके पास एक ऐसा अंग है, जिसकी वजह से उन्हें कमतर मनुष्य होने का एहसास लगातार कराया जाता है. सिर्फ हॉस्टल ही नहीं, कॉलेज परिसर के आस-पास जिन लोगों ने अपने ही घरों में पीजी खोले हैं, उनका व्यवहार भी इसी सोच से संचालित है.
जहां लड़कियां रहती हैं, वह आम का बगीचा तो नहीं कि कांटों वाली तार उसके गिर्द इसलिए लपेटीजाये कि कोई लूट न ले. और कुछ नहीं बदलता, न बलात्कार थमते हैं, न अत्याचार. हां, उन कांटों से लड़कियों का व्यक्तित्व जरूर घायल होता है.
क्या हम वाकई लड़कियों को कैद कर, उन्हें लबादों में ढक कर, हाथ-पैर-दिमाग बांध कर उनकी उन्नति चाह रहे हैं? या उनके हाथ में चाकू पकड़ा कर अपनी जिम्मेवारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं. दिल्ली विवि की एक प्रोफेसर के साथ सुबह-सुबह पेट्रोल पंप पर एक शोहदा बेहूदगी करता है और आस-पास लोग चुपचाप यह सब देखते रहते हैं. इससे एकदम यह इच्छा जाहिर नहीं होती कि हम सड़कों, गलियों, स्कूलों, हॉस्टलों, संस्थानों को लैंगिक असमानता से मुक्त करना चाहते हैं. हम लक्षणों का इलाज कर रहे हैं. जो बीमार नहीं हैं, हम उन्हें कड़वी दवा दे रहे हैं.
खुद की आजादियों की नन्हीं इच्छाओं को दबा कर व्यक्तित्व में कुंठाएं ही पनपती हैं. हम यूजीसी के सामने बोर्ड पर लिखा पढ़ते हैं- ‘सा विद्या या विमुक्तये’ यानी शिक्षा वही है जो आपको मानसिक जकड़बंदियों से आजाद करती है. लेकिन, लड़कियां अपनी ही पहरेदारी पर बैठा दी गयी हैं. अपना दमन आप ही करते हुए मुक्त जीवन और मुक्त सोच की कामना कैसे हो सकती है!
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