मशहूर होने की बढ़ती ललक

Updated at : 12 Jan 2017 6:18 AM (IST)
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मशहूर होने की बढ़ती ललक

प्रभात रंजन कथाकार प्रसिद्ध अमेरिकी कलाकार एंडी वारहोल की एक उक्ति है- ‘भविष्य में हर कोई 15 मिनट के लिए विश्व प्रसिद्ध हो जायेगा.’ मीडिया, खास कर सोशल मीडिया के युग में यह कथन चरितार्थ होता हुआ लगता है. हाल में ही एक लड़के ने यू-ट्यूब पर कुछ वीडियो डाला, जिसे लाखों लोगों ने देखा. […]

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प्रभात रंजन

कथाकार

प्रसिद्ध अमेरिकी कलाकार एंडी वारहोल की एक उक्ति है- ‘भविष्य में हर कोई 15 मिनट के लिए विश्व प्रसिद्ध हो जायेगा.’ मीडिया, खास कर सोशल मीडिया के युग में यह कथन चरितार्थ होता हुआ लगता है. हाल में ही एक लड़के ने यू-ट्यूब पर कुछ वीडियो डाला, जिसे लाखों लोगों ने देखा.

अनेक टेलीविजन चैनलों ने इसे खबर बनाया. अखबारों ने कई-कई कॉलम की रपटें छापी. उन वीडियो में वह लड़का राह चलते किसी लड़की को ‘किस’ करके भाग जाता था. जाहिर है, उसका कोई दोस्त वीडियो बना लेता होगा. उसके बाद वीडियो को वह अपने यू-ट्यूब चैनल पर अपलोड कर देता था. देखते-देखते सुमित नाम का वह लड़का मशहूर हो गया. मुझे बचपन में पढ़ी यशपाल की कहानी ‘अखबार में नाम’ याद आ गयी.

यह समाज की नयी परिघटना है. एक जमाना था, जब लोग मशहूर हस्ती बनना चाहते थे. मेहनत से ऐसा मुकाम बनाना चाहते थे, जिससे उनकी प्रतिष्ठा हो. जब हम स्कूल में पढ़ते थे, तो अक्सर बच्चे मुंबई भाग जाते थे, फिल्मों में अभिनेता बन कर नाम कमाने के लिए.

दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने आये, तो हॉस्टल में रहनेवाले लड़कों का कमोबेश एक ही सपना होता था- आइएएस बन कर गणमान्य लोगों की जमात में शामिल हो जाना. मुझे मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कुरु कुरु स्वाहा’ का नायक याद आता है, 1960 के दशक में जिसका एक ही सपना था, चार अंकोंवाली सैलरी कमाना और एक ठो इंपाला कार बनाना. सामाजिक संरचना में ऊपर की तरफ जाने का सपना कोई बुरी चीज नहीं है, महत्वाकांक्षा का होना, कोई बुरी बात नहीं है. लेकिन, आज किसी तरह से मशहूर होने की ललक बहुत तेजी से बढ़ी है. उसके लिए अपेक्षित मेहनत करने से सब बचना चाहते हैं.

सोशल मीडिया के अनेक माध्यमों ने आज युवाओं के सामने अपनी प्रतिभा को रखने और उसकी बदौलत प्रसिद्धि पाने के अनेक अवसर सुलभ करवा दिये हैं. ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि यू-ट्यूब वीडियो के माध्यम से किसी युवा को रातों-रात प्रसिद्धि मिली, उसके कारण काम मिले. या ब्लॉग, वेबसाइट पर लिख कर कोई युवा बड़े प्रकाशकों की नजर में आया, उसकी किताब प्रकाशित हो गयी. अस्सी-नब्बे के दशक में जब मेरी पीढ़ी बड़ी हो रही थी, तो हम जिस क्षेत्र में बढ़ना चाहते थे, उसमें किसी गुरु को पकड़ना पड़ता था. उस जमाने में इसके बिना आगे बढ़ पाना लगभग असंभव माना जाता था.

आज कम-से-कम सोशल मीडिया के कारण युवाओं में यह आत्मविश्वास पैदा हुआ है कि अगर उसमें रचनात्मकता होगी, उसकी प्रतिभा में दम होगा, तो वह अपने दम पर अपनी पहचान, मुकाम बना सकता है, बनाता भी है. लेकिन, मैं दूसरी तरह की प्रवृत्ति की चर्चा कर रहा हूं.

सोशल मीडिया की साइट ट्विटर को लेकर आजकल एक नया शब्द प्रचलन में आया है- ट्रोल करना. यानी ट्विटर पर किसी मशहूर शख्सियत के ट्वीट करते ही, उसके बारे में नकारात्मक बातें धड़ाधड़ लिखना. हैरानी की बात यह है कि इस तरह की प्रजाति, जिसको ट्रोलर कहा जाता है उनके भी लाखों फॉलोवर होते हैं. यानी उनकी प्रसिद्धि में भी किसी तरह की कमी नहीं होती. कई बार उस मशहूर शख्सियत से अधिक चर्चा ट्रोल करनेवाले की टिप्पणियों की होने लगती है.

यह एक ऐसा दौर है, जिसमें सही और गलत के पैमाने गड्डमड्ड होते जा रहे हैं. सफलता ही एकमात्र पैमाना रह गया है. उसके लिए साधन जो भी अपनाये जायें. एक पुरानी कहावत याद आ रही है- बदनाम होंगे, तो क्या नाम न होगा!

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