जीडीपी पर बहस

Updated at : 09 Jan 2017 12:17 AM (IST)
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जीडीपी पर बहस

आर्थिक नीतियां और योजनाएं बनाने की प्रक्रिया में सरकार मौजूदा स्थिति के आधार पर संभावित परिणामों का आकलन करती है. सरकार ने अनुमान लगाया है कि चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) की वृद्धि दर 7.1 फीसदी रह सकती है. आम तौर पर बजट से पहले यह आंकड़ा सात फरवरी को जारी होता […]

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आर्थिक नीतियां और योजनाएं बनाने की प्रक्रिया में सरकार मौजूदा स्थिति के आधार पर संभावित परिणामों का आकलन करती है. सरकार ने अनुमान लगाया है कि चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) की वृद्धि दर 7.1 फीसदी रह सकती है. आम तौर पर बजट से पहले यह आंकड़ा सात फरवरी को जारी होता था, पर इस साल बजट एक फरवरी को पेश करने के फैसले के कारण अग्रिम आकलन भी एक महीना पहले घोषित किया गया है.
विभिन्न रेटिंग एजेंसियों और दलों ने इस आकलन पर सवाल उठाया है क्योंकि इसका हिसाब करते समय नोटबंदी के बाद की स्थिति का संज्ञान नहीं लिया गया है. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कई अर्थशास्त्रियों के साथ सरकार का मानना है कि नोटबंदी के कारण आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है. ऐसे में 7.1 फीसदी के अनुमान के आधार पर बजट पेश करने को लेकर अनिश्चितता स्वाभाविक है.
अक्तूबर तक के आर्थिक गतिविधियों के आधार पर सरकार और रिजर्व बैंक के अनुमान एशियन डेवलपमेंट बैंक और रेटिंग एजेंसियों के आकलन से अधिक हैं. नोटबंदी के साथ डॉलर की कीमत बढ़ने तथा पूंजी के पलायन जैसे कारक भी नकारात्मक असर डाल सकते हैं. ऐसे में वास्तविक दर के बारे में निश्चित नहीं हुआ जा सकता है. सरकार का यह दावा ठीक है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की बुनियाद ठोस है और तमाम अड़चनों के बावजूद वृद्धि दर दुनिया में सबसे अधिक बनी हुई है, लेकिन घरेलू और वैश्विक कारकों को फिलहाल नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा. उम्मीद की जानी चाहिए कि बजट में वास्तविक स्थिति के आधार पर निर्णय लिये जायेंगे. यह भी आशा है कि नोटबंदी से जुड़े आंकड़े भी जल्दी ही सामने आ जायेंगे. तब एक व्यावहारिक आकलन कर पाना सुगम हो जायेगा.
विकास दर और अर्थव्यवस्था के समुचित आंकड़े और सूचनाएं सामने आने से निवेशकों, उद्योग जगत और वित्तीय संस्थाओं के भरोसे को बढ़ाने में मदद मिलेगी. राजनीतिक और आर्थिक कारकों के कारण इस साल वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल बरकरार रहने की आशंका है. इस माहौल में विकास और कल्याण योजनाओं के विस्तार के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाये रखने की जरूरत है
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