आखिरकार नेपाल की नयी सरकार

।। पुष्परंजन।। (ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक) सुशील कोइराला बुधवार को दस बजे सुबह नेपाल के 37वें प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते, उससे एक दिन पहले मंगलवार को ही उन्होंने यह काम पूरा कर लिया. शपथ की इतनी हड़बड़ी क्यों? इस प्रश्न का उत्तर ‘पावर कॉरिडोर’ में चल रही उठापटक है. ‘शहर बसा नहीं […]
।। पुष्परंजन।।
(ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक)
सुशील कोइराला बुधवार को दस बजे सुबह नेपाल के 37वें प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते, उससे एक दिन पहले मंगलवार को ही उन्होंने यह काम पूरा कर लिया. शपथ की इतनी हड़बड़ी क्यों? इस प्रश्न का उत्तर ‘पावर कॉरिडोर’ में चल रही उठापटक है. ‘शहर बसा नहीं कि मांगनेवाले आ गये’, यह हाल अभी से मंत्रिपद को लेकर हो रहा है. नेपाली कांग्रेस की गठबंधन सरकार में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी (नेकपा-एमाले) को गृहमंत्री का पद चाहिए. कारण आनेवाला स्थानीय चुनाव है, जो नेपाल की सत्ता को जमीनी रूप से मजबूत करता है. इसे ध्यान में रख कर सुशील प्रधानमंत्री के साथ गृहमंत्री का पद अपने पास रखना चाहते हैं.
नेकपा-एमाले के उप सभापति वामदेव गौतम उप प्रधानमंत्री का पद संभाल लेते हैं, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि गठबंधन सरकार की गाड़ी पर बाकी सब सवार हो रहे हैं. एमाले के वार्ताकार, विष्णु पौडेल बताते हैं, ‘पहले यह बात हुई थी कि कॉमरेड वामदेव गौतम को उप प्रधानमंत्री के साथ-साथ गृहमंत्री का पद भी दिया जायेगा, मगर ऐसा हो नहीं रहा है.’ एमाले से सूचना-प्रसारण, सामान्य प्रशासन, पर्यटन व नागरिक उड्डयन, स्वास्थ्य व जनसंख्या, श्रम, भूमि सुधार, शिक्षा, वन व कृषि, युवा-खेल, विज्ञान-तकनीक, महिला, बाल व समाज कल्याण मंत्रलयों को देने का वादा किया गया है. एमाले के कुछ नेताओं को लगता है कि मलाई वाले सारे मंत्रलय नेपाली कांग्रेस अपने पास रखना चाहती है. प्रतिरक्षा, विदेश, स्थानीय विकास, वित्त, ऊर्जा, सिंचाई, कानून, शांति व पुनर्निर्माण, उद्योग, ‘फिजीकल प्लानिंग व इंफ्रास्ट्रर’, ऐसे ताकतवर मंत्रलय हैं, जिनसे सरकार में रहनेवाले सबसे अधिक लाभ प्राप्त करते हैं. एमाले में मंथन आरंभ है कि मंत्रलय बंटवारे में उनके साथ छल हुआ है. लेकिन यदि एमाले को भविष्य में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व सदन में सभापति का पद चाहिए, तो इन पदों के लिए कु़र्बानियां तो देनी पड़ेंगी.
यों नेकपा-एमाले इस समय गुटबाजी की शिकार है. हाल ही में एमाले संसदीय दल के नेता के निर्वाचन में यह दृश्य देखने को मिला, जब केपी शर्मा ओली 98 मतों से इस पद के लिए चुने गये और पार्टी अध्यक्ष झलनाथ खनाल 75 वोट से पराजित हो गये. संविधान सभा में नेकपा-एमाले के 173 सभासद चुन कर गये हैं. इस समय एमाले के उपाध्यक्ष द्वय वामदेव गौतम और विद्या भंडारी, महासचिव-ईश्वर पोखरेल, सचिव-विष्णु पौडेल, शंकर पोखरेल व वरिष्ठ नेता सुभाष नेम्वांग, प्रदीप ज्ञावाली के फैसले सिर-आंखों पर हैं. क्या ढाई महीने बाद नेकपा-एमाले के नौवें महाधिवेशन में केपी शर्मा ओली को पार्टी प्रमुख बनाने की तैयारी चल रही है, तब पार्टी अध्यक्ष झलनाथ खनाल क्या हाशिये पर चले जायेंगे? इस प्रश्न पर बहस जारी है. संभव है कि झलनाथ के मित्र, माधव नेपाल भी एमाले अध्यक्ष के लिए किस्मत आजमायें, और ‘एक व्यक्ति-एक पद’ का कार्ड खेला जाये. नेकपा-एमाले ‘परिवर्तन’ के दौर से गुजर रहा है. लेकिन यह बात मान लेनी चाहिए कि इस समय नेकपा-एमाले के अंदरूनी अंतर्विरोध का लाभ, नेपाली कांग्रेस आलाकमान उठा रहा है.
खैर, एमाले से सात बिंदुओं पर सत्ता साझा करने के साथ, प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने नेपाल की जनता से बारह मुद्दों पर प्रतिबद्धता व्यक्त की है. उनमें-छह महीने के भीतर स्थानीय निकाय चुनाव कराने, बंद, चक्का जाम, हड़ताल को निरुत्साहित करने, महंगाई नियंत्रित करने, एक साल के भीतर ‘संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्रत्मक संविधान’ निर्माण, और उसके बाद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व स्पीकर के पदों का निर्वाचन, प्राथमिकता वाले विषय हैं. राष्ट्रपति के चुनाव से पहले नये संविधान का बनना आवश्यक है. राष्ट्रपति पद को 2008 से नेपाली कांग्रेस के नेता व पूर्व स्वास्थ्य मंत्री राम वरण यादव और उपराष्ट्रपति पद को ‘मधेसी जनाधिकार फोरम’ के नेता और जज रह चुके परमानंद झा संभाल रहे हैं. प्रश्न यह है कि क्या किसी ‘पार्टी-पॉलिटिक्स’ के तहत इन संवैधानिक पदों पर नेताओं को बिठाया जाना चाहिए? फिर तो लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं रह जाता. लेकिन नेपाल के सत्ताधारी नेता अब इस संदर्भ में भारत, पाक और दक्षिण एशिया के दूसरे देशों का उदाहरण देने लगे हैं. जब तक संविधान नहीं बन जाता, राम वरण यादव ‘अंतरिम राष्ट्रपति’ बने रहेंगे. अच्छा मजाक है!
सुशील कोइराला को इस समय 571 निर्वाचित सांसदों में से दो तिहाई का समर्थन प्राप्त है. हफ्ते भर के भीतर गठबंधन को ‘कॉमन मिनिमम पॉलिसी व प्रोग्राम’ तैयार कर लेना है. इसलिए जो वह करना चाहते हैं, उसमें उन्हें तनिक भी देर नहीं लगानी चाहिए. कोइराला के पक्ष में 405 सांसदों ने वोट दिये. माओवादी, राजा समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी और तराई के सांसदों समेत 148 ‘सीए’ सदस्यों ने उनके खिलाफ वोट डाले थे. यदि अगले बारह माह सदन में गठबंधन की यही ताकत बनी रही, तो उन सारे लक्ष्यों को प्राप्त करना संभव है, जिसकी आस पिछले पांच वर्षो से नेपाल की जनता लगाये बैठी है. बहुत संभव है कि इन लक्ष्यों की प्राप्ति में माओवादी, मधेस पार्टियां, दरबार समर्थक और दूसरे दल अड़ंगे लगायें. छोटा उदाहरण अभी ही दे देते हैं- शपथ ग्रहण के लिए सरकार की ओर से सदन में ‘दाउरा-सुरवाल’ (चुस्त पायजामा और कुर्ता) पहन कर आने का फरमान जारी हुआ. यह सुनते ही तराई के नेताओं को नेपाली कांग्रेस के खिलाफ भड़कने का अवसर मिल गया. तराई के नेता लंबे समय से नेपाल का राष्ट्रीय पोशाक ‘दाउरा-सुरवाल और टोपी’ के अलावा ‘धोती’ की मांग करते रहे हैं. वे 2008 के बाद सदन में धड़ल्ले से धोती-कुर्ता पहन कर आने भी लगे थे. पर इस बार ‘धोती’ के सवाल को ज्यादा ही तूल दिया गया. संभव है कि संविधान निर्माण के दौरान तराई, ‘चुरे-भांवर’ (मध्य पहाड़) के क्षत्रप अपनी-अपनी मांगों को लेकर अड़ंगेबाजी आरंभ कर दें.
नेपाली नेताओं के लिए यह राहत की खबर है कि खिलराज रेग्मी ने प्रधान न्यायाधीश के पद से इस्तीफा देना तय कर लिया. जस्टिस रेग्मी देश के पहले कार्यवाहक प्रधानमंत्री थे, जो लगभग साल भर से एक साथ दो पद संभाल रहे थे. न्यायमूर्ति रेग्मी को राजनीति का अनुभव नहीं था. उन्हीं की तरह, सुशील कोइराला देश के पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें इससे पहले मंत्री तक का अनुभव हासिल नहीं रहा है. सुशील कोइराला यदि राजनीति में नहीं आते, तो हॉलीवुड में होते. डांस और कोरियोग्राफी सीखने के बाद वे हॉलीवुड ही जा रहे थे!
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