अराजकता के मिनी रिचार्ज कूपन

।। पुष्यमित्र।। (पंचायतनामा, रांची) बस्तमीज दिल.. बस्तमीज दिल.. माने ना.. माने ना.. मेरी छह साल की बेटी यह गीत झूम-झूम कर गाती है. रनबीर कपूर पर फिल्माया गया यह गीत जब टीवी पर बजता है तो वह खुद को रोक नहीं पाती है. उसे उ ला..ला.. उ ला..ला.. भी पसंद आता है और ढिंक-चिका.. ढिंक […]
।। पुष्यमित्र।।
(पंचायतनामा, रांची)
बस्तमीज दिल.. बस्तमीज दिल.. माने ना.. माने ना.. मेरी छह साल की बेटी यह गीत झूम-झूम कर गाती है. रनबीर कपूर पर फिल्माया गया यह गीत जब टीवी पर बजता है तो वह खुद को रोक नहीं पाती है. उसे उ ला..ला.. उ ला..ला.. भी पसंद आता है और ढिंक-चिका.. ढिंक चिका भी. मैं अक्सर सोच में पड़ जाता था कि नयी उम्र के लोगों को ऐसे गाने क्यों पसंद आते हैं? पिछले दिनों जब मैंने दिल्ली के लुटियन जोन में लोगों को नारे लगाते, ठंड में वाटर कैनन का सामना करते, बड़े लोगों को गालियां देते, बैरिकेड तोड़ते और खुद को अराजक कहते देखा, तो मुझेयह बात याद आने लगी.
वहां हंगामा कर रहे ‘आप’ के अधिकतर कार्यकर्ताओं के सामने शायद ही स्पष्ट हो कि यह आंदोलन क्यों हो रहा है? पुलिसवालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए, अपने मंत्री के अपमान का बदला लेने के लिए या दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए. ‘आप’ के केंद्रीय नेतृत्व में भी इस बात पर शायद स्पष्टता नहीं है. सबको बस यही लग रहा था कि हम अराजक हैं और अराजकता ही लोकतंत्र है. मुङो याद आया कुछ ही दिनों पहले रनबीर कपूर ने अपनी फिल्म ‘बेशरम’ के प्रोमोशन में कहा था कि गांधी इस देश के पहले बेशरम थे. आज लोग कह रहे हैं कि गांधी सबसे बड़े अराजक थे. तो क्या गांधी का नाम ले लेने से सब कुछ जायज हो जाता है. खैर.. मंगलवार की शाम को इस आंदोलन की समाप्ति के वक्त जो कुछ हुआ वह सोमवार के पूरे घटनाक्रम से ज्यादा चौंकाने वाला था.
यह जरूर ऐतिहासिक था कि एक मुख्यमंत्री धरने पर बैठे और रात में समर्थकों के साथ सड़क पर सो गये. मगर इससे भी अधिक ऐतिहासिक यह रहा कि अराजकता को लोकतंत्र ठहरानेवाला मुख्यमंत्री जो दिल्ली की जनता को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के नाम पर धरने पर बैठा हो, वह तीन पुलिसवालों को छुट्टी पर भेजने की घोषणा के साथ धरने से उठ जाये. गांधी की बात करनेवालों को कभीकभार शहर के मजदूरों और रिक्शा चालकों के आंदोलनों से भी सीख लेना चाहिए. एक तो वे आंदोलन पर जल्दी बैठते नहीं हैं और अगर लाचार होकर बैठ भी गये तो मांग पूरी कराये बिना उठते नहीं हैं. उनके लिए लड़ाई फैशन नहीं है, वे कभी अराजकता के फैशन स्टेटमेंट के साथ लड़ने नहीं बैठते.
उनके लिए लड़ाई जीवन-मरण का मसला होता है. वे जितने दिन लड़ते हैं उतने दिन उनकी रोजी-रोटी दावं पर रहती है. कई लोगों के घर में चूल्हा जलना भी बंद हो जाता होगा. मगर जब वे लड़ते हैं, तो लड़ते हैं. फैसला एक दिन में हो या 15 दिन में. जब बैठ गये तो नतीजा हासिल करके उठेंगे. अगर हमारी मांगें जायज हों तो फिर पूरी क्यों नहीं होंगी? रेल भवन पर परेशानी है तो उठ कर जंतर-मंतर में बैठ जायेंगे, नहीं तो आइटीओ ब्रिज के किनारे चादर बिछा कर बैठ जायेंगे. अराजकता की भी तो कोई इज्जत है बंधु.
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