जब गुटखे से भी सस्ती हो जाये जान

Published at :01 Jan 2014 5:06 AM (IST)
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जब गुटखे से भी सस्ती हो जाये जान

।। पुष्यमित्र।।(पंचायतनामा, रांची) अगर आपसे आपकी जान की कीमत पूछी जाये तो आप क्या कहेंगे. एक करोड़, पांच करोड़ या पचास करोड़. वह कौन सी कीमत होगी जिस पर आप मौत को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जायेंगे. ख्याल रखियेगा कि यह बीमा कवर का मामला नहीं है. बीमा कवर के मामले में भी […]

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।। पुष्यमित्र।।
(पंचायतनामा, रांची)

अगर आपसे आपकी जान की कीमत पूछी जाये तो आप क्या कहेंगे. एक करोड़, पांच करोड़ या पचास करोड़. वह कौन सी कीमत होगी जिस पर आप मौत को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जायेंगे. ख्याल रखियेगा कि यह बीमा कवर का मामला नहीं है. बीमा कवर के मामले में भी आप यही सोचते हैं कि अगर खुदा न खास्ता आपकी मौत हो जाये तो आपके परिवार को एक सहारा मिल जायेगा.

उस वक्त भी आप अपनी जान की कीमत नहीं लगाते. कुछ लोग जरूर पैसे लेकर मानव बम बनने के लिए तैयार हो जाते हैं, मगर उनकी बात अलग है. उनका ब्रेनवाश किया जाता है. एक आम इंसान जो असीम संभावनाओं का केंद्र है. वह कल को इस देश का प्रधानमंत्री भी बन सकता है और सबसे बड़ा व्यवसायी भी बन सकता है. बड़ी उपलब्धियों को छोड़ भी दिया जाये तो ऐसी तमाम संभावनाएं हैं जिससे इंसान बेहतर जीवन जीने का अवसर हासिल कर सकता है. इंसान के जान की कोई कीमत नहीं लगायी जा सकती है. मगर इन विचारों के बीच मैं आपको पिछले दिनों पूर्णिया जिले के एक गांव में घटी घटना की सूचना देना चाहूंगा. लोगों ने एक बच्चे को भरी पंचायत में उल्टा टांग कर बेंत से पीटते हुए मार डाला.

उसका कसूर महज इतना था कि उसने एक दुकान से गुटखे के पैकेट चुरा लिये थे. दो बच्चों ने यह चोरी की थी, भीड़ ने दोनों को नंगा करके उल्टा लटका दिया था. बच्चों की उम्र 13-14 साल के करीब थी. दबंगों में बच्चों की जमकर पिटायी की. एक के मां-बाप ने मारने वालों के पांव पकड़ लिये तो उसे अधमरे हाल में छोड़ दिया गया. दूसरे के माता-पिता का पता नहीं था इसलिए उसे एक गुटखा चुराने की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी. यह उस दौर की कहानी है जब हम राजनीति में शुचिता के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उस दौर में हमारा समाज इतना संवेदनहीन है, या लाचार है कि वह दबंगों की मुखालफत नहीं कर पा रहा है. क्या है इसका इलाज?

कभी दिनमान में एक कवरपेज स्टोरी छपी थी ‘‘तेतरी का खीरा’’. 13 साल की तेतरी ने जमींदार के खेत से एक खीरा चुरा लिया था. उसे पकड कर नंगा कर पेड़ से बांध कर लाल रंग के चीटों (मठ्ठा) का छत्ता उस पर छोड़ दिया गया था. तेतरी के माता-पिता ने तेतरी को मुक्त कर देने के लिये खूब हाथ-पैर जोड़े, अपनी आधा एकड़ जमीन जमींदार के नाम लिख देने का वचन दिया, जिन्दगी भर की बेगारी के लिये तैयार हो गये पर जमींदार ने तेतरी को नहीं छोड़ा. लगभग एक वर्ष बाद में रविवार ने फिर स्टोरी की ‘‘कहां है तेतरी’’. इस घटना के बारे में जानकर फिर से तेतरी की कहानी याद आती है. और दुख होता है कि इतने सालों के बाद हमारे समाज में वैसे ही जमींदार हैं और तेतरी की तरह के छोटे बच्चे उसी तरह मारे जा रहे हैं. राजनीति की गंदगी तो बदल रही है, हमारे समाज की हमारे गांवों की यह सदियों पुरानी गंदगी को कौन साफ करेगा, यह आज भी एक सवाल है.

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