हिंसा का दंश झेलते दक्षिणी सूडान वासी

अफ्रीका महाद्वीप का नवीनतम राष्ट्र दक्षिण सूडान जातीय हिंसा की चपेट में है. करीब ढाई साल पहले सूडान से अलग होकर आजाद देश के तौर पर अस्तित्व में आनेवाले दक्षिण सूडान का अब तक का सफर निर्माण की जगह विखंडन का सफर रहा है. पेट्रोलियम संसाधनों से संपन्न इस देश में दो प्रमुख समुदायों के […]
अफ्रीका महाद्वीप का नवीनतम राष्ट्र दक्षिण सूडान जातीय हिंसा की चपेट में है. करीब ढाई साल पहले सूडान से अलग होकर आजाद देश के तौर पर अस्तित्व में आनेवाले दक्षिण सूडान का अब तक का सफर निर्माण की जगह विखंडन का सफर रहा है. पेट्रोलियम संसाधनों से संपन्न इस देश में दो प्रमुख समुदायों के बीच की परस्पर हिंसा का शिकार वहां की आम जनता हुई है.
सूडान में तैनात संयुक्त राष्ट्र शांति दल पर हुए हमले में दो भारतीय शांति सैनिकों की मौत की खबर ने भारत की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं. विद्रोहियों द्वारा संयुक्त राष्ट्र के परिसर में शरण लिये हजारों नागरिकों और तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा रहा है. दक्षिण सूडान में बिगड़ते हालात के मद्देनजर भारत ने वहां अपने सभी तेल क्षेत्रों को बंद करने का फैसला किया है. दक्षिण सूडान में भड़की हिंसा का तात्कालिक कारण राष्ट्रपति सेल्वा कीर और पूर्व उप राष्ट्रपति रीक मेचार के बीच सत्ता संघर्ष को माना जा रहा है. कीर ने पिछले हफ्ते मेचार द्वारा सरकार के तख्तापलट की कोशिश की बात कही थी.
इसके बाद भड़की हिंसा में सैकड़ों लोगों की जान गयी है और लाखों लोगों को अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है. पूर्व उपराष्ट्रपति मेचार नुएर समुदाय के हैं और राष्ट्रपति का ताल्लुक बहुसंख्यक डिंका समुदाय से है. खबरों के मुताबिक दक्षिण सूडान की राजधानी जुबा में सुरक्षा बलों द्वारा नुएर समुदाय के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है, तो राजधानी के बाहर के हिस्सों में नुएर समुदाय की सैन्य टुकड़ियां डिंका समुदाय के लोगों पर कहर बरपा रही हैं.
अफ्रीका महाद्वीप में सबसे लंबी अवधि तक चले गृह युद्ध के बाद जब आखिरकार तेल बहुल दक्षिणी सूडान का निर्माण हुआ था, तब यहां शांति की उम्मीद जगी थी. लेकिन, जातीय हिंसा ने उन सपनों को तार-तार कर दिया है. वास्तव में शुरुआत से ही दक्षिणी सूडान में लोकतंत्र एक नाजुक डोर पर टिका था और पहले झटके में ही चरमरा कर बिखर गया दिख रहा है. अफ्रीका दुनिया की चिंताओं में शायद ही कभी शामिल होता है, लेकिन वहां की आम जनता जिन तकलीफों से दो चार है, उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता. विश्व समुदाय को अपने प्रयासों से इस देश में समृद्धिपरक शांति लाने की कोशिश करनी चाहिए.
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