मानव अस्तित्व के मिटने का संकट

Updated at : 06 Nov 2019 6:33 AM (IST)
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मानव अस्तित्व के मिटने का संकट

सतीश सिंह टिप्पणीकार singhsatish@sbi.co.in हमारी धरती धीरे-धीरे गर्म हो रही है, जिसके कारण मौसम का मिजाज बिगड़ने लगा है. कभी गर्मी के मौसम में बारिश हो रही है, तो कभी सर्दी के मौसम में भीषण गर्मी पड़ रही है. हम प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं. जंगल मैदान हो गया है. नदी, तालाब, […]

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सतीश सिंह
टिप्पणीकार
singhsatish@sbi.co.in
हमारी धरती धीरे-धीरे गर्म हो रही है, जिसके कारण मौसम का मिजाज बिगड़ने लगा है. कभी गर्मी के मौसम में बारिश हो रही है, तो कभी सर्दी के मौसम में भीषण गर्मी पड़ रही है. हम प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं.
जंगल मैदान हो गया है. नदी, तालाब, नहर को हमने घर बना लिया है. हवा को जहर बना दिया है. कभी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘प्रकृति हमारी जरूरतों को सदियों तक पूरा कर सकती है, लेकिन हमारे लालच को नहीं’. आज यही लालच हमारे अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है.
पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 15 डिग्री सेल्सियस है, लेकिन इसमें बढ़ोतरी हो रही है, जिससे समय पर मौसम में बदलाव नहीं हो रहे हैं. आज गर्मी में बर्फबारी हो रही है तो वसंत ऋतु में गर्मी का पारा आसमान छू रहा है, जिसका कारण ग्रीनहाउस प्रभाव है. पृथ्वी के चारों ओर ग्रीन हाउस गैसों की एक परत है, जिनमें कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन आदि प्रमुख हैं.
इन गैसों का काम होता है सूर्य ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा को सोखकर पृथ्वी तक पहुंचाना. वातावरण में एक निश्चित तापमान होने के कारण पृथ्वी पर जीवन है, लेकिन आज उद्योगों, कृषि, पेड़ों की कटाई, विविध उपकरणों जैसे, फ्रिज, शीत-ताप नियंत्रक आदि के इस्तेमाल के कारण कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन आदि गैसों का उत्सर्जन हो रहा है, जिससे ग्रीन हाउस गैसों की परत मोटी होती जा रही है.
इससे ये गैस सूर्य से अधिक ऊर्जा सोखकर पृथ्वी तक पहुंचा रहे हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है. जंगलों की अंधाधुंध कटाई की वजह से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है, क्योंकि इसे सोखने का काम पेड़-पौधे करते हैं.
साल 1750 के औद्योगिक क्रांति के बाद से कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में 30 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है, जबकि मीथेन के स्तर में 140 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर आठ लाख वर्षों के उच्च्च्तम स्तर पर पहुंच गया है.
ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ने से धरती के तापमान में बढ़ोतरी हो रही है. वायुमंडल के तापमान में वृद्धि को ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं. विगत 100 वर्षों में पृथ्वी के औसत तापमान में 0.8 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है, जिसमें 0.6 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी विगत तीन दशकों में हुई है. बीते कुछ दशकों में समुद्र के जल स्तर में हर साल तीन मिलीमीटर की बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि हर साल चार प्रतिशत की दर से ग्लेशियर पिघल रहे हैं. एक अनुमान के मुताबिक, 1850 की तुलना में 21वीं सदी के अंत तक पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जायेगा.
पृथ्वी का 70.8 प्रतिशत हिस्सा समंदर है और समंदर से जमीन औसतन 20 सेंटीमीटर ऊपर है. वायुमंडल के गर्म होने से समंदर का विस्तार होता है और हिमखंड पिघलने से समंदर के पानी में बढ़ोतरी होती है.
जलवायु परिवर्तन पर हुए पेरिस समझौते के अनुसार पृथ्वी के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है. अगर इस समझौते का अक्षरश: अनुपालन किया जाये, तो भी साल 2100 तक समंदर के स्तर में 50 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी हो जायेगी, जिससे जान-माल दोनों का भारी नुकसान होगा.
इससे विश्व के कुल जीडीपी का 1.8 प्रतिशत संपत्ति का नुकसान हर साल होगा. फिलहाल, विश्व की 7.5 बिलियन आबादी समंदर के सतह से महज 1.5 मीटर की ऊंचाई पर रहती है, जिसके कारण 2050 तक 1.4 बिलियन आबादी समंदर में समा जायेगी. दुनिया के कई शहर जैसे ऑस्ट्रिया, किरीबाती, भारत और चीन के कई तटीय इलाके आदि इसमें शामिल हो सकते हैं.
वायुमंडल के तापमान में बढ़ोतरी से आनेवाले दिनों में जल की कमी, खाद्यान्न उत्पादन में कमी, सूखा-बाढ़, तूफान आदि प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोतरी होगी, जिससे इंसान एवं अन्य जीव-जंतुओं का जीना मुश्किल हो जायेगा. कई वनस्पतियाें पर भी संकट आ सकता है.
हमें मर्ज पता है, अब इलाज शुरू करने की जरूरत है. अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने और वृक्षारोपण से कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्रा को कम किया जा सकता है. पेट्रोल व डीजल चालित वाहन की जगह गैर-मोटर चालित वाहन, जैसे साइकिल, रिक्शा आदि के ज्यादा इस्तेमाल से पर्यावरण को नुकसान पहुंचानेवाले गैसों के उत्सर्जन को रोका जा सकता है. ऊर्जा और संसाधन शोध संस्थान, दिल्ली के विश्लेषण से पता चलता है कि भारतीय शहरों में यात्रा की 60 प्रतिशत लंबाई पांच किमी से कम है, और 80 प्रतिशत 10 किमी से कम है.
यदि पांच किमी की औसत दूरी को साइकिल से और 10 किमी की औसत दूरी के 50 प्रतिशत हिस्से को भी साइकिल से तय किया जाये, तो पर्यावरण को तो लाभ होगा ही, इसके साथ ही साथ लगभग 1,435 अरब रुपये की बचत भी होगी.
जलवायु परिवर्तन पर लगाम लगाने के लिए हमें शिद्दत से कोशिश करनी चाहिए, नहीं तो हमारी अगली पीढ़ी के लिए यह दुनिया नहीं बचेगी. अगर हम कोशिश करें, तो कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन आदि के उत्सर्जन पर लगाम लगायी जा सकती है, लेकिन इसके लिए लालच एवं स्वार्थ को त्यागना होगा. अगर हम विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाकर चलेंगे, तो निश्चित ही जलवायु परिवर्तन की मौजूदा रफ्तार में कमी आयेगी.
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