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हम सबकी निजता में सेंधमारी

Updated at : 23 Jul 2019 7:39 AM (IST)
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हम सबकी निजता में सेंधमारी

अंशुमाली रस्तोगी व्यंग्यकार anshurstg@gmail.com सोशल मीडिया पर ‘निजता’ अब कोई ‘मसला’ न रही. हां, ‘मसाला’ जरूर बन गई है. यहां तो आये दिन किसी न किसी की निजता में सेंधमारी हो ही जाती है. जिसकी निजता भंग होती है, वही चिल्लाने बैठ जाता है. कभी सोशल मीडिया तो कभी सरकार को गरियाता है. इससे कोई […]

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अंशुमाली रस्तोगी
व्यंग्यकार
anshurstg@gmail.com
सोशल मीडिया पर ‘निजता’ अब कोई ‘मसला’ न रही. हां, ‘मसाला’ जरूर बन गई है. यहां तो आये दिन किसी न किसी की निजता में सेंधमारी हो ही जाती है. जिसकी निजता भंग होती है, वही चिल्लाने बैठ जाता है. कभी सोशल मीडिया तो कभी सरकार को गरियाता है. इससे कोई फायदा है!
निजता की इतनी ही फिक्र थी तो यहां आये ही क्यों? किसी पंडित ने थोड़े न बोला था कि यहां आना ही आना है. मैंने देखा है, कुछ लोग तो सोशल मीडिया पर सिर्फ इसलिए आ गये हैं ताकि सोसाइटी में उनकी ‘नाक’ बनी रहे. उन्हें इस बात की चिंता नहीं रहती कि नाक के नीचे उनकी हो क्या रहा है! जब तक पता चलता है, तब तक नाक कट चुकी होती है.
दोष सोशल मीडिया को क्यों देना? नाक आपकी. कैसे रखनी है. कैसे नहीं रखनी है, यह फैसला भी आपका. फिर इतना हंगामा क्यों भाई!
अभी खबर पढ़ी कि गूगल हमारे ‘बेडरूम’ में घुसकर हमारी निजता को ध्वस्त कर रहा है. ध्वस्त कैसे नहीं करेगा? जब आपका मोबाइल फोन चौबीस घंटे आपकी छाती से चिपका रहेगा. जब पल-पल का निजी अपडेट आप फेसबुक या ट्विटर पर चढ़ाते रहेंगे. जब अपनी हर निजी या सार्वजनिक गतिविधि को सोशल मीडिया का हिस्सा बनाते रहेंगे. ऐसे में वो आपके बेडरूम में ही नहीं, वाशरूम में भी घुसने में गुरेज नहीं करेगा. क्या समझे जनाब!
हमने तो अपनी तरह-तरह की निजताओं को खुद ही नष्ट किया है. मैंने तो ऐसी सेल्फियां भी देखी हैं, जिनमें व्यक्ति के साथ-साथ आसपास की और भी चीजों के दर्शन हो जाते हैं. खाने-पीने से लेकर सुई चुभने तक को जब हम सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं, ऐसे में निजता के भंग होने की बात बेमानी ही कही जायेगी.
मुझे वो लोग पसंद हैं, जो गाहे-बगाहे अपनी निजताओं को बेचते रहते हैं. उन्हें इससे खास फर्क नहीं पड़ता कि कोई उनके बारे में क्या कहेगा. उन्हें तो अपनी निजता को सार्वजनिक करने से मतलब रहता है बस. ऐसे लोग न हाय-हाय करते हैं, न रोना रोते हैं. सोशल मीडिया भी इन्हें हाथों-हाथ लेता है.
हां, जरा बहुत बदनामी जरूर पल्ले पड़ती है, पर वे इसे भी भुना ले जाने में माहिर होते हैं. कह सकते हैं कि सोशल मीडिया से मिली बदनामी फौरी होती है पर नाम क्या कम होता है. कल तक जो आपके नाम तक से परिचित न थे, वे सब भी जान जाते हैं. दुनिया-समाज में ऐसे जाने कितने नाम हैं, जो फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब की देन हैं.
निजताओं पर दीदारेजी करना बेकार है. यहां किसी का किसी से कुछ छिपा नहीं. निजताएं जितनी उघड़ी रहेंगी, उतना ही सुकून देंगी.
ज्यादा न लोड लीजिए, अगर फेसबुक या गूगल आपके निजी जीवन में दखल दे रहे हैं. एक बार जो सोशल मीडिया पर आ गया, उसकी निजता का शील भंग हुआ समझिए.
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