इतने तूफानी क्यों हो गये हैं तूफान

Updated at : 07 May 2019 8:37 AM (IST)
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इतने तूफानी क्यों हो गये हैं तूफान

अभिषेक कुमार टिप्पणीकार abhi.romi20@gmail.com बंगाल की खाड़ी से उठे तूफान फोनी (फानी) ने देश में नयी हलचल पैदा कर दी. ओडिशा इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होनेवाला राज्य रहा है. रेलें रद्द कर, स्कूल-कॉलेज बंद कर और मछुआरों को समुद्र से दूर रखकर आपदा प्रबंधन के तहत फोनी से बचाव के जो उपाय किये गये, उनसे […]

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अभिषेक कुमार
टिप्पणीकार
abhi.romi20@gmail.com
बंगाल की खाड़ी से उठे तूफान फोनी (फानी) ने देश में नयी हलचल पैदा कर दी. ओडिशा इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होनेवाला राज्य रहा है.
रेलें रद्द कर, स्कूल-कॉलेज बंद कर और मछुआरों को समुद्र से दूर रखकर आपदा प्रबंधन के तहत फोनी से बचाव के जो उपाय किये गये, उनसे तूफान ज्यादा आपदाकारी साबित नहीं हो पाया. संयुक्त राष्ट्र तक ने इन उपायों की तारीफ की. सवाल है कि आखिर दुनिया के मानचित्र पर हाल के बरसों में उठे तूफान इतने संहारक क्यों हो गये हैं? उन्हें इतनी ताकत कहां से मिली है कि हजार बमों के बराबर नुकसान पहुंचानेवाली घटना के रूप में उन्हें देखा जा रहा है?
भारत समेत एशियाई देश चक्रवाती तूफान का उतना बड़ा कहर नहीं झेलते, जितना अमेरिकी और कैरिबियाई मुल्क. साल 2017 में अमेरिका में हार्वी के बाद कैरिबियाई द्वीप समूह के पूरे इलाके में इरमा ने बड़ी तबाही मचायी थी.
मौसम विज्ञानी कैरी इमैनुएल ने इरमा की ताकत का अंदाजा लगाया था कि दूसरे विश्वयुद्ध में जितने बमों का इस्तेमाल किया गया था, इरमा उनकी कुल ताकत के आधे के करीब यानी सात खरब वॉट की विध्वंसक क्षमता से लैस था. बारबुडा और सेंट मार्टिन आदि जिन क्षेत्रों से होकर यह गुजरा, वे इस पांचवीं कैटेगरी के चक्रवाती तूफान के कारण तबाह हो गये.
इस शक्तिशाली तूफान के कारण 285 किमी प्रति घंटे से चलनेवाली हवाओं ने अपने सामने किसी को टिकने ही नहीं दिया. बीते वर्षों में मेरांती, वरदा, पारदीप, फेलिन, वीपा और नारी जैसे एक के बाद एक उठे भीषण चक्रवाती तूफानों से यह सवाल उठा है कि तूफानों की यह शृंखला कहीं किसी बड़े मौसमी परिवर्तन की आहट तो नहीं है!
हमारे लिए एक आश्वस्ति यह है कि 1999 में ओडिशा के तट से टकरानेवाले समुद्री चक्रवात वरदा के बाद से चीजें काफी बदली हैं. मौसम विभाग पहले से अनुमान जताकर आपदा प्रबंधन को सचेत कर देता है और होनेवाले नुकसान को काफी हद तक थाम लिया जाता है.
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से एक प्रचंड तूफान से दुनिया उबरती नहीं है कि दूसरा विनाशक तूफान आ धमकता है. इससे यह आशंका बन गयी है कि अभी दुनिया में और भी बड़े तूफान आ सकते हैं. समुद्री तूफानों और चक्रवातों की पैदावार ने मौसम विज्ञानियों को भी चकरा दिया है और उन्हें इसमें किसी बड़े मौसमी बदलाव की आहट मिल रही है.
मौसम विज्ञानियों के एक वर्ग के मुताबिक, यह नयी प्राकृतिक परिघटना नहीं है, लिहाजा इससे घबराने की जरूरत नहीं है. ऐसी एक आश्वस्ति ब्रिटिश मौसम विभाग के उष्णकटिबंधीय मौसमी भविष्यवाणियों के विशेषज्ञ जूलियन हेमिंग की भी है- अंतरिक्ष से देखने पर धरती पर कई तूफानों को एक-दूसरे के नजदीक देखना रोचक अवश्य है, लेकिन हर साल अप्रैल-मई और अगस्त से अक्तूबर के बीच ऐसे दृश्य कोई बहुत नये नहीं हैं.
इन अवधियों में हर साल पश्चिम से पूरब की ओर ऐसी ही शक्तिशाली और एक-दूसरे से जुड़ी मौसमी हलचल होती है. कई बार संयोग से एक बड़े भूभाग में अत्यधिक तेज बारिश होती है और दुनिया में समुद्री तूफानों का एक पूरा सिलसिला चल पड़ता है. हालांकि, सारे मौसम विज्ञानी जूलियन की व्याख्या से पूरी तरह सहमत नहीं हैं.
दुनिया में ऐसा कोई भी मौसमी मॉडल नहीं हैं, जो चक्रवात या समुद्री तूफान की तीव्रता की सटीक जानकारी दे सके. हमारे मौसमी उपग्रह, सुपर कंप्यूटर और वॉर्निंग सिस्टम यह तो बता सकते हैं कि किसी इलाके में कब कोई तूफान आनेवाला है, लेकिन वह कितना प्रलंयकारी होगा- इसका सटीक अनुमान संभव नहीं है.
चूंकि भीषण चक्रवात के दौरान 200-300 किमी प्रति घंटे की हवाएं चलती हैं, इसलिए चक्रवात उत्पन्न होने की स्थिति में उसकी तीव्रता में परिवर्तन ला पाना असंभव होता है. बीसवीं सदी में आये तूफानों से अब तक खरबों रुपये की संपत्ति के नष्ट होने के साथ-साथ लाखों इंसान इसकी भेंट चढ़ चुके हैं.
चक्रवाती तूफानों की उत्पत्ति की प्रक्रिया काफी पेचीदा है. मूलत: यह एक वायुमंडलीय परिघटना है, जो तापमान में बदलाव और वायुधाराओं की स्थिति में आनेवाले परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती है. हमारी पृथ्वी के ऊपर एक विरल गैसीय आवरण है, जो गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी से जुड़ा रहता है और साथ-साथ घूमता है.
ऐसे में, जब तापमान में अंतर की वजह से वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा बढ़ती है और विभिन्न स्थानों पर हवा का दबाव कम हो जाता है, तो चारों ओर की हवा उस निर्वात को भरने के लिए एक केंद्र की ओर लपकती है. इसी प्रक्रिया के कारण तूफान का जन्म होता है. भारत में ज्यादातर तूफान या चक्रवात बंगाल की खाड़ी की तरफ से आते हैं.
ऐसा इसलिए है, क्योंकि बंगाल की खाड़ी में तूफान की स्थितियां उपजानेवाला क्षेत्र ‘साइक्लोजेनेसिस’ पश्चिमी तटों के मुकाबले पांच गुना ज्यादा है. यहां का तापमान भी अधिक रहता है. प्रशांत महासागर से जुड़े चीन-थाईलैंड के तटों पर जो वायुमंडलीय परिवर्तन आते हैं, उनका असर भी मलेशिया के रास्ते अंडमान तक पड़ता है. ये कारण हमारे पूर्वी तटों पर ज्यादा तूफान लाते हैं. मुश्किल यह है कि विज्ञान की उन्नति भी चक्रवात को रोकने में नाकाम रही है.
हम अपनी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके सिर्फ इतना कर सकते हैं कि चक्रवात की पूर्व चेतावनी दे सकें. पर पेच यह है कि कोई भी भविष्यवाणी सौ फीसदी खरी नहीं उतरती. यदि दुनियाभर के सुपर कंप्यूटरों और मौसम-उपग्रहों का नेटवर्क बनाकर इसकी चेतावनी का सिस्टम मजबूत किया जा सके, तो ही कुछ बात बनेगी.
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