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लोकपाल की नियुक्ति-प्रक्रिया पर प्रश्न

Updated at : 25 Mar 2019 6:06 AM (IST)
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लोकपाल की नियुक्ति-प्रक्रिया पर प्रश्न

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार ravibhushan1408@gmail.com भारत के पहले लोकपाल की नियुक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की चयन समिति ने 17 मार्च, 2019 को, सत्रहवें लोकसभा चुनाव के कुछ दिन पहले कर दी है. चयन समिति के चौथे सदस्य पूर्व महान्यायवादी मुकुल रोहतगी थे. विपक्ष के नेता […]

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रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार

ravibhushan1408@gmail.com

भारत के पहले लोकपाल की नियुक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की चयन समिति ने 17 मार्च, 2019 को, सत्रहवें लोकसभा चुनाव के कुछ दिन पहले कर दी है.

चयन समिति के चौथे सदस्य पूर्व महान्यायवादी मुकुल रोहतगी थे. विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे इस चयन समिति में विशेष रूप से आमंत्रित थे, जिन्हें किसी प्रकार का अधिकार नहीं था. वे चयन समिति की बैठक में उपस्थित नहीं हुए. अब लोकपाल की नियुक्ति-प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि जिस संतुलित चयन समिति का होना आवश्यक था, वह नहीं हो सका है.

मुकुल रोहतगी वाजपेयी सरकार के समय भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किये गये थे. उन्हाेंने वाजपेयी सरकार में पांच साल और मोदी सरकार में तीन साल काम किया है.

अटॉर्नी जनरल के तौर पर उन्होंने सेवा-विस्तार नहीं चाहा था और यह कहा था, ‘सरकार के साथ मेरे अच्छे संबंध हैं, लेकिन मैं अब निजी प्रैक्टिस करना चाहता हूं.’ जज लोया की मौत के मामले में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए दायर याचिका के विरोध के लिए महाराष्ट्र सरकार ने मुकुल रोहतगी को नियुक्त किया था. उस समय निष्पक्ष जांच के लिए दायर याचिका के संबंध में उन्होंने कहा था कि यह याचिका न्यायपालिका को ‘स्कैंडलाइज’ करने के लिए दायर की गयी है. उन्होंने कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद के घटनाक्रम में वहां के राज्यपाल का बचाव किया था. लोकपाल चयन समिति में उनकी नियुक्ति प्रमुख विधिवेत्ता के रूप में की गयी.

लोकपाल कानून की धारा-4 के अंतर्गत पारदर्शिता की बात थी. सार्वजनिक जांच की बात भी की गयी थी. अब लोकपाल के चयन में पारदर्शिता न बरतने की बात कही जा रही है. खोज समिति द्वारा उम्मीदवारों की संक्षिप्त सूची की कोई जानकारी नहीं है. लोकपाल की चयन समिति की बैठकों के कार्यवृत्त (मिनट्स) को ‘गुप्त सूचना’ कहा गया है.

इन कारणों से यह अनुमान किया जा रहा है कि लोकपाल के कामकाज के पहले ही सरकार ने इस संस्था को कमजोर कर दिया है.

मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 22 दिसंबर, 2011 को लोकपाल बिल संसद में रखा गया था और 27 दिसंबर, 2011 को लोकपाल एवं लोकायुक्त बिल पास हुआ था. जांच एजेंसियों के प्रति अविश्वास के कारण लोकपाल की जरूरत समझी गयी थी.

जन लोकपाल बिल सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संतोष हेगड़े, वकील प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल ने मिल कर तैयार किया था. पांच अप्रैल, 2011 को अन्ना हजारे ने जंतर-मंतर पर अनशन आरंभ किया था. उनके साथ अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण, बाबा रामदेव सब थे.

उस समय भारत सरकार से एक मजबूत भ्रष्टाचार-विरोधी लोकपाल विधेयक बनाने की मांग की गयी थी. लोकपाल बिल का एक मसौदा भी दिया गया था. मनमोहन सरकार का रवैया नकारात्मक रहा था. अनशन ने आंदोलन का रूप ग्रहण किया और अन्ना आंदोलन लोकपाल विधेयक से जुड़ा था. मनमोहन सिंह ने संसद में इस आंदोलन के पीछे विदेशी शक्तियों के हाथ होने की बात कही थी.

यूपीए-2 के दौरान भ्रष्टाचार चरम पर था. नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भगोड़े और आर्थिक अपराधियों की संख्या बढ़ी. लोकपाल बिल ढंडे बस्ते में पड़ा रहा. अप्रैल 2017 में सुप्रीम कोर्ट में लोकपाल की नियुक्ति न किये जाने का मामला आया. सरकार अवमानना याचिका के बाद हरकत में आयी. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सरकार ने लोकपाल की नियुक्ति नहीं की. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही नरेंद्र मोदी ने लोकसभा का चुनाव (2014) जीता था.

अब पिनाकी चंद्र घोष (28 मई, 1952) 19 मार्च, 2019 से भारत के प्रथम लोकपाल हैं. ये सुप्रीम कोर्ट में 8 मार्च, 2013 से 27 मई, 2017 तक न्यायाधीश थे.

वे कलकत्ता हाइकोर्ट के जज और आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं. साल 2022 तक वे लोकपाल रहेंगे. पांच पीढ़ियों से इनका परिवार वकालत में है. इसी परिवार के सदस्य हरचंद्र घोष थे- 1867 में कलकत्ता के सदर दीवानी अदालत में पहले भारतीय प्रमुख जज. पिनाकी चंद्र घोष कलकत्ता हाइकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश शंभु चंद्र घोष के पुत्र हैं.

भारत के लोकपाल के आठ सदस्यों (चार न्यायिक और चार गैर-न्यायिक) की नियुक्ति हो चुकी है. चार न्यायिक सदस्य हैं- इलाहाबाद हाइकोर्ट 46वें मुख्य न्यायाधीश दिलीप बाबासाहेब भोसले (24 अक्तूबर, 1956), झारखंड उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश प्रदीप कुमार मोहती (10 जून, 1955), मणिपुर उच्च न्यायालय की प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश अभिलाषा कुमारी (23 फरवरी, 1956) और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अजय कुमार त्रिपाठी (12 नवंबर, 1957).

चार गैर-न्यायिक सदस्य हैं- भारत के सशस्त्र सीमा बल की पूर्व महानिदेशक अर्चना रामासुंदरम (1 अक्तूबर, 1957), महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव दिनेश कुमार जैन (25 जनवरी, 1959), पूर्व भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी महेंद्र सिंह (9 दिसंबर, 1958) और गुजरात कैडर के पूर्व भारतीय प्रशासनिक अधिकारी इंद्रजीत प्रसाद गौतम (2 अप्रैल, 1953).मोदी सरकार को लोकपाल नियुक्त करने में पांच साल लगे. चुनाव के ठीक पहले हुई इस नियुक्ति का क्या चुनाव पर कोई प्रभाव पड़ेगा?

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