सफल रही मोदी की यह नीति
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 07 Jan 2019 6:35 AM
प्रो सतीश कुमार सेंट्रल यूनवर्सिटी ऑफ हरियाणा singhsatis@gmail.com साल 2018 का अंत विदेश नीति के रडार पर सफल माना जायेगा. कई परिवर्तन हुए और भारत की छवि को बेहतर बनाने की कोशिश हुई है.शुरू में ऐसा लगा कि श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और अन्य पड़ोसी देश भारत से बिखरते जा रहे हैं, लेकिन 2018 के अंत […]
प्रो सतीश कुमार
सेंट्रल यूनवर्सिटी ऑफ हरियाणा
singhsatis@gmail.com
साल 2018 का अंत विदेश नीति के रडार पर सफल माना जायेगा. कई परिवर्तन हुए और भारत की छवि को बेहतर बनाने की कोशिश हुई है.शुरू में ऐसा लगा कि श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और अन्य पड़ोसी देश भारत से बिखरते जा रहे हैं, लेकिन 2018 के अंत तक श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश में जो राजनीतिक परिवर्तन हुए, उससे भारत की स्थिति बेहतर हुई और ऐसा लगने लगा कि चीन की चाल भारत के पड़ोसी देशों में सफल नहीं हो पा रही है.
भारत के लिए भी यह सब होना अत्यंत जरूरी था. पाकिस्तान में भारत विरोध की गूंज इमरान खान के बाद और तेज हुई है. लिहाजा भारत ने स्पष्ट कह दिया है कि पाकिस्तान से किसी तरह की बातचीत तब तक संभव नहीं है, जब तक पाकिस्तान आतंकी गतिविधियों पर रोक नहीं लगता. चीन के साथ पाकिस्तान की धींगामुश्ती बढ़ती जा रही है.
दूसरी तरफ अंतराष्ट्रीय परिवर्तन भी भारत के लिए नयी चुनौतियों का कारण बन गया है. रूस, चीन और पाकिस्तान सामरिक जोड़-तोड़ में हैं. वहीं, भारत के साथ अमेरिका और जापान हैं, लेकिन ट्रंप की अविश्वसनीय सोच से सब तंग हैं. इसलिए भारत को अपनी सोच और शक्ति पर भरोसा करना होगा.
प्रश्न यहां पर प्रथम पड़ोसी देशों की नीति को और दुरुस्त करने की जरूरत का है. भारत की विदेश नीति कई दशकों से पड़ोसी देशों के बीच दो तत्वों से प्रभावित होती है.
पहला, उस देश की राजनीतिक विचारधारा और दूसरा, भारत के संघीय समीकरण. मसलन श्रीलंका की समस्या तमिलनाडु की राजनीति से प्रभावित होती है, तो बांग्लादेश देश के साथ संबंध भारत के पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों के राजनीतिक कारको से. नेपाल मधेसी समीकरण को लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति से झुलसता है.
अंततः इसका असर भारत की विदेश नीति पर पड़ता है. प्रधानमंत्री मोदी की प्रथम पड़ोसी सोच गुजराल सिद्धांत और नेहरू की सोच से अलग है. शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और उसके बाद चीन निरंतर भारत के पड़ोसी देशों के बीच अपनी घुसपैठ बनाने की जुगत में रहे हैं. भारत को सावधान रहना चाहिए.
भारत से कई गलतियां पिछले पांच वर्षों में हुई हैं, जिन्हें दुरुस्त करने की जरूरत है. नेपाल में 2016 के बाद से वहां की राजनीति दो समुदायों में बंट गयी- पहाड़ी और मधेसी के बीच. मधेसी मुख्यतः भारत समर्थक हैं, लेकिन सत्ता की बागडोर पर पहाड़ियों की पकड़ है.
ऐसा पहले नहीं था कि पहाड़ी समुदाय चीन के भक्त थे, उनका चीन के साथ न तो धार्मिक लगाव है और न ही सांस्कृतिक जुड़ाव. कांग्रेस पार्टी को हमने अपना समझा और अन्य पार्टियों के साथ एक निश्चित दूरी बना ली.
इसका फायदा चीन ने उठाया और पहाड़ी लोगों के बीच भारत विरोधी बीज बो दिये. उसके बाद से नेपाल की राजनीति को हम दलीय राजनीति के आईने से देखने लगे, जो भारत की लिए उचित नहीं था. दूसरी गलती विभिन्न योजनाओं की गति बहुत ही धीमी रही है, जिसका त्वरित लाभ चीन को हुआ.
बांग्लादेश में हाल में संपन्न हुए चुनाव में शेख हसीना की आवामी लीग की जीत हुई है. यह भारत के लिए सुखद है, लेकिन चिंता का कारण यह भी है कि वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर पड़ती जा रही है. वहां की दलगत राजनीति भारत की विदेश नीति को अपने ढांचे में ले रही है.
बेगम खालिदा जिया की नीति भारत विरोधी रही है, लेकिन वहां के समुदाय के बीच भारत के प्रति कोई अनादर की भावना नहीं होनी चाहिए, क्योंकि आंतरिक राजनीतिक कलह भारत की नीति की देन नहीं है. इसलिए संपूर्ण बांग्लादेश में भारत-पसंद की बात होनी चाहिए. श्रीलंका की कहानी भी यही है. तमिल उत्पीड़न के कारण हम वहां के जातीय युद्ध का हिस्सा बन गये. इस सोच को बदलने की जरूरत है.
भूटान भारत का विशेष पड़ोसी देश है. पिछले साल हुए समझौते के अनुसार विदेश नीति और सुरक्षा के मसले पर भारत उसकी मदद करता है. डोकलाम विवाद के जख्म अभी भरे नहीं हैं कि भारत के विदेश विभाग द्वारा बौद्ध गुरु करमपा के संदर्भ में कुछ तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जो भारत के लिए सुकूनदायक नहीं है.
इस बात की भी उम्मीद है कि दलाई लामा के नहीं रहने कि स्थिति में करमपा ही तिब्बतियों के सबसे बड़े गुरु होंगे. ऐसे में भारत को सोच-विचार करके अपनी बातों को रखना होगा. अफगानिस्तान में भी रूस और चीन की मिलीभगत के कारण समीकरण बदल रहे हैं.
भारतीय प्रधानमंत्री की प्रथम पड़ोसी देश की नीति ने चीन के जाल को कुतरने की भरपूर कोशिश की है. इसे और भी जर्जर करने की जरूरत है.
भारत का वैश्विक कद पिछले पांच सालों में बढ़ा है. इन्हीं वर्षों में फ्रांस और जापान हमारे बेहतर सहयोगी बने हैं. इंडो-पैसेफिक में भारत की पहुंच मजबूती के साथ दर्ज हुई है. आसिआन के कुछ देशों कि साथ आर्थिक और सामरिक समीकरण और बेहतर हुआ है, लेकिन भारत की विदेश नीति की सफलता, विशेषकर मोदी की नयी सोच का मुआयना मुख्यतः प्रथम पड़ोसी देशों के आधार पर ही तय होगी. चीन की शक्ति जितनी क्षीण होगी, भारत की पकड़ उतनी ही मजबूत होगी.
जिस तरीके से श्रीलंका सरकार और बांग्लादेश ने चीन के नव सैनिक पनडुब्बियों को अपने बंदरगाह में पनाह देने से मना कर दिया था, वह भारत की सफलता का सूचक है. भारत को प्रथम पड़ोसी देशों की नीति पर बहुत अच्छी तरह से ध्यान देना चाहिए.
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