ePaper

नाम में भला क्या रखा है

Updated at : 21 Nov 2018 7:28 AM (IST)
विज्ञापन
नाम में भला क्या रखा है

तरुण विजय वरिष्ठ नेता भाजपा tarunvijay55555@gmail.com यह स्तंभ लिखते समय मुझे स्मरण हो आया कि घर से संसद भवन आते हुए आज सुबह ही विजय चौक के आसपास बड़ी संख्या में ‘आदि उत्सव’ के पोस्टर, बैनर और घोषणाएं प्रदर्शित थीं. मुझे लगा कि संभवतः यह अरुणाचल प्रदेश की आदिम जनजाति के युवाओं का कोई सम्मेलन […]

विज्ञापन

तरुण विजय

वरिष्ठ नेता भाजपा

tarunvijay55555@gmail.com

यह स्तंभ लिखते समय मुझे स्मरण हो आया कि घर से संसद भवन आते हुए आज सुबह ही विजय चौक के आसपास बड़ी संख्या में ‘आदि उत्सव’ के पोस्टर, बैनर और घोषणाएं प्रदर्शित थीं. मुझे लगा कि संभवतः यह अरुणाचल प्रदेश की आदिम जनजाति के युवाओं का कोई सम्मेलन या उत्सव है. ध्यान से देखा तो पता चला कि यह जनजातीय मंत्रालय के अंतर्गत ट्राइफेड संस्था द्वारा आयोजित जनजातीय महोत्सव है. जनजातीय महोत्सव का नाम ‘आदि महोत्सव’?

मेरी आंखों के सामने स्व बाला साहेब देशपांडे का चित्र उभर आया. अगर वह यह देखते, तो क्या कहते? उनके साथ मुझे काफी समय बिताने का सौभाग्य मिला- जशपुर से दिल्ली तक. मुझे लगा उन्हें बहुत गुस्सा आता और वह कहते कि तरुण देखो यह किसने लगाया है या तो मुझसे उसकी बात कराओ या यह पोस्टर बदलवाओ.

बात गुस्से की ही है. जिंदगी बीत गयी जनजातीय क्षेत्र में काम करते-करते जिनकी, वह इस क्षेत्र में काम करते हुए शब्दों के चयन और उनके प्रयोग का महत्व जानते और समझते हैं. जो सिर्फ बाबूगिरी और नेतागिरी करते हैं, उन्हें इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि इस देश की आत्मा का दर्शन कराने वाले महान और विराट जनजातीय समाज का कोई आदिवासी कहकर हमारी राष्ट्रीय चिति और चेतना को ईसाई मिशनरियों की तरह घायल करे. यह उनके लिए बड़ी साधारण, आम बात है और अगर उनसे कहा जाये कि हे महान विद्वान!

समाज में गलत शब्दों के प्रयोग से पलीता लगाने का काम कृपया न करें और जनजातीय तथा आदिवासी शब्द के मध्य में जो ऐतिहासिक, समाज विज्ञानी एवं आर्य-अनार्य का भेद उत्पन्न कर हिन्दु समाज को तोड़ने के ब्रिटिश नृवंश शास्त्रीय षड्यंत्र चले आ रहे हैं, उनको समझने का प्रयास करें. बहुत अधिक संभावना इस बात की होगी कि आपकी ऐसी दृढ़ और विनम्र वाणी सुनकर वे महान विद्वान और विद्वान से भी बड़े नेता गुस्सा जायेंगे, टेढ़ी भृकुटी से आपको देखेंगे, मानो कह रहे हों- ‘ई महत्वहीन बबुआ हमरा के सिखावत कहों से आवि गेल. आपको अपने आप पर ही लज्जित होकर उलटे पांव, मुंह छिपाकर और जिसे मुहावरे में पूंछ दबाकर कहते हैं लौट आना पड़ेगा.

गुलाब को चमेली कहो या गेंदा उससे गुलाब की विशेषता थोड़े ही बदल जाती है. इन लोगों पर टॉलस्टॉय से लेकर वीर सावरकर तक ने बहुत लिखा है.

अगर नाम में कुछ नहीं होता, तो आप अपने बच्चों के नाम रावण, विभीषण और दुर्योधन क्यों नहीं रखते? अगर नाम में कुछ नहीं होता, तो अंधे, बहरे, लंगड़े के लिए विकलांग शब्द का प्रयोग किया और अब दिव्यांग शब्द क्यों अपनाया जाता है? अगर नाम में कुछ नहीं रखा है, तो दृष्टिहीन को अंधा कहकर पुकारिए, उसे प्रज्ञाचक्षु अथवा दृष्टिबाधित क्यों कहा जाता है? वास्तव में तो दृष्टिहीन वे नहीं, जिन्हें किसी कारणवश प्रभु ने आत्मिक दृष्टि दी है और बाहरी नेत्र छीन लिये, बल्कि दृष्टिहीन वे हैं, जो सब कुछ देखते हुए भी यथार्थ को देखने से मना कर देते हैं.

ठक्कर बापा जैसे महान गांधीवादी, जिन्होंने जनजातीय समाज की सेवा के लिए अपना जीवन होम कर दिया, वास्तव में दूसरे गांधी ही कहे जाते हैं.

उन्होंने जनजातियों को ईसाई बनने से बचाया और ब्रिटिश तथा ईसाई नृवंश शास्त्रियों द्वारा पैदा किये गये आर्य-अनार्य के विभाजन को अस्वीकार किया. आर्य भारत पर आक्रमणकारी थे और बाहर से आये. यह अवधारणा आज पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है. यूरोप और अमेरिका के आधुनिक अकादमिशियन आर्यों के विदेश से भारत पर किये गये आक्रमण तथा यहां के ‘दास’ या द्रविड़ समाज को पराजित कर अपना वर्चस्व स्थापित करने की स्थापनाएं निरस्त कर चुके हैं तथा प्रागैतिहासिक जिंस के अध्ययन से यह सिद्ध हो चुका है कि द्रविड़ और आर्य भेद काल्पनिक है तथा शिव की उपासना दोनों ही वर्गों में समान रूप से प्रचलित रही है. आदिवासी और जनजातीय शब्द के प्रयोग में यही भेद है.

अंग्रेज यह सिद्ध करना चाहते थे कि जैसे आर्यों ने इस देश को आक्रमण का शिकार बनाकर यहां के समाज को दास बनाया, वैसे ही वे आये. इसी अवधारणा को बल देने के लिए उन्होंने एक समाज को आदिवासी अर्थात मूल निवासी कहा और शेष समाज को आक्रमणकारी आर्य वर्ग में डालकर स्वयं उनके समकक्ष हो गये. जो लोग आदिवासी शब्द का इस्तेमाल करते हैं, वे उसी ब्रिटिश मानसिकता का उद्देश्यपूर्ण एवं अज्ञानतापूर्वक विस्तार करते हुए स्वयं को आक्रमणकारी घोषित करते हैं.

जब अटल बिहारी वाजपेयी के शासन में देश के इतिहास का पहला जनजातीय मंत्रालय बनाने की बात हुई, तो किसी अधिकारी ने उसका नाम आदिवासी कल्याण मंत्रालय सुझाया था. अटल जी जानते थे मैं वनवासी कल्याण आश्रम में काम कर चुका हूं. ऐसे ही सायंकाल उन्होंने चर्चा की, तो मैंने यह सब विषय उनके सामने रखते हुए कहा कि भारत के संविधान तथा बाबा साहेब आंबेडकर ने आदिवासी शब्द नहीं, बल्कि जनजातीय शब्द को ही स्वीकार किया है.

न केवल संविधान में जनजातीय शब्द का उल्लेख है, बल्कि वैदिक साहित्य में भी केवल जनजातीय शब्द का प्रयोग हुआ है. इसलिए जो लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है, उन्हें अपने कथन पर दोबारा विचार करना चाहिए.

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola