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भूटान में चुनाव और बदलती सत्ता

Updated at : 15 Oct 2018 7:17 AM (IST)
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भूटान में चुनाव और बदलती सत्ता

राकेश कुमार मीणा आईसीडब्ल्यूए, दिल्ली rakeshkrmeena@gmail.com साल 2008 में हिमालयी अधिराज्य भूटान ने संविधान अंगीकृत कर इसे लागू किया और संवैधानिक राजतंत्र को अपनाते हुए भूटान में वर्ष 2008 और 2013 में संसद के चुनाव हुए. वहां इस बार तीसरे संसदीय चुनाव हो रहे हैं, जिसका पहला चरण 15 सितंबर को हो चुका है और […]

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राकेश कुमार मीणा

आईसीडब्ल्यूए, दिल्ली

rakeshkrmeena@gmail.com

साल 2008 में हिमालयी अधिराज्य भूटान ने संविधान अंगीकृत कर इसे लागू किया और संवैधानिक राजतंत्र को अपनाते हुए भूटान में वर्ष 2008 और 2013 में संसद के चुनाव हुए. वहां इस बार तीसरे संसदीय चुनाव हो रहे हैं, जिसका पहला चरण 15 सितंबर को हो चुका है और अंतिम चरण 18 अक्तूबर को होगा.

भूटान के संविधान के अनुसार, चुनाव दो चरणों में होंगे- प्रथम चरण में दो लोकप्रिय दलों का चयन होगा और दूसरे चरण में निर्वाचन क्षेत्रों से उम्मीदवारों का चयन होगा. भूटान में साल 2008 तक राजतंत्र निर्बाध रूप से रहा, लेकिन वहां के नरेश जिग्मे खेसर वांगचुक ने उपहार स्वरूप लोकतंत्र को जनता के सम्मुख पेश किया. उनका मानना था कि वर्तमान दौर में देश को लोकतंत्र से अवगत होने की आवश्यकता है और एक व्यक्ति की इच्छा से देश नहीं चलना चाहिए. यद्यपि भूटान की जनता उस दौरान भी राजतंत्र के पक्ष में थी और आज भी जनता की नजरों में नरेश सर्वोपरि, श्रद्धेय और एकता के प्रतीक हैं.

भूटान में लोकतंत्र के विकास में चुनावों की खासी भूमिका है और वहां की जनता इसमें अपनी रुचि भी दिखा रही है. इस साल 20 अप्रैल को ‘राष्ट्रीय परिषद्’ के चुनाव हुए और 18 अक्तूबर को ‘राष्ट्रीय सभा’ के चुनाव होंगे. पिछले चुनावों के परिणामों में बदलाव और भूटान के लोगों द्वारा चुनाव में बढ़ती सहभागिता एक सकारात्मक पहल है.

भूटान चुनाव न केवल यहां की आंतरिक राजनीति पर प्रभाव डालेंगे, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा. इसी साल नेपाल और पाकिस्तान में सरकारें बदली हैं और भूटान में भी सत्ता परिवर्तन दिख रहा है.

भूटान की संसद में दो सदन हैं. पहला, राष्ट्रीय परिषद् (उच्च सदन) में 25 सदस्य होते हैं, जिनमें 5 सदस्य भूटान नरेश द्वारा मनोनीत होते हैं और शेष 20 सदस्य जिलों का प्रतिनिधित्व करते हैं. यह एक अराजनीतिक अंग है और इसमें चुनाव लड़नेवाले उम्मीदवार व्यक्तिगत रूप से चुनाव लड़ते हैं, न कि किसी राजनीतिक दल से. दूसरा, राष्ट्रीय सभा (निम्न सदन) में 47 सीटें होती हैं. इनमें उम्मीदवार किसी दल की तरफ से चुनाव लड़ते हैं और यह ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ की पद्धति से होता है.

यहां निम्न सदन शक्तिशाली होता है और प्रधानमंत्री भी इसी सदन से होता है, लेकिन देश की सुरक्षा-संप्रभुता के मामले पर उच्च सदन की सहमति लेना जरूरी होता है. प्रथम चरण में भूटान के चार दलों ने चुनाव लड़ा, जिसमें अभी सत्ता में रही शेरिंग तोब्गे की पार्टी ‘पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी’ (पीडीपी) तीसरे स्थान पर चली गयी, जबकि आश्चर्यजनक तरीके से ‘द्रुक न्यामरूप शोगपा’ (डीएनटी) पहले स्थान पर रही और अभी तक रहा मुख्य विपक्षी दल ‘द्रुक फुएनसम शोगपा’ (डीपीटी) दूसरे स्थान पर रहा, यानी अब 18 अक्तूबर को डीएनटी और डीपीटी में टक्कर होगी. इन दोनों दलों में जो भी सर्वाधिक मत हासिल करेगा, वही भूटान में आगामी सरकार बनायेगा.

भूटान के चुनावों में और वहां लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने में भारत का योगदान रहा है और भूटान के सांसद भी भारतीय संसदीय प्रणाली को समझने के लिए भारतीय संसद की यात्रा करते रहे हैं.

भूटान के संसदीय चुनाव वहां के नरेश की देखरेख के अलावा अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पर्यवेक्षण में संपन्न होते हैं. साल 2013 के राष्ट्रीय सभा के चुनावों में यूरोपीय संघ ने अपने पर्यवेक्षकों को यहां भेजा था. चुनाव अभियान के बीच में ही एक जुलाई, 2013 को भारत ने भूटान को दी जा रही तेल सब्सिडी बंद कर दी. हालांकि, भारत ने इस बात से इनकार किया और चुनाव खत्म होते ही सब्सिडी शुरू कर दी. चीन ने कहा कि भारत इस कदम से चुनाव परिणामों पर प्रभाव डालना चाहता था और यह सब भूटान सरकार द्वारा चीन के साथ सीमा मुद्दे को सुलझाने के लिए उठाये गये महत्वपूर्ण कदम की प्रतिक्रिया थी.

यह चुनाव न केवल भूटान की आंतरिक राजनीति पर प्रभाव डालेगा, वरन क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय स्तर पर भी इसके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभाव होंगे. इस चुनाव से बीबीआइएन (उपक्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजना) जैसे समझौते का भविष्य जुड़ा है और साथ ही दोनों बड़े पड़ोसी देशों- भारत और चीन की नजर इन चुनावों पर होगी, क्योंकि नेतृत्व का बदलाव इन देशों के साथ आपसी रिश्तों को नयी दिशा दे सकता है. प्रथम चरण के परिणाम में दूसरे स्थान पर रही डीपीटी चीन के प्रति खुला रुख रखनेवाली पार्टी है. यदि वह सत्ता में आती है, तो भारत को भूटान के साथ अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा.

भूटान सदैव एक विश्वसनीय मित्र के रूप में भारत के साथ विकट परिस्थितियों में खड़ा रहा है और यहां सरकार चाहे किसी भी दल की हो, उसके रिश्ते भारत के साथ मधुर ही रहेंगे.

चुनावी घोषणापत्र में हालांकि दोनों दलों ने स्कूल, अस्पताल, सड़क, बिजली, पेयजल, सेल फोन इत्यादि मुद्दों का जिक्र किया है और भारत व चीन के मुद्दे चुनाव में नहीं हैं. लेकिन, भूटान में सोशल मीडिया पर पिछले चुनाव में भारत की गतिविधि को लेकर अब भी चर्चा हो रही है और साथ ही आत्म-निर्भरता और संप्रभुता जैसे मुद्दों को भी महत्व दिया जा रहा है.

बीते वर्ष डोकलाम मुद्दे पर चीन के साथ तनातनी के बाद भूटान की राजनीति और राजनीतिक नेतृत्व में भारत की रुचि वांछनीय हो गयी है. भूटान संसदीय चुनावों में लोगों की रुचि में वृद्धि और राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव की बयार नये भू-राजनीतिक समीकरण स्थापित कर सकती है.

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