बेहद खास है नाहन का मुहर्रम
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 21 Sep 2018 1:09 AM
प्रभात कुमार टिप्पणीकार kumarprabhat1818@gmail.com कभी हिमाचल का बेंगलुरु कहे जानेवाले शहर ‘नाहन’ के पानी से लबालब तालाब मेहमानों व पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं. हर साल मुहर्रम नाहन में एक खास शोकोत्सव बनके आता है. ‘नाहन’ हमेशा से अपने सर्वधर्म सद्भाव के लिए जाना जाता रहा है. बुजुर्ग बताते हैं कि […]
प्रभात कुमार
टिप्पणीकार
kumarprabhat1818@gmail.com
कभी हिमाचल का बेंगलुरु कहे जानेवाले शहर ‘नाहन’ के पानी से लबालब तालाब मेहमानों व पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं. हर साल मुहर्रम नाहन में एक खास शोकोत्सव बनके आता है.
‘नाहन’ हमेशा से अपने सर्वधर्म सद्भाव के लिए जाना जाता रहा है. बुजुर्ग बताते हैं कि जब देश का बंटवारा हो रहा था, तब भी यहां कोई दंगा नहीं हुआ. सबने सांप्रदायिक सौहार्द बनाये रखा. निसंदेह, इसका श्रेय यहां के तत्कालीन शासकों को जाता है, जिन्होंने शहर को बसाने के दौरान सभी धर्म के लोगों को यहां जगह दी. उन्होंने हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई व अन्य के दिलों में अद्भुत आपसी सम्मान व सद्भाव को भरा, जो आज भी कायम है. नाहनवासी हमेशा एक-दूसरे के त्योहारों व अन्य आयोजनों में खुशी के साथ शामिल होते हैं.
शिया और सुन्नी अनेक स्थानों पर अपने वैचारिक मतभेदों के कारण झगड़ों व खून-खराबों में उलझे देखे गये हैं. मुहर्रम पर भी इनमें कई मतभेद हैं. शिया मुस्लिम ही मुहर्रम को शिद्दत से मनाते हैं. नाहन में वर्तमान में एक भी शिया परिवार नहीं है, फिर भी सैकड़ों साल पुरानी रिवायत को निभाते हुए हर साल यहां के सुन्नी मुस्लिम मुहर्रम मनाते हैं. इसलिए यह बेहद खास है. सांप्रदायिक सौहार्द की लाजवाब मिसाल है नाहन का मुहर्रम.
महाराजा शमशेर प्रकाश के जमाने से लेकर आज तक मुहर्रम यहां पारंपरिक श्रद्धा से मनाया जा रहा है. यहां कोई इमामबाड़ा और अश्रुखाना नहीं है, पर मोहल्ले के खुले स्थान से इसकी शुरुआत होती है. मुहर्रम का चांद दिखने के साथ ही ढोल-ताशे बजने शुरू हो जाते हैं और नाहन की चार मुस्लिम आबादियों- गुन्नुघाट, हरिपुर, कुम्हार गली आैर कच्चा टैंक में हाजिरी शुरू हो जाती है.
रस्म मेहंदी से शुरुआत होती है. सब इकट्ठे होकर अल्लाह से मांगते हैं कि उनकी दुआएं कबूल हों. मेहंदी, रोटी का चूरमा, चुन्नियां, सूखे मेवे, अन्य चीजें तबर्रुख (प्रसाद) के रूप में भेंट की जाती हैं. छोटे ताजियों के पास चिराग जलाये जाते हैं. दो अलम (लंबे बांस में झंडा) जिन पर तीर-कमान, तलवार-ढाल, चांद-तारे और ‘अली’ व ‘हुसैन’ के हाथों की सांकेतिक अनुकृतियां होती हैं, रात को निकाली मेहंदी में साथ चलते हैं.
चांद की नवीं रात को सजे-धजे, सेहरा बंधे बड़े ताजिये अलम के साथ अपने-अपने क्षेत्र में निकाले जाते हैं. मर्सिया (शोकगीत) पढ़नेवालों की तन्मयता एक गमगीन माहौल रच देती है. पुराने लोग याद आते हैं, जो इतने अदब, बाकमाल और सलीके से मर्सिया पढ़ते थे कि दिल रो उठता था.
ताजिया बनाना-सजाना एक कलात्मक कार्य है. ताजिये के अगले हिस्से में सेहरा बनाया जाता है, जिसमें फूल, सूखा नारियल, छुआरे, किशमिश पिरोयी जाती है. उसे रंगीन चमकदार कपड़ों-कागजों से सजाया जाता है. उसका ऊपरी हिस्सा गुंबदनुमा आकर्षक होता है. बहुत से लोगों को पता नहीं है कि मुहर्रम कोई उत्सव नहीं, बल्कि शोक दिवस है. आज ‘अली’ व ‘हुसैन’ की शहादत को याद करने का दिन है.
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