ठेके पे चुनाव औ ठेंगे पे राजनीति

Published at :14 May 2014 4:16 AM (IST)
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ठेके पे चुनाव औ ठेंगे पे राजनीति

।। चंचल ।। सामाजिक कार्यकर्ता अब एक एजेंसी को किराये पर ले लीजिए, वक्त पर सब चकाचक मिलेगा. लॉडस्पीकर, तंबू, भीड़. भीड़ ढोने वाले वाहन. कितनी टोपी, कितना बुर्का, किसको किधर बैठना है. कैमरा कहां-कहां लगना है. भीड़ को कब नारा लगाना है. चुनाव हो गया. टेंसन खत्म. कल से फिर वही नून, तेल, लकड़ी. […]

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।। चंचल ।।

सामाजिक कार्यकर्ता

अब एक एजेंसी को किराये पर ले लीजिए, वक्त पर सब चकाचक मिलेगा. लॉडस्पीकर, तंबू, भीड़. भीड़ ढोने वाले वाहन. कितनी टोपी, कितना बुर्का, किसको किधर बैठना है. कैमरा कहां-कहां लगना है. भीड़ को कब नारा लगाना है.

चुनाव हो गया. टेंसन खत्म. कल से फिर वही नून, तेल, लकड़ी. कहते हुए कयूम मियां धप्प से खटिया पे गिरे और लेट गये. फातिमा ने बाबा से शिकायत की- इस उम्र में आप एजेंट बन रहे हैं, न दाना न पानी. दिनभर भूखे प्यासे गरमी ऊपर से जुलुम जोर, हुवां मदरसे पे न पेड़ न रूख. कयूम ने करवट बदला- ना बिटिया! तू ना बुझबू येही निजाम खातिर इस देश ने क्या-क्या नहीं सहा है.

जेल, लाठी, फांसी, काला पानी, तब जाके देश आजाद भवा औ हमें ई फैसला करे क हक मिला की हम अपने मनमर्जी क सरकार बनावें. खुद मुख्तारी के निजाम गांधी बाबा की देन है बिटिया. टाटा हो बिरला उनके वोट की कीमत गफूरन के वोट से ज्यादा कीमती ना हो. एक काम कर बिटिया हमके एक लोटा पानी दे दे औ लखन कहार के बुला लाव. कही देहे ऊ आपण बडकी चाकू लेहे आवे. फातिमा ने पानी दिया औ लखन कहार के घर की और मुड़ गयी. जब वह लौटी तब तक हबीब के नीम के नीचे महफिल जम चुकी है.

सब ने वोट दिया है कोई किसी को नहीं बता रहा कि किसने किसको वोट दिया, लेकिन जानते सब हैं. अब भला नीम की छांव को इस मतभेद से क्या लेना-देना, वह सब को सहला कर लाल्साहेब की दुकान की और बढ़ जा रही है. वरना लाल्साहेब क्यों चीखते-का हो पंचो, आज का कट रहा है? कयूम ने वहीं से आवाज दी- तरबूज कट रहा है बेटा, मुंह में जीभ होय त पगहा समेत आय जा.

चिखुरी को हंसी आ गयी. लखन के गमछे पर केले का पत्ता बिछा. पत्ते पर तरबूज कटा. उमर दरजी ने हिदायत दी कीन उपधिया की तरफ देखते हुए- एक एक.. कोइ ज्यादा ना लहै भैया. कयूम चचा के मेहनत का फल है. कयूम मुसकुरा दिए. कीन को लगा कि यह तरबूज हिंदू ना है. उनके मुंह का जायका कई लोगों ने भांप लिया. चिखुरी ने कहा- उमर! ऊ बड़का टुकड़ा कीन के पकड़ा दे तो. कीन ने काट दिया- नाही कक्का! हम तरबूज ना खाते, तुरते जुकाम हो जाई. नवल ने उस टुकड़े को लपक लिया, यह हमारी बिरादरी के नाम की है. तरबूज से सियासत कब निकल आयी किसी ने नहीं देखा. पर सियासत जेरे बहस हो गयी.

कयूम ने कहा- चिखुरी काका! ई वाला चुनाव देखा! न सियासत की बात, न कोइ मुद्दा. बस हो हल्ला औ हो गया चुनाव. ससुरा चुनाव न हुआ चुन्नी लाल का छान हो गयी. बीस हाथ लंबा औ बारह हाथ चौड़ा सरपत के छान. हां हो, हां हो कर के उठाये और छूहे पे धर के चले आये. राजनीति गयी ठेंगे पे औ चुनाव गया ठेके पे. नवल उपाधिया की आंख गोल हो गयी. ठेके पे? चुनाव ठेके पे? ऊ कैसे?

मद्दू का पत्रकार जगा, उसने समझाना शुरू किया. पुराने जमाने में किसी काम में पूरा गांव इकट्ठा होता था और घर-घर में गेहूं बांट दिया जाता था. हर घर में पिसाई होती थी. गांवभर के बिस्तर और चारपाई इकट्ठी होती थी. कुम्हार बरतन देता था मुसहर दोना-पत्तल देता था. लेकिन आज क्या है बाबू? सब ठेके पे. खाना बनाने से लेकर टेंट तक. ठेके पे हो रहा है की नहीं? उसी तरह इस बार का चुनाव भी शुरू हुआ है. इसे अंगरेजी में कहते हैं ‘इवेंट मनेजमेंट’, जैसे फिल्म में होता है. भीड़ किराये पर. उनके कपड़े किराये पर. भीड़ क्या बोलेगी वह भी सिखा दिया जाता है. जो ठेका लेता रहा उसे अब तक ‘सप्लायर’ कहा जाता रहा. अब उसे इवेंट मैनेजर कहा जाने लगा है.

चिखुरी चौंके-ऐसा सच में हमने तो सोचा भी न था. कैसे होता है जरा खुल कर बताइये तो. मद्दू वजनी हुए- अब एक एजेंसी को किराये पर ले लीजिए. प्रति रैली के हिसाब से पेमेंट कर दीजिए. वक्त पर सब चकाचक मिलेगा. तंबू, लॉडस्पीकर, भीड़. भीड़ ढोने वाले वाहन. किस उम्र की भीड़, किस लिंग की कितनी भीड़. क्या पहनावा. कितनी टोपी, कितना बुर्का, किसको किस तरफ बैठना है. कैमरा कहां-कहां लगना है. भीड़ को कब नारा लगाना है, क्या बोलना है सबकुछ पहले से तयशुदा. अब इसे दुनिया को भी दिखाना है. इसके लिए ‘डिब्बा’ वालों को खरीद लो. बस काम फिट. केवल खेल पैसे का. र्हे लगे न फिटकरी रंग चोखा.

नवल उपाधिया की आंख गोल हो गयी- हे भगवान! लाल्साहेब ने नवल को चुटकी काट दिया. त इसमें चौंकनेवाली का बात है. अपने गांव मां देख. पहले रामायण होत रहा, लोग घंटा दू घंटा मन से गाते रहे, अब वो भी ठेके पे चलने लगा है. पहले नेता आते रहे घर-घर, गांव-गांव मिलते रहे. दुखदर्द समझते रहे. अब देखो नेताजी उड़नखटोला से उतरे बोले, चलता बने. कहां गयी राजनीति? जनता से दूर रह कर जनता की राजनीति चलानेवाले छल कर रहे हैं. इसे तोड़े बगैर हम सियासत को सीधी नहीं कर सकते. रेडियो पर बज रहा है- मोसे छल किये जाये.. ‘कुल चार सवाल हैं, हर सवाल का जवाब एक-दूसरे से भिड़ा पड़ा है. लंगड़ी भिन्न माफिक. इस मुल्क को इस सवाल का हल ढूंढ़ना होगा.’ चिखुरी बुदबुदाते रहे.

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