नतीजों की आस में बैठे हैं बच्चे

मैं आपके अखबार के माध्यम से रांची विश्वविद्यालय में चल रहे पीजी कोर्स के बारे में कुछ कहना चाहता हूं. रांची विश्वविद्यालय का पहला सेमेस्टर बैच था 2011-2013 , लेकिन 2014 का अप्रैल माह खत्म हो जाने पर भी हमारा सेशन खत्म नहीं हुआ है. हमने 2011 में अपना नामांकन करवाया था. नियमानुसार 2013 तक […]
मैं आपके अखबार के माध्यम से रांची विश्वविद्यालय में चल रहे पीजी कोर्स के बारे में कुछ कहना चाहता हूं. रांची विश्वविद्यालय का पहला सेमेस्टर बैच था 2011-2013 , लेकिन 2014 का अप्रैल माह खत्म हो जाने पर भी हमारा सेशन खत्म नहीं हुआ है. हमने 2011 में अपना नामांकन करवाया था. नियमानुसार 2013 तक हमारा कोर्स खत्म हो जाना चाहिए था, पर अफसोस की बात है कि हमारी अंतिम परीक्षा ही जनवरी 2014 से शुरू हुई और नतीजे का अब तक कोई अता-पता नहीं है.
दो साल के पीजी कोर्स में हम बच्चे तीन साल दे रहे हैं, यह कैसी शिक्षा व्यवस्था है! इन सबके कारण हम बहुत सारे इंटरव्यू और प्रतियोगिता परीक्षा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि वहां हमारा फाइनल रिजल्ट मांगा जा रहा है. छात्र संगठन बेमतलब के मुद्दों को लेकर नारेबाजी करते रहते हैं, लेकिन इस विषय में कोई चर्चा नहीं हो रही है. किसी न किसी को तो इसकी जिम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी. इस विषय में अगर विश्वविद्यालय के किसी कर्मचारी से पूछा भी जाता है, तो कोई बोलने को तैयार नहीं होता. हमें डांट कर भगा दिया जाता है. कई बार तो बताया जाता है कि अगर ज्यादा सवाल-जवाब किया तो फेल कर दिये जाओगे. ऐसे में हमारा भविष्य अधर में लटका हुआ है.
सरकार के पास नौकरियों की भरमार तो होती नहीं, अगर अब हम निजी क्षेत्रों में भी जाना चाहेंगे, तो रिजल्ट के कारण हमें वहां भी प्रवेश नहीं मिल पायेगा. यह छात्रों के भविष्य के साथ खेलवाड़ ही तो है! मैं शिक्षा मंत्री से आग्रह करता हूं कि इस विषय में वे जल्द से जल्द सख्त कदम उठायें. उन्हें ऐसे नियम लागू करने चाहिए, जिसमें परीक्षा होने के 45 दिनों के अंदर ही नतीजा निकाल दिया जाये. नतीजे जल्दी आ जाने पर बच्चे भी तय कर सकेंगे कि उन्हें किस क्षेत्र में जाना है.
एक छात्र
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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