पाकिस्तान का दिखावा है प्रतिबंध

Updated at : 15 Feb 2018 6:55 AM (IST)
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पाकिस्तान का दिखावा है प्रतिबंध

II डी भट्टाचार्जी II रिसर्च फेलो, आईसीडब्ल्यूए dhrubajyoti2005@gmail.com पाकिस्तान उन आतंकवादी समूहों और व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई करने में एक विचित्र दुविधापूर्ण चुनौती का सामना कर रहा है, जिन्हें सरकार और सेना की तरफ से पिछले तीन दशकों से संरक्षण मिल रहा है. इसीलिए अब माहौल बन रहा है कि पाकिस्तान पर दबाव है कि […]

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II डी भट्टाचार्जी II

रिसर्च फेलो, आईसीडब्ल्यूए

dhrubajyoti2005@gmail.com

पाकिस्तान उन आतंकवादी समूहों और व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई करने में एक विचित्र दुविधापूर्ण चुनौती का सामना कर रहा है, जिन्हें सरकार और सेना की तरफ से पिछले तीन दशकों से संरक्षण मिल रहा है. इसीलिए अब माहौल बन रहा है कि पाकिस्तान पर दबाव है कि वह आतंकवाद के खिलाफ कदम उठाये. इसके अंतर्गत अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान सरकार की आतंकवादी समूहों को राज्य द्वारा समर्थित नीति पर नाराजगी जाहिर की, चीनी नागरिकों पर पाकिस्तान में हमला, जिससे पाकिस्तान में चीनी नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न भी उठा और इसके कारण पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्तों में भी खटास आयी.

ये आतंकवादी समूह अफगान और भारत में निरंतर आतंकी हमले करते रहते है. अभी हाल ही में सुजवां आर्मी कैंप और 28 जनवरी को काबुल में हुए आतंकी हमले में 95 अफगानी नागरिकों की जान गयी. ये ऐसे उदाहरण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि ये आतंकी समूह भारत और अफगानिस्तान में हमले कर एक युद्ध का माहौल खड़ा करते हैं.

नौ फरवरी को पाकिस्तान के राष्ट्रपति ममनून हुसैन ने आतंकवाद निरोध अधिनियम, 1997 में संशोधन अध्यादेश जारी किया, जो कि उन आतंकी समूहों और व्यक्तियों को प्रतिबंधित करने के लिए था, जिसकी सूची संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् ने जारी की थी. इस संशोधन अधिनियम से कुछ समूहों जैसे हाफिज सईद के जमात-उद-दावा और फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन पर कुछ शिकंजा कसा. पाकिस्तानी राष्ट्रपति की तरफ से हालांकि यह स्वागत योग्य कदम था, लेकिन सरकार का दृष्टिकोण उन ‘अच्छे आतंकवादियों’ के प्रति नहीं बदला, जिन्हें 1980 के दशक से सरकार का समर्थन मिल रहा था.

पाकिस्तान का समाज उन उभरते हुए कट्टरपंथी इस्लामिक राजनीतिक दलों की ताकतों से जूझ रहा है, जो कि राष्ट्रीय एसेंबली और प्रांतीय विधानसभाओं में नागरिक सरकार को धरनों, नाकेबंदी और हिंसा से ब्लैकमेल कर रहे हैं. पाकिस्तान के भीतर भी आतंकी हमले बढ़ रहे हैं, जो यह प्रमाणित करता है कि ‘अच्छे और बुरे आतंकवाद’ से पकिस्तान की खुद के शासन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं.

आतंकवादी समूहों ने कट्टरपंथी इस्लामिक राजनीतिक दलों को समर्थन देना शुरू कर दिया है और प्रांतीय विधानसभाओं में उनकी सीटों में वृद्धि भी हो रही है. अभी हाल ही में हुए मुल्तान के चुनावों में तहरीक-ए-लब्बैक या रसूलल्लाह (यह एक कट्टरपंथी दल है) ने पाकिस्तान पीपल्स पार्टी से ज्यादा सीटें जीती हैं, यह पाकिस्तान की सिविल सोसाइटी के लिए खतरे की घंटी है.

भारत को पाकिस्तान के राष्ट्रपति के इस कदम पर ज्यादा खुश नहीं होना चाहिए, यह केवल कागजी कार्रवाई मात्र है.हमें याद रखना चाहिए कि यह वही हाफिज सईद है, जिसे पिछले वर्ष नवंबर में इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने नजरबंदी से मुक्त कर दिया था, जिसके खिलाफ कानून व्यवस्था कोई पर्याप्त सबूत नहीं जुटा पायी थी. पाकिस्तान लगातार कुछ व्यक्तियों और समूहों जैसे मसूद अजहर, दाऊद इब्राहिम, हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा आदि को आर्थिक रूप से सहायता प्रदान करता आ रहा है. जब कभी अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता है, तो पाकिस्तान इन आतंकी समूहों पर दिखावे के लिए कार्रवाई करता है. लेकिन जैसे ही दबाव कम होता है, न्यायालय में पर्याप्त सबूत न होने का हवाला देकर इन आतंकी समूहों और व्यक्तियों को क्लीन चिट दे दी जाती है.

परिवर्तन तभी संभव है, जब आतंकी ट्रेनिंग कैंप, फंडिंग एजेंसी और संस्था समर्थित आतंकी सगठनों को बंद किया जाये. इसके अतिरिक्त सरकारी एजेंसियों- जैसे पाकिस्तान का गुप्तचर विभाग और सेना जो ऐसे आतंकी समूहों को बल दे रही है और इसे एक सामरिक उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर रही है आदि, इन सबसे पाकिस्तान को कुछ हासिल होनेवाला नहीं है.

अमेरिका और यूरोपीय संघ ने फाइनेंस टास्क फोर्स एक्शन के साथ एक प्रस्ताव स्वीकार किया, जिसमें पाकिस्तान को ऐसे देशों की सूची में डालने की बात कही गयी, जो आतंक-निरोधी पैमानों पर खरे नहीं उतरते, जो स्वागतयोग्य कदम है. चीन और रूस को भी मध्य एशिया के देशों के साथ मिलकर ऐसे कदम उठाने चाहिए, जिससे पाकिस्तान की नागरिक सरकार को ऐसे समूहों के खिलाफ कार्रवाई कर सके, जो अब भी आतंकी सगठनों को समर्थन और वित्तीय सहायता प्रदान कर रहे हैं. पाकिस्तान पर आतंकवाद के खिलाफ उसकी तरफ से सख्त कदम न उठाये जाने की दशा में वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक प्रतिबंध लगा देना चाहिए.

पाकिस्तान के साथ संवाद करते समय यह समझना जरूरी है कि पाकिस्तान यदि लगातार आतंकी समूहों पर कार्रवाई नहीं करता है, तो बातचीत करना व्यर्थ है. हमें 1999 की वह घटना याद रखनी चाहिए, जब पाकिस्तान की नागरिक सरकार और भारत लाहौर में शांति का मार्ग खोज रहे थे, तब पाकिस्तान की सेना ने आतकंवादी समूहों को कारगिल में घुसपैठ करने में मदद की, जिसके चलते भारत-पाकिस्तान के बीच कारगिल में बड़ा सीमा संघर्ष हुआ. उस वक्त तो पाकिस्तान की सरकार, आर्मी और गुप्तचर एजेंसियों ने आतंकवाद को समर्थन देना बंद कर दिया था, जो उनकी स्टेट पाॅलिसी का हिस्सा था, लेकिन धरातल पर ऐसा नहीं हो पाया. और यह बाद में भी जारी रहा.

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