चुनाव में दावं पर मीडिया की साख

Published at :28 Apr 2014 4:49 AM (IST)
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चुनाव में दावं पर मीडिया की साख

।। रवीश कुमार।। (वरिष्ठ पत्रकार) इस चुनाव में मीडिया निष्पक्षता का जितना भी दावा कर ले, लेकिन नुक्कड़ों पर इसकी पक्षधरता की खूब चर्चा हो रही है. मैं चुनावी कवरेज के लिए जहां भी जाता हूं, लोग पूछ देते हैं कि क्या आप मोदी का प्रचार कर रहे हैं. अलग-अलग आर्थिक और जातिगत समाज में […]

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।। रवीश कुमार।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

इस चुनाव में मीडिया निष्पक्षता का जितना भी दावा कर ले, लेकिन नुक्कड़ों पर इसकी पक्षधरता की खूब चर्चा हो रही है. मैं चुनावी कवरेज के लिए जहां भी जाता हूं, लोग पूछ देते हैं कि क्या आप मोदी का प्रचार कर रहे हैं. अलग-अलग आर्थिक और जातिगत समाज में यह सवाल गुस्से की शक्ल में मुझसे पूछा गया- टीवी पर दूसरी कोई खबर ही नहीं दिखती है, सिर्फ मोदी की रैली की तसवीर, उनके भाषण और उनकी बातों, उनके दावों या हमले को लेकर ही बहस होती रहती है? बाकी नेताओं की रैलियों के कवरेज क्यों न के बराबर हैं? इस तरह के सवाल कोई मीडिया का एक्सपर्ट करे, तो बात कुछ समझ में आती है. लेकिन, ये सवाल तो उन लोगों के हैं, जो किसी न्यूज चैनल या किसी अखबार को शायद ही कभी खत भी लिखें. लोग अब मीडिया की हर चाल को अपने आम विवेक से नापने-तौलने लगे हैं. कौन किस ओर झुक कर चल रहा है या कौन तन कर चल रहा है, इसका ठीक-ठीक अंदाजा अब लोग करने लगे हैं.

हर चुनाव में राजनीतिक पार्टियां बाकायदा रणनीति बनाती हैं कि मीडिया का कैसे इस्तेमाल करना है. तमाम ऐसे वैध तरीके हैं, जिनसे कोई मीडिया संस्थान इन दलों से विज्ञापन लेता है, पर लोग विज्ञापन को लेकर मीडिया से सवाल नहीं कर रहे हैं. वो सवाल कर रहे हैं कि जो खबरों का स्पेस है, उसका बरताव विज्ञापन के जैसा क्यों है? खबर की शक्ल में प्रचार क्यों दिखायी देता है? मुजफ्फरनगर में एक शख्स ने कहा कि जब भी टीवी खोलो मोदी ही मोदी ही सुनायी-दिखायी देते हैं. हमारे नेता की तो कोई बात ही नहीं आती. ऐसा नहीं है कि मीडिया ने अन्य दलों को कवर नहीं किया है, लेकिन इसमें भाजपा और कांग्रेस का पक्ष तो ज्यादा है ही. क्षेत्रीय दलों के प्रति मीडिया का नजरिया ऐसा दिख रहा है, जैसे ये दल राष्ट्र के विकास में खर-पतवार की तरह उग आये हों.

सोशल मीडिया पर लोग बनारस में केजरीवाल और मोदी के नामांकन कवरेज को लेकर सवाल कर रहे हैं. केजरीवाल के कवरेज में संवाददाताओं की बातों का उल्लेख कर रहे हैं. वे कह रहे हैं कि कैसे संवाददाता और एंकर बात कर रहे हैं कि नामांकन के जुलूस में बदल जाने से ट्रैफिक की समस्या पैदा हो गयी है, मगर वही संवाददाता मोदी की नामांकन यात्र की भव्यता पर मोहित हो जाता है.

एक सच्चाई यह है कि अलग-अलग राज्यों में विभिन्न पार्टियों पर मीडिया पर अंकुश लगाने से लेकर उसका इस्तेमाल करने तक के आरोप लगते हैं. लेकिन, क्या मीडिया खुद संतुलित व्यवहार कर रहा है? इस चुनाव में राज ठाकरे की पार्टी कितनी सीटों पर चुनाव लड़ रही है, मगर दिग्गज पत्रकारों ने उनके एक-एक घंटे के इंटरव्यू किये. क्या इस अनुपात में आपने लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, मायावती का इंटरव्यू या उनकी रैली का कवरेज देखा? टीवी पर रोजाना मोदी व राहुल की दो से तीन रैलियों का प्रसारण होता है, क्या उस अनुपात में बाकी रैलियों को जगह मिल रही है? क्या यह अतिरेक अपने आप हो रहा है या इसके पीछे कोई दबाव है, लोग यह जानना चाहते हैं.

चुनाव के अतिव्यस्त समय में दिये जा रहे एक घंटे के इंटरव्यू को भी संदेह की नजर से देखा जा रहा है. लोग इंटरव्यू के जवाब से ज्यादा यह चर्चा कर रहे हैं कि इंटरव्यू करनेवाला पत्रकार उस नेता या उसकी पार्टी की विचारधारा के प्रति सहानुभूति रखनेवाला तो नहीं है! कहां तो इंटरव्यू को लेकर नेता की खिंचाई होनी चाहिए, पर हो रही है पत्रकारों की!

हालांकि जिस तरह से मीडिया की हरकत में लोगों को अतिरेक नजर आ रहा है, उसी तरह से लोगों की बातों में भी अतिरेक हो सकता है. एक धारणा सी बन जाती है. इसलिए जरूरी है कि एक नागरिक आयोग बने, जो कम-से-कम दस प्रमुख चैनल और दस बड़े अखबारों की चुनावी कवरेज का तथ्यात्मक अध्ययन करे. इसकी रिपोर्ट का प्रसारण/ प्रकाशन सभी चैनलों और अखबारों के लिए अनिवार्य किया जाये, ताकि मीडिया को लेकर उठ रहे सवालों का तथ्यात्मक जवाब दिया जा सके. नागरिक आयोग को यह भी देखना चाहिए कि क्या कवरेज में स्वाभाविक से लगनेवाले असंतुलन को पेड न्यूज के दायरे में रखा जा सकता है?

आगामी 16 मई को सिर्फ राजनीतिक पार्टियों का ही नतीजा नहीं आनेवाला है, बल्कि एक नतीजा मीडिया का भी निकलेगा. अगर सर्वे और मीडिया के बनाये विजयी व्याख्यान फेल हो गये, तो लोग मीडिया को लेकर और भी आशंकित हो जायेंगे. 16 मई का चुनाव परिणाम यह भी बतानेवाला है कि क्या मीडिया किसी की सरकार बनवा सकता है? क्या किसी दल को एक सीमा से ज्यादा मीडिया में निवेश करना चाहिए? क्या मीडिया को किसी की हार-जीत का अनाउंसर होना चाहिए या ज्यादा से ज्यादा मुद्दों को सामने लाना चाहिए, जिससे राजनीति पर दबाव बने. देखते हैं कि आप पाठकों या दर्शकों का क्या फैसला आता है!

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