उद्योगों को संरक्षण तो मिलना ही चाहिए

झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता के बीच पिछले 13 वर्षो में शासन-प्रशासन ने विकास का रोड-मैप तक नहीं बनाया. कामकाज के स्तर पर पारदर्शिता और विजन का अभाव रहा. हिंदी पट्टी के बीमार राज्यों की तरह संसाधन संपन्न झारखंड भी ढ़ुलमुल गवर्नेस के रास्ते पर चलता रहा. नतीजा, यहां के उद्योग धंधों के विस्तार के लिए […]
झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता के बीच पिछले 13 वर्षो में शासन-प्रशासन ने विकास का रोड-मैप तक नहीं बनाया. कामकाज के स्तर पर पारदर्शिता और विजन का अभाव रहा. हिंदी पट्टी के बीमार राज्यों की तरह संसाधन संपन्न झारखंड भी ढ़ुलमुल गवर्नेस के रास्ते पर चलता रहा. नतीजा, यहां के उद्योग धंधों के विस्तार के लिए कोई ठोस नीति नहीं बन सकी. कभी यह तय ही नहीं हो पाया कि अपनी शर्तो पर हम कैसे विकास करेंगे.
अब खबर है कि पिछले वर्षो में राज्य में 50 से ज्यादा स्पंज आयरन उद्योग बंद हो गये क्योंकि राज्य के लौह अयस्क इन उद्योगों के लिए नहीं थे. स्थानीय उद्योग बाजार से लौह अयस्क ऊंची कीमत पर खरीदते थे. झारखंड की बिडंबना है कि यहां के उद्योग कराहते रहे. लोग बेरोजगार होते. लेकिन सरकार बाहरी कंपनियों को बुलाने के लिए परेशान रही. इसके लिए मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री- अफसरों तक ने विदेश के दौरे किये. 72 एमओयू हुए. कुछ कंपनियां टर्न-अप नहीं हुईं, तो एमओयू रद्द किये गये. फिलहाल 38 एमओयू बच गये हैं.
उद्योगों के लिए सरकार के पास कभी कारगर भूमि नीति नहीं बनी. जिंदल, मित्तल, एस्सार, टाटा, हिंडालको जैसी कंपनियों ने यहां स्टील प्लांट लगाने के लिए आवदेन दिये. इनको जमीन ही नहीं मिल पायी. जनता को विश्वास में लेने का काम सरकार की तरफ से नहीं हुआ. भूमि अधिग्रहण से लेकर विस्थापन-पुनर्वास के लिए जन स्वीकार्य नीति का ख्याल ही नहीं आया. उद्योग और अवाम के बीच समझदारी पैदा करने का प्रयास भी नहीं हुआ. अब जबकि उद्योग धंधे बंद हो रहे हैं, तो एक किस्म से अचेतावस्था को दूर करने का प्रयास हो रहा है.
बीमार व बंद हो रहे उद्योगों ने सरकार का दरवाजा खटखटाया है. ओड़िशा सरकार ने जिस व्यवस्था लागू की है, उसी तर्ज पर स्थानीय उद्योग लौह अयस्क में 50 फीसदी हिस्सेदारी मांग रहे हैं. मांगें कितनी जायज हैं, ये तो अलग पहलू हैं. पर, गेंद फिर सरकार के पाले में है. देखना है कि वह क्या कदम उठाती है. लेकिन यह तय है कि इन उद्योगों से हजारों लोगों का भविष्य जुड़ा है. ऐसे हालात में सरकार का यह नैतिक दायित्व है कि वह उद्योगों को संरक्षण दे, उन्हें बंद होने से बचाये. तभी राज्य का विकास होगा और लोगों को रोजगार भी मिलेगा.
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