लोकतंत्र में कहां है वंशवाद!

चुनाव के दौरान, कतिपय राजनैतिक दलों द्वारा वंशवाद पर कड़ा आक्षेप लगाते हुए एक दल विशेष पर बार-बार प्रहार किया जाना, जनता को मात्र बरगलाने का प्रयास प्रतीत होता है. वंशवाद तो सही मायने में राजतंत्र की व्यवस्था है, जिसमें राजा का ज्येष्ठ पुत्र राजा होता है और वही युवराज कहा जाता है. लेकिन प्रजातांत्रिक […]
चुनाव के दौरान, कतिपय राजनैतिक दलों द्वारा वंशवाद पर कड़ा आक्षेप लगाते हुए एक दल विशेष पर बार-बार प्रहार किया जाना, जनता को मात्र बरगलाने का प्रयास प्रतीत होता है. वंशवाद तो सही मायने में राजतंत्र की व्यवस्था है, जिसमें राजा का ज्येष्ठ पुत्र राजा होता है और वही युवराज कहा जाता है. लेकिन प्रजातांत्रिक व्यवस्था में कोई भी जनप्रतिनिधि जनता के द्वारा ही चुनाव जीत कर आता है, और बाद में दल विशेष उन चुन कर आये जनप्रतिनिधियों को सर्वसम्मति से दल के अंदर विशेष पद देते हैं. ताजपोशी जैसी कोई चीज नहीं होती है.
यह संयोग मात्र है कि चुन कर आये प्रतिनिधि किसी दल विशेष में पिता-पुत्र, माता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-भाई, भाई-भतीजा, साला-बहनोई इत्यादि जैसे सगे रिश्ते के हो सकते हैं. इसमें उनका कोई दोष नहीं है. जब जनता ने चुना तो वे जीत कर आये हैं और ऐसा किसी एक दल में नहीं, बल्कि लगभग हर दल में हो रहा है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है कि जो जिस क्षेत्र में रहता है, चाहता है कि उसके बाल-बच्चे भी उसी क्षेत्र में आयें. यह राजनीति में ही नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में है. चिकित्सा, शिक्षा, वकालत, प्रशासन, व्यवसाय, कला, खेल और यहां तक कि गलत क्षेत्र में भी काम कर रहे अधिकांश लोगों के बच्चे भी उसी क्षेत्र में जाते हैं. क्या ये वंशवाद के प्रतीक नहीं हैं?
दरअसल, क्षेत्र चाहे जो भी हो, राजनैतिक हो अथवा गैर-राजनैतिक, अपनी प्रतिभा के बल पर ही कोई आगे बढ़ पाता है. हर संतान अपने माता-पिता के लिए शहजादा ही होती है. वर्तमान राजनीति में सभी चुन कर आये लोग जनप्रतिनिधि होते हैं. उनके निजी रिश्तों पर राजनीतिक लाभ के लिए की गयी कटु आलोचना का बहिष्कार किया जाना चाहिए.
मणींद्र मोहन सहाय, राजारहाट, कोलकाता
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