पीओके से लौटे युवाओं का दर्द समझें

।। शुजात बुखारी।। (एडिटर, राइजिंग कश्मीर) जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 22 फरवरी को राज्य विधानसभा में जानकारी दी कि उनकी सरकार की चर्चित पुनर्वास नीति के तहत 308 आतंकी अपने परिवार समेत पाक-अधिकृत कश्मीर से लौट आये हैं और शांतिपूर्ण तरीके से जीवन यापन कर रहे हैं. लेकिन इन परिवारों की आपबीती और […]
।। शुजात बुखारी।।
(एडिटर, राइजिंग कश्मीर)
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 22 फरवरी को राज्य विधानसभा में जानकारी दी कि उनकी सरकार की चर्चित पुनर्वास नीति के तहत 308 आतंकी अपने परिवार समेत पाक-अधिकृत कश्मीर से लौट आये हैं और शांतिपूर्ण तरीके से जीवन यापन कर रहे हैं. लेकिन इन परिवारों की आपबीती और एक ऐसे ‘आतंकी’ व एक अन्य की पत्नी की आत्महत्या की घटनाओं को देख कर कोई भी यह आसानी से यह कह सकता है कि मुख्यमंत्री ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा तैयार बयान बस पढ़ दियाथा. इस बयान में न सिर्फ उस ‘भावना’ की कमी है, जिसके साथ शायद सरकार ने यह नीति घोषित की थी और ‘गुमराह युवाओं’ के पुनर्वास का श्रेय लिया था, बल्कि इससे यह भी पता चलता है कि राज्य मानवीय मसलों में किस कदर लापरवाह है.
इन युवाओं के पुनर्वास की कहानी प्रारंभ से ही घृणास्पद रही है. 1990 के दशक के शुरू में जो 1500 से अधिक युवा नियंत्रण रेखा पार कर पाक अधिकृत कश्मीर चले गये थे, अब उन्हें परिवार से बिछड़ने का संताप सता रहा है. मुजफ्फराबाद की यात्रओं के दौरान मैंने खुद कुछ ऐसे युवकों से बात की है. उनमें से कुछ बढ़िया तरीके से स्थापित हो चुके हैं और उनका अच्छा-खासा व्यापार है, लेकिन उस जगह से वे अपने को जुड़ा हुआ महसूस नहीं करते. मुजफ्फराबाद के प्रसिद्ध मदीना बाजार में कई दुकानों के मालिक एक व्यक्ति ने मुङो बताया कि सांस्कृतिक रूप से हम बिल्कुल अलग हैं. मेरा अच्छा व्यवसाय है और मेरी शादी भी यहीं हो गयी है, लेकिन अब भी मैं खुद को एक बाहरी आदमी महसूस करता हूं, जो अपनी मां से मिलने के लिए तड़प रहा है. जिन युवकों ने 2008 और 2009 में कश्मीर से नियंत्रण रेखा पार की है, वे भी ऐसा ही मानते हैं. चूंकि इसलामाबाद और मुजफ्फराबाद की सरकारें हिंसक ‘आजादी की लड़ाई’ को हतोत्साहित कर रही हैं, इसका खामियाजा भी इन युवाओं को भुगतना पड़ रहा है. अनेकों ने वहीं शादी कर ली है और उनके बच्चे भी हैं, लेकिन वे स्थानीय संस्कृति से जुड़ नहीं सके हैं और अपने परिवार के पास वापस लौट जाना चाहते हैं.
इसीलिए भारत सरकार से बातचीत कर जब राज्य सरकार ने पुनर्वास नीति की घोषणा की तो उसका स्वागत किया गया. फिर भी, यह उम्मीद करना भोलापन था कि जो युवक आतंकी होने के लिए नियंत्रण रेखा के पार गया हो, वह पाकिस्तानी पासपोर्ट के साथ बिना किसी मुश्किल बरास्ते नियंत्रण रेखा, वाघा बॉर्डर या किसी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भारत वापस आ सकता है. लेकिन सच यह है कि भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने नेपाल सीमा से इसे अंजाम देने की एक गोपनीय समझदारी बनायी. पाकिस्तान के लिए इन युवकों को खुलेआम भेज पाना कठिन था, क्योंकि उसने कभी आधिकारिक रूप से यह स्वीकार नहीं किया है कि वह ‘लड़ाकों’ को अपनी धरती पर प्रशिक्षित करता रहा है और भारत सरकार इस तरीके से अपने यहां की दक्षिणपंथी पार्टियों की आलोचना से बच जाती.
बहरहाल, इस नीति की मूल भावना इसे परस्पर भरोसे की बहाली के लिए ‘बैक चैनल’ के जरिये एक ठोस कदम के रूप में लागू करना थी. दिल्ली पुलिस द्वारा कुपवाड़ा के लियाकत शाह को नेपाल सीमा से पकड़ कर फर्जी मामले में फंसाने जैसी कुछ स्वार्थी तत्वों की हरकतों के बावजूद इस नीति के तहत 300 से अधिक युवकों की वापसी हुई. लेकिन, वापसी के बाद के प्रयासों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया और ये युवक घाटी में हर तरह से ‘बाहरी’ बने रहे. कुछ ही लोग अपने परिवार के साथ आराम से बस पाये. वापस आयीं महिलाओं के सामने कश्मीर के परिवारों के साथ घुल-मिल पाने की समस्या थी. लेकिन इससे भी बड़ी समस्या इन महिलाओं और बच्चों को तुरंत राज्य की नागरिकता नहीं मिलना था. इससे बच्चों की शिक्षा पर बुरा असर पड़ा. सरकार की अनुमति के बावजूद बहुत से परिवारों को कुछ दिन पुलिस थानों में बिताना पड़ा और उन्हें यात्रा-संबंधी दस्तावेज मिलने में भी परेशानियां हुईं. इसी तरह की अन्य समस्याएं थीं, जिनकी वजह से उन्हें क ई परेशानियां उठानी पड़ी.
इन मुश्किलों से मजबूर होकर ही 11 अप्रैल को बाग मुजफ्फराबाद की तीस साल उम्र की सायरा भट्ट ने सोनावरी के नैदखई गांव में आत्मदाह कर लिया. वह अपने पति जावेद अहमद भट्ट और तीन बच्चों के साथ बेहतर भविष्य की आस में कश्मीर आयी थी. यात्रा के लिए अनुमति-पत्र नहीं होने के कारण वह अपने माता-पिता से नहीं मिल पा रही थी. भट्ट 1993 में आतंकी प्रशिक्षण के लिए पाक-अधिकृत कश्मीर गया था और 2012 में कश्मीर लौट आया था. इसी तरह, पांच बच्चों और पत्नी के साथ पिछले साल लौटे क्रिरी के बशीर अहमद ने आत्मदाह कर लिया, क्योंकि उसे पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं मिल रहा था और बच्चों का स्कूल में दाखिला नहीं हो पा रहा था.
इस तरह वापस लौटे लोगों का मसला और अधिक जटिल होता जा रहा है, क्योंकि राज्य सरकार ने अब इससे पल्ला झाड़ना शुरू कर दिया है. जब विधानसभा में बार-बार यह मुद्दा उठाया गया, तो सरकार ने सीधे कह दिया कि ये लोग इस नीति के तहत मिलनेवाली रियायतों के हकदार नहीं हैं, क्योंकि ये लोग तयशुदा रास्तों से वापस नहीं लौटे हैं. लेकिन अब भी सरकार पाक-अधिकृत कश्मीर में रह रहे युवाओं के रिश्तेदारों से उनकी वापसी का आवेदन-पत्र स्वीकार कर रही है. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विगत 15 फरवरी को विधानसभा में जानकारी दी कि चार साल पुरानी इस नीति के तहत 31 जनवरी, 2014 तक 1171 आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिनमें 422 की सिफारिश विभिन्न इंटेलिजेंस एजेंसियों ने की है. हालांकि, वे वापसी के तौर-तरीकों पर कुछ नहीं बता सके कि किन दस्तावेजों की दरकार होगी और क्या वापसी के लिए तय निर्धारित स्थानों पर उनका अभिवादन फूल-माला से होगा?
वापसी के लिए नेपाल का रास्ता तय होने की बात तो सरकार ने मानी है, लेकिन अन्य चार रास्तों के बारे में वह कोई तर्क नहीं दे सकी है. तथ्य यह भी है कि कानून के मुताबिक नेपाल के रास्ते भारत आना गैरकानूनी है. तो सवाल यह है कि सरकार ने सभी पर मुकदमा क्यों नहीं किया? इस लचर नीति ने वापस आये सैकड़ों लोगों की किस्मत को अधर में लटका दिया है. वे बहुत ही खराब हालत में जीने के लिए अभिशप्त हैं. सरकार उनकी जिम्मेवारी से भाग नहीं सकती और उसे वापस आये लोगों के समुचित पुनर्वास के लिए कार्ययोजना बनानी ही होगी.
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