बढते चुनावी खर्च पर लगे लगाम

Published at :29 Mar 2014 6:00 AM (IST)
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बढते चुनावी खर्च पर लगे लगाम

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई में कांग्रेस और भाजपा द्वारा विदेशी कंपनियों से लिये गये चंदे की जांच का आदेश दिया है. याचिका में आरोप लगाया गया था कि वेदांता समूह की तीन कंपनियों- स्टरलाइट इंडस्ट्रीज, सेसा गोवा और माल्को ने दोनों पार्टियों को करोडों रुपये दिये हैं, जो जन-प्रतिनिधित्व कानून […]

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दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई में कांग्रेस और भाजपा द्वारा विदेशी कंपनियों से लिये गये चंदे की जांच का आदेश दिया है. याचिका में आरोप लगाया गया था कि वेदांता समूह की तीन कंपनियों- स्टरलाइट इंडस्ट्रीज, सेसा गोवा और माल्को ने दोनों पार्टियों को करोडों रुपये दिये हैं, जो जन-प्रतिनिधित्व कानून और विदेशी अभिदाय (विनियमन) नियम का उलंघन है.

इनमें राजनीतिक दलों को विदेशी स्नेतों से धन लेने की मनाही है. हालांकि कांग्रेस और भाजपा के अनुसार ये कंपनियां भारतीय हैं और चंदे के लेन-देन में किसी नियम का उलंघन नहीं हुआ है. बहरहाल, यह मामला तो अब जांच के दायरे में है. लेकिन, लगातार महंगे होते जा रहे चुनाव के संदर्भ बहुत महत्व रखते हैं. जानकारों की मानें तो 30,000 करोड. रुपये के अनुमानित खर्च के साथ 2014 के चुनाव अब तक के सबसे महंगे चुनाव होंगे.

इस खर्च के बडे हिस्से का कोई लेखा-जोखा नहीं होगा. उल्लेखनीय है कि यूपीए मंत्रिमंडल ने अपने आखिरी अहम फैसलों में से एक में बडे राज्यों में एक प्रत्याशी द्वारा खर्च की सीमा 40 से बढा कर 70 लाख और छोटे राज्यों में 22 से बढा कर 54 लाख करने का निर्णय लिया था. इस रकम में पार्टियों द्वारा किया जानेवाला खर्च शामिल नहीं है. राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा चुनाव आयोग को दी गयी जानकारी के मुताबिक पिछले आठ साल में हुई कुल कमाई 4,895.96 करोड. में 75 फीसदी से अधिक बेनामी है. राजनीति में धन की बेतहाशा आमद ने इस शंका को भी बल दिया है कि कहीं भारत से बाहर जानेवाला काला धन राजनीतिक चंदे के रूप में वापस तो नहीं आ रहा है.

व्यापार और उद्योग में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं. चुनाव और अन्य राजनीतिक गतिविधियों में धन खर्च होते हैं और पार्टियों को पैसा जुटाना पड.ता है. लेकिन बेहिसाब खर्च ने आर्थिक रूप से कमजोर दलों और प्रत्याशियों के लिए मुश्किलें बढ.ा दी है, जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है. इसने राजनीति को कॉरपोरेट व कंपनियों के दबाव में ला दिया है, जिससे जनता के हितों की अनदेखी हो रही है. सभी संबद्ध पक्षों को खर्चीली होती जा रही राजनीति और महंगे चुनाव पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है. चुनाव सुधार की कोई ठोस कोशिश यहीं से शुरू होगी.

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