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ranchi

  • Jul 11 2019 9:05AM
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#WorldPopulationDay : बुजुर्गों का बोझ उठाने के लिए कितना तैयार चुनौतियों से जूझ रहा झारखंड!

#WorldPopulationDay : बुजुर्गों का बोझ उठाने के लिए कितना तैयार चुनौतियों से जूझ रहा झारखंड!

मिथिलेश झा

रांची : कई चुनौतियों के दौर से गुजर रही झारखंड (Jharkhand) सरकार के सामने एक और बड़ी चुनौती पेश आने वाली है. आने वाले दिनों में बुजुर्गों (Old Age People) की संख्या बढ़ेगी और इनकी देखभाल की जिम्मेदारी किसी बोझ से कम नहीं होगी. आर्थिक सर्वेक्षण 2019 (Economic Survey 2019) के आंकड़े बताते हैं कि 60 साल से अधिक उम्र के लोगों की संख्या झारखंड में तेजी से बढ़ रही है. वर्ष 2011 में प्रदेश में 24 लाख बुजुर्ग (60 साल से अधिक उम्र के लोग) थे, जिनकी संख्या वर्ष 2041 में 60 लाख हो जायेगी. जब झारखंड में 60 लाख लोग 60 साल से ज्यादा की उम्र के होंगे, तब यहां जवां हो रहे बच्चों की संख्या 1.25 करोड़ (बुजुर्गों की संख्या से दोगुणा से ज्यादा) होगी. हालांकि, राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में यह संख्या चिंता के संकेत दे रहे हैं. वर्ष 2041 में जब देश में 19 साल तक के उम्र की आबादी 38.1 करोड़ होगी, 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या 23.94 करोड़ हो जायेगी.

आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, वर्ष 2011 की तुलना में वर्ष 2041 तक बच्चों (0-19 वर्ष आयु वर्ग) की संख्या में तेजी से गिरावट दर्ज की जायेगी, जबकि कामगारों और बुजुर्गों की संख्या में इजाफा होगा. इसलिए सरकार को अपनी नीतियों पर अभी से काम शुरू कर देना होगा. आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2011 में झारखंड में 1.52 करोड़ बच्चे थे, जो वर्ष 2021 में घटकर 1.46 करोड़, वर्ष 2031 में 1.28 करोड़ और वर्ष 2041 में 1.25 करोड़ रह जायेंगे. इसी तरह युवाओं और प्रौढ़ (20 से 59 वर्ष आयु वर्ग) की संख्या वर्ष 2011 में 1.55 करोड़ थी, जिसके वर्ष 2021 में 1.98 करोड़, वर्ष 2031 में 2.41 करोड़ और वर्ष 2041 में 2.62 करोड़ हो जाने का अनुमान है.

बजुर्गों की बात करें, तो इनकी संख्या में भी तेजी से इजाफा होने वाला है. वर्ष 2011 में झारखंड में 24 लाख बुजुर्ग थे, जो वर्ष 2021 में 32 लाख, वर्ष 2031 में 44 लाख और वर्ष 2041 में 60 लाख हो जायेंगे. हालांकि, प्रदेश में बुजुर्गों का औसत राष्ट्रीय औसत (कुल आबादी के 15.9 फीसदी) की तुलना में काफी कम 13.4 फीसदी रहेगा. यह संख्या मध्यप्रदेश के बुजुर्गों की आबादी के बराबर होगी. वर्ष 2041 में उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार में सबसे कम बुजुर्ग होंगे. उस वक्त उत्तर प्रदेश में मात्र 12 फीसदी लोगों की उम्र 60 साल से ज्यादा होगी, जबकि राजस्थान में यह संख्या 13.3 फीसदी रहने की संभावना है. 60 साल से ज्यादा उम्र के सबसे कम 11.6 फीसदी लोग बिहार में होंगे.

उल्लेखनीय है कि कुल प्रजनन दर पर देश में काफी हद तक नियंत्रण हो चुका है. फलस्वरूप आज का युवा भारत अगले दो दशक में बुजुर्ग भारत बनने जा रहा है. भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड वर्ष 2030 के बाद से देश के लिए बोझ बनने लगेगा. महज एक दशक के बाद भारत में बच्चों और बुजुर्गों की संख्या का अंतर बहुत कम रह जायेगा. आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, कुल प्रजनन दर में तीव्र गिरावट की वजह से 0-19 वर्ष आयु वर्ग के लोगों की संख्या इस वक्त अपने शिखर पर है. वर्ष 2021 में कुल प्रजनन दर उस स्तर पर आ जायेगा, जिसका लक्ष्य भारत ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए तय किया है.

ऐसा होगा देश में बुजुर्गों का परिदृश्य

केरल में सबसे ज्यादा 23.9 फीसदी बुजुर्ग होंगे वर्ष 2041 में. तब तमिलनाडु में 22.6 फीसदी, दिल्ली में 21.2 फीसदी, हिमाचल में 21.1 फीसदी, पंजाब में 20.6 फीसदी और आंध्रप्रदेश में 20 फीसदी आबादी की उम्र 60 वर्ष से अधिक हो जायेगी. महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक इन राज्यों से कुछ ही पीछे रह जायेंगे. इन राज्यों में वृद्धजनों की संख्या राज्यों की कुल आबादी का क्रमश: 19.7 फीसदी, 19.7 फीसदी और 19.0 फीसदी रहने का अनुमान आर्थिक सर्वेक्षण में जताया गया है.

यहां बच्चों से ज्यादा होंगे बुजुर्ग

आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि वर्ष 2041 में दिल्ली, केरल और तमिलनाडु में 0 से 19 वर्ष तक की आयु के लोगों से ज्यादा लोग 60 वर्ष से ज्यादा उम्र के होंगे. दिल्ली में तब 41 लाख बच्चे होंगे, जबकि बुजुर्गों की संख्या 43 लाख हो जायेगी. इसी तरह, केरल में 88 लाख बच्चों की तुलना में 90 लाख बुजुर्ग होंगे, जबकि तमिलनाडु में 1.6 करोड़ बच्चों के मुकाबले 1.75 करोड़ बुजुर्ग हो जायेंगे.

रोजगार की बढ़ेगी मांग, बढ़ेगा पलायन

आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि कामगारों की संख्या में तेजी से होने वाले इजाफे की वजह से रोजगार की मांग तो बढ़ेगी ही, पलायन भी बढ़ेगा. लोग उन राज्यों की ओर पलायन शुरू करेंगे, जहां की आबादी बूढ़ी हो रही है और वर्क फोर्स (श्रम बल) कम हो रहा है. वर्ष 2021-31 के दौरान देश में हर साल 96.5 लाख कामगार तैयार होंगे, जबकि 2031-41 के बीच हर साल 41.5 लाख लोगों को काम चाहिए होगा. इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन (एनएसएसओ) के वर्ष 2017-18 के एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि वर्तमान में भारत में 15-59 वर्ष आयु वर्ग के 53 फीसदी कामगार हैं. इसमें 80 फीसदी पुरुष और 25 फीसदी महिलाएं हैं. वर्ष 2021-41 के बीच भारी संख्या में नया श्रम बल जुड़ेगा, जिनके लिए रोजगार की तलाश करना सरकार की जिम्मेवारी होगी.

22 में से 11 राज्यों में श्रम बल की संख्या होगी कम

आगामी दो दशक में कामगारों की बढ़ती संख्या नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय है. लेकिन देश के 22 बड़े राज्यों में से 11 राज्यों में श्रम बल में कटौती देखी जायेगी. इनमें दक्षिण के राज्यों के अलावा पंजाब, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश शामिल होंगे. दूसरी तरफ, कुछ ऐसे भी राज्य होंगे, जहां कामगारों की संख्या तेजी से बढ़ेगी. ऐसे राज्यों में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान शामिल होंगे. सैद्धांतिक तौर पर यही राज्य पंजाब, महाराष्ट्र, बंगाल और हिमाचल में श्रम बल की आपूर्ति करेंगे. इस तरह अलग-अलग राज्यों की ओर पलायन का ट्रेंड बढ़ेगा.

बुजुर्गों पर देना होगा ध्यान

घटती आबादी के बीच बुजुर्गों की बढ़ती संख्या राज्य सरकारों के लिए चिंता का विषय होगा. सरकारों को बुजुर्गों को ध्यान में रखकर नीतियां तैयार करनी होगी. इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी निवेश की जरूरत होगी. इतना ही नहीं, चरणबद्ध तरीके से रिटायरमेंट की उम्र सीमा बढ़ाने की योजना पर भी काम करना होगा.

सरकार के सामने होंगी ये गंभीर चुनौतियां

शहरीकरण के इस दौर में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, बालिका शिक्षा, जनसांख्यिकीय परिवर्तन के अन्य सामाजिक-आर्थिक चालकों, वर्ष 2041 के देश और राज्यों की जनसंख्या अनुमान के मानकों में सुधार करना होगा. जनसंख्या के बदलते परिदृश्य में सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं, बुजुर्गों की देखभाल, स्कूल में सुविधाएं बढ़ाने, रिटायरमेंट के बाद बुजुर्गों को वित्तीय सहायता सेवाएं, पब्लिक पेंशन फंडिंग, इनकम टैक्स से राजस्व बढ़ाना, श्रम बल और श्रमिकों की भागीदारी की दर बढ़ाने और सेवानिवृत्ति की आयु पर ध्यान देने की जरूरत होगी.

इसलिए मनाया जाता है विश्व जनसंख्या दिवस

हर साल 11 जुलाई को दुनिया भर में विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है. दुनियाभर में बढ़ती जनसंख्या के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है. इस दिन लोगों को परिवार नियोजन, लैंगिक समानता, मानवाधिकार और मातृत्व स्वास्थ्य के बारे में जानकारी दी जाती है. विश्व जनसंख्या दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जिनमें जनसंख्या वृद्धि की वजह से होने वाले खतरे के प्रति लोगों को आगाह किया जाता है. वर्ष 1989 से ही विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जा रहा है.

विश्व जनसंख्या दिवस पर विश्व को यह बताया जाता है कि आबादी से जुड़े मुद्दे कितने अहम हैं. यह दिन दुनिया भर की सरकारों को यह याद दिलाने के लिए मनाया जाता है कि बहुत से काम अब भी अधूरे हैं. पहली बार 11 जुलाई, 1987 को विश्व की आबादी 5 अरब हुई थी. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने 1989 में इस दिन को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की. 179 देशों की सरकारों ने माना कि सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जनन स्वास्थ्य और लैंगिक समानता जरूरी है.

दिसंबर, 1990 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने तय किया कि जनसंख्या के मुद्दे पर लोगों को जागरूक करने और पर्यावरण एवं विकास पर जनसंख्या विस्फोट के असर के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए विश्व जनसंख्या दिवस निरंतर मनाया जायेगा. आधिकारिक रूप से 11 जुलाई, 1990 को पहली बार 90 से ज्यादा देशों ने इस दिवस का पालन किया. तब से दुनिया भर के संस्थान सरकारों और सिविल सोसाइटी के सहयोग से विश्व जनसंख्या दिवस मनाते हैं.

2030 में 8.6 अरब होगी दुनिया की आबादी

विश्व की आबादी में हर साल 8.3 करोड़ लोग जुड़ रहे हैं. हालांकि, प्रजनन दर में तेजी  से गिरावट आयी है, लेकिन आबादी के बढ़ने की रफ्तार कम नहीं हो रही है. संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2030 में दुनिया की आबादी 8.6 अरब हो जायेगी. वर्ष 2050 में यह 9.8 अरब और वर्ष 2100 में 11.2 अरब हो जायेगी.

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