सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड योजना पर फैसला सुरक्षित रखा, जानें क्या है Electoral Bond

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने 31 अक्टूबर को चुनाव बाॅन्ड को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई प्रारंभ की थी, जिसे आज पूरा कर लिया गया.
चुनावी बाॅन्ड योजना की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारत के चुनाव आयोग को 30 सितंबर तक चुनावी बांड के माध्यम से सभी राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त धन का लेटेस्ट डाटा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि वे कोर्ट को दो सप्ताह के भीतर एक सीलबंद पैकेट में डेटा दें. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा है.
सुप्रीम कोर्ट ने दो नवंबर को चुनावी बाॅन्ड योजना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर ली लेकिन कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. गौरतलब है कि चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने 31 अक्टूबर को चुनाव बाॅन्ड को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई प्रारंभ की थी, जिसे आज पूरा कर लिया गया.
चुनावी बाॅन्ड योजना के शुरू होने के बाद से पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक धनराशि बीजेपी के खाते में गई है. राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव आयोग को जो जानकारी दी गई है उसके अनुसार बाॅन्ड के जरिए मिलने वाली कुल राशि का 57 प्रतिशत बीजेपी के खाते में गया है. पार्टी को 2017-2022 के बीच चुनावी बाॅड के जरिए 5,271.97 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं, जबकि कांग्रेस को 952.29 करोड़ रुपये मिले और वह चुनावी बाॅन्ड के जरिए चंदा प्राप्त करने वाली पार्टियों में दूसरे स्थान पर है. चुनाव आयोग ने वर्ष 2022-2023 की रिपोर्ट पेश नहीं की थी, जिसकी मांग सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान की है.
केंद्र सरकार ने 2018 में चुनावी बाॅन्ड योजना को लाॅन्च किया था. इसका उद्देश्य राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता लाना था. चुनावी बाॅन्ड के जरिए कोई व्यक्ति या संस्था किसी भी राजनीतिक दल को चंद दे सकते हैं, लेकिन उनकी पहचान बैंक के पास नहीं होगी. चुनावी बाॅन्ड को बैंक से खरीदा जा सकेगा. साथ ही जिस भी पार्टी को वह चुनावी बाॅन्ड मिलेगा वह उसे बैंक की किसी शाखा में ही भुना सकेगा.
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By रजनीश आनंद
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रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.
आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.
रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.
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