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बच्चों को महिलाओं और पुरुषों की इज्जत करना समान रूप से सिखाया जाये : सुप्रीम कोर्ट

Updated at : 07 May 2017 4:49 PM (IST)
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बच्चों को महिलाओं और पुरुषों की इज्जत करना समान रूप से सिखाया जाये : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय की एकमात्र महिला न्यायाधीश आर भानुमति ने लैंगिक समानता को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल करने पर जोर देते हुए कहा है कि बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि वे महिलाओं का सम्मान उसी तरह करें, जैसे वे पुरुषों का सम्मान करते हैं. न्यायमूर्ति भानुमति ने अपने अलग लेकिन […]

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नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय की एकमात्र महिला न्यायाधीश आर भानुमति ने लैंगिक समानता को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल करने पर जोर देते हुए कहा है कि बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि वे महिलाओं का सम्मान उसी तरह करें, जैसे वे पुरुषों का सम्मान करते हैं.

न्यायमूर्ति भानुमति ने अपने अलग लेकिन एक ही समय पर आये फैसले में 16 दिसंबर, 2012 के गैंगरेप मामले में चार दोषियों को मिली मौत की सजा को बरकरार रखा. कुल 114 पन्नों के अपने फैसले में उन्होंने महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर काबू पाने के लिए कई उपायों का सुझाव दिया है. उन्होंने यह भी कहा कि समाज की सोच में बदलाव लाया जाना बहुत जरूरी है.

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों से लड़ने के लिए सिर्फ सख्त कानून और सजा काफी नहीं है. हमारे परंपरा आधारित समाज में, महिलाओं का सम्मान और लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए व्यवहार और सोच में बदलाव लाने की जरूरत है.”

उन्होंने कहा, ‘‘बच्चों को बचपन से ही महिलाओं का सम्मान करने के प्रति संवेदनशील बनाया जाना चाहिए. समाज में बच्चे को महिलाओं का सम्मान करना भी ठीक उसी तरह से सिखाया जाना चाहिए, जिस तरह उसे पुरुषों का सम्मान करना सिखाया जाता है. लैंगिक समानता को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.”

न्यायमूर्ति भानुमति ने कहा कि स्कूली शिक्षकों और माता-पिता को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वे सिर्फ नियमित व्यक्तित्व निर्माण और कौशल संवर्धन के अभ्यास पर ही गौर न करें, बल्कि बच्चे के व्यवहार पर भी नजर रखें, ताकि उसे लैंगिक आधार पर संवेदनशील बनाया जा सके.

उन्होंने कहा, ‘‘शैक्षणिक संस्थानों, सरकारी संस्थानों, कर्मचारियों और सभी संबंधित लोगों को लैंगिक संवेदनशीलता और महिलाओं के सम्मान के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए कदम उठाने चाहिए. टीवी, मीडिया और प्रेस के माध्यम से लैंगिक न्याय के प्रति जनता में संवेदनशीलता पैदा करने का स्वागत किया जाना चाहिए.”

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