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दिल्ली अग्निकांड : इमारत में फंसे मुशर्रफ की दोस्त से अंतिम बातचीत, फोन पर गुहार, दोस्ती का फर्ज निभाना मोनू, परिवार का रखना ख्याल

Updated at : 09 Dec 2019 8:15 AM (IST)
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दिल्ली अग्निकांड : इमारत में फंसे मुशर्रफ की दोस्त से अंतिम बातचीत, फोन पर गुहार, दोस्ती का फर्ज निभाना मोनू, परिवार का रखना ख्याल

प्रेमांशु शेखर मुशर्रफ ने दोस्त मोनू को कॉल किया- हैलो मोनू, भैया आज सबकुछ खत्म होने वाला है.आग लग गयी है. आ जइयो करोलबाग. टाइम कम है और भागने का कोई रास्ता नहीं है. खत्म हुआ भैया मैं तो, घर का ध्यान रखना. अब तो सांस भी नहीं ली जा रही है. मुजफ्फरपुर : नयी […]

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प्रेमांशु शेखर
मुशर्रफ ने दोस्त मोनू को कॉल किया- हैलो मोनू, भैया आज सबकुछ खत्म होने वाला है.आग लग गयी है. आ जइयो करोलबाग. टाइम कम है और भागने का कोई रास्ता नहीं है. खत्म हुआ भैया मैं तो, घर का ध्यान रखना. अब तो सांस भी नहीं ली जा रही है.
मुजफ्फरपुर : नयी दिल्ली के सदर बाजार इलाके के अनाज मंडी में लगी भीषण आग की लपटों में घिरे और धुएं से दम घुटने से परेशान मुशर्रफ नामक युवक ने तड़के करीब पांच बजे जान बचाने के लिए अपने दोस्त को कॉल किया था. उसने बताया कि उसका बचना मुश्किल है.
अनुरोध किया कि वह दोस्ती का फर्ज निभाते हुए उसके परिवार का ध्यान जरूर रखे. करीब साढ़े तीन मिनट की बातचीत के ऑडियो में वह बार-बार दोस्त से अपने परिवार और बच्चों का ध्यान रखने की गुहार लगा रहा था. इस दौरान मोनू मुशर्रफ को मौके से भागने के लिए हौंसला बढ़ा रहा था, लेकिन सामने मौत को देख उसके मुशर्रफ का कहना था कि अब जान बचने का कोई रास्ता नहीं है.
मोनू- आग कैसे लग गयी.
मुशर्रफ- पता नहीं कैसे, सारे लोग दहाड़ रहे हैं.अब कुछ नहीं हो सकता मेरे घर का ध्यान रखना भाई.
मोनू- फायर ब्रिगेड को तो फोन करो.
मुशर्रफ- कुछ नहीं हो रहा अब तो .
मोनू- पानी वाले को तो कॉल करो.
मुशर्रफ- कुछ नहीं हो सकता है,लेकिन मेरे घर का ध्यान रखना. किसी को एक दम से मत बताना. पहले बड़ों को बताना मेरे परिवार को लेने पहुंच जाना. तुझे छोड़कर और किसी पर भरोसा नहीं है.
मुशर्रफ- अब सांस भी नहीं ली जा रही है.
मोनू- हैलो, हैलो गाड़ी नहीं आयी पानी वाली?
मुशर्रफ- पूरी बिल्डिंग में आग लगी दिख रही है भैया.ऊपर वाला जैसा करे.आखिरी टाइम है यह.अब तो बचने की उम्मीद नहीं दिखती.
मोनू- तू मत जाना मेरे भाई, निकलने या कूदने का कोई रास्ता नहीं है क्या? कुछ तो होगा.
मुशर्रफ- नहीं कोई रास्ता नहीं है. (किसी रिश्तेदार से संपर्क करने की बात कहता है)
मोनू- भाई बचने की कोशिश कर, किसी तरह निकल तो वहां से (मुशर्रफ के कराहने की आवाज आती है).
मुशर्रफ- अब तो गये भैया. तीसरे, चौथे माले तक आग लगी है. किसी से जिक्र मत करना ज्यादा.
मोनू- आग पहुंच गयी है या धुआं आ रहा है. बाहर छज्जे की ओर आ भाग जा.
मुशर्रफ- भाई, जैसे चलाना है वैसे मेरा घर चलाना. बच्चों और सब घर वालों को संभालकर रखना. एक दम से घर मत बताना. भैया मोनू तैयारी कर ले अभी आने की.
इस संवाद के बाद मोनू का अपने दोस्त मुशर्रफ से संपर्क नहीं हो पाया. बताया जाता है कि मुशर्रफ की इस हादसे में मौत हो गयी है.
नाती की याद में नानी की आंखें पथरा गयीं
व्यथा
नानी बार-बार बेसुध, महज पंद्रह साल का था अफजल
हादसे में नरियार की रूबैना खातून का पंद्रह साल का नाती अफजल भी जल कर खाक गया. उसके बाद से नानी का बुरा हाल है. वह बार-बार बेसुध होकर गिर जाती है. रोते हुए रूबैदा कहती है कि फैक्ट्री में बाहर से ताला लगा था. बाहर निकलने का कोई रास्ता ही नहीं था. कैसे निकलते बच्चे. रूबैदा कहती हैं कि जो कमरा था, उसमें 40 से 45 आदमी काम कर रहे थे. उसी में एक नाती भी था. घटना के बाद से ही उसकी कोई खबर नहीं है. अफजल का घर नरियार पंचायत के ही लतहा गांव में है.
व्यथा
अब्बा, आग लगी है…बचाओ रास्ता नहीं
हैलो, अब्बा… आग लगी है… बचाओ.निकलने का रास्ता नहीं है… यह कहते हुए खुर्शीद आलम फफकते हुए रो पड़ते हैं. फैक्ट्री में आग के दौरान मो खुर्शीद आलम आग की लपटों से घिरे बेटे मो फैजल से बात कर रहे थे. लेकिन सिवाय दिलासा के कुछ नहीं कर पा रहे थे. एक बार फोन कटने के बाद दोबारा फिर फोन कर बेटे से निकलने का रास्ता या कोई तरीका पूछ ही रहे थे कि फोन कट गया. फैजल से बात नहीं हो पायी. छह बेटों में पांचवें नंबर का फैजल मां-बाप का दुलारा था. पांच साल पहले 13 साल की उम्र में फैजल दिल्ली गया था.
सहरसा के नरियार गांव के थे 7 लोग
दिल्ली के फ़िल्मिस्तान स्थित अनाज मंडी की चार मंजिली इमारत में आग से चौथे माले पर जैकेट फैक्ट्री भी चपेट में आ गयी. इसमें सहरसा के नरियार गांव के सात लोग मारे गये हैं मृतकों में मो संजर आलम, मो सजीम, मो मोबारक व मो ग्यास (दोनों भाई), मो फैजल, मो जसीम, मो अफजल हैं. जबकि लापता में मो राशीद व मो फरीद का नाम है.
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