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सरकारी आवास पर कब्‍जा ''माननीयों'' को पड़ेगा भारी, खाली कराने संबंधी संशोधन विधेयक संसद में मंजूर

Updated at : 06 Aug 2019 9:49 PM (IST)
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सरकारी आवास पर कब्‍जा ''माननीयों'' को पड़ेगा भारी, खाली कराने संबंधी संशोधन विधेयक संसद में मंजूर

नयी दिल्ली : राज्यसभा ने सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, सांसदों के लिए बने सरकारी आवासों को अनधिकृत कब्जे से मुक्त कराने संबंधी विधेयक को मंगलवार को मंजूरी दे दी. उच्च सदन ने ‘सरकारी स्थान (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) संशोधन विधेयक, 2019′ को चर्चा के बाद मंजूरी प्रदान कर दी. लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी […]

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नयी दिल्ली : राज्यसभा ने सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, सांसदों के लिए बने सरकारी आवासों को अनधिकृत कब्जे से मुक्त कराने संबंधी विधेयक को मंगलवार को मंजूरी दे दी. उच्च सदन ने ‘सरकारी स्थान (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) संशोधन विधेयक, 2019′ को चर्चा के बाद मंजूरी प्रदान कर दी. लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है.

चर्चा का जवाब देते हुए आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि यह संशोधन विधेयक उन सरकारी आवासों के संदर्भ में है जो सांसदों एवं अधिकारियों को आवंटित होते हैं. उन्होंने कहा कि आवास आवंटी को घर खाली करने के लिए कारण बताओ नोटिस देने के बाद तीन दिन का समय जवाब देने के लिए दिया जाता है ताकि वह अपना पक्ष रख सके.

उन्होंने कहा कि मकान खाली कराने में स्वास्थ्य, बच्चों की पढ़ाई और स्थानांतरण सहित अन्य मानवीय एवं वैध आधारों का ध्यान रखा गया है. इसलिए इसे अमानवीय न समझा जाए. उल्लेखनीय है कि मौजूदा व्यवस्था में कारण बताओ नोटिस की अवधि सात दिन है. इसके बाद तीन चरण में 15 दिन का अतिरिक्त समय मिलता है.

मंत्री ने जोर दिया कि सरकारी आवास को खाली कराने के मामले को ‘हम मानवीय ढंग से आगे बढ़ाते हैं.’ उन्होंने कहा कि सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, सांसदों आदि के लिए चिह्नित सरकारी आवासों को समयावधि खत्म होने के बाद भी कब्जाधारियों द्वारा खाली नहीं करने के मामले सामने आते हैं.

पुरी ने कहा कि इसके कारण नये सांसदों और अधिकारियों को समय से आवास आवंटित नहीं हो पाते हैं. पुरी ने बताया कि प्रावधान सख्त करने का मकसद, इस क्षेत्र में लंबित तीन हजार से अधिक मामलों की संख्या में इजाफा नहीं होने देना है. उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्त होने के बाद निश्चित अवधि में आवास नहीं छोड़ने वाले लोग अदालतों से स्थगन आदेश ले आते हैं.

उन्होंने कहा कि इस संबंध में 1971 के कानून में सरकार तीन महत्वपूर्ण संशोधन लेकर आयी है, जिनसे अनाधिकृत कब्जा करने वाले लोग स्वेच्छा से आवास खाली करने के लिए अग्रसर होंगे. पुरी ने आवास की कमी के बारे में जतायी गयी विभिन्न दलों के नेताओं की चिंता का जिक्र करते हुए कहा कि मंत्रालय ने सरकारी अधिकारियों की आवास सुविधा के लिए 25 हजार नये घर बनवाये हैं. इसी तरह सांसदों के लिए दिल्ली में भी नये आवास बन गये हैं. इसलिए भविष्य में आवास सुविधा की कमी नहीं होगी.

उन्होंने स्पष्ट किया कि नये विधेयक के तहत आवास सुविधा के लाभार्थी के पक्ष की विभिन्न आधारों पर समीक्षा किये जाने के बाद ही बेदखली आदेश जारी किया जायेगा. मंत्री ने बताया कि विधेयक में प्रस्तावित दूसरे संशोधन के तहत अदालत में मामला चलने के दौरान अनाधिकृत कब्जे की क्षतिपूर्ति भरने का प्रावधान शामिल किया गया है. इसकी भरपाई कब्जाधारक को करनी होगी.

मंत्री के जवाब के बाद सदन ने ध्वनिमत से विधेयक को मंजूरी दी. विधेयक के प्रावधानों के माध्यम से सरकारी आवासों से अनाधिकृत कब्जे को त्वरित एवं सुगमतापूर्वक खाली कराया जा सकेगा. इसके आधार पर पात्र व्यक्ति को आवास का आवंटित किया जा सकेगा. विधेयक के उद्देश्यों एवं कारणों में कहा गया है कि इसके जरिए 1971 के मूल कानून में संशोधन का प्रावधान है.

ऐसे में इसमें धारा 3 में नयी उपधारा ‘ख’ जोड़ी गयी है जिसके माध्यम से अनाधिकृत व्यक्तियों को तीन दिन के अंदर कारण दर्शाने वाली अल्प सूचना देकर संक्षिप्त बेदखली प्रक्रिया लागू करने का प्रस्ताव किया गया है. इसमें बेदखली में विलंब को रोकने के लिए एक नयी उपधारा जोड़ने का प्रस्ताव किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति, संपदा अधिकारी द्वारा पारित बेदखली के आदेश को किसी न्यायालय में चुनौती देता है, तब उसे प्रत्येक महीने के लिये निवास स्थान संबंधी नुकसान की भरपाई करनी होगी.

विधेयक पर चर्चा में कांग्रेस के रिपुन बोरा, तृणमूल कांग्रेस के मनीष गुप्ता, सपा के विशंभर प्रसाद निषाद, बीजद के अमर पटनायक, जदयू के रामनाथ ठाकुर, द्रमुक के पी विल्सन, शिवसेना के अनिल देसाई, अगप के वीरेन्द्र प्रसाद बैश्य, कांग्रेस के मधुसूदन मिस्त्री, अन्नाद्रमुक के ए नवनीत कृष्णन और आप के सुशील गुप्ता ने हिस्सा लिया.

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