केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा - हस्तक्षेप जरूरी था, CBI के दो शीर्ष अधिकारी बिल्लियों की तरह लड़ रहे थे
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 05 Dec 2018 4:49 PM
नयी दिल्ली : केंद्र ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के दो शीर्ष अधिकारियों आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच छिड़ी जंग में हस्तक्षेप करने की कार्रवाई को बुधवार को आवश्यक बताते हुए कहा कि इनके झगड़े की वजह से देश की प्रतिष्ठित जांच एजेंसी की स्थिति बेहद हास्यास्पद हो गयी थी. प्रधान न्यायाधीश रंजन […]
नयी दिल्ली : केंद्र ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के दो शीर्ष अधिकारियों आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच छिड़ी जंग में हस्तक्षेप करने की कार्रवाई को बुधवार को आवश्यक बताते हुए कहा कि इनके झगड़े की वजह से देश की प्रतिष्ठित जांच एजेंसी की स्थिति बेहद हास्यास्पद हो गयी थी.
प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति केएम जोसफ की पीठ के समक्ष केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने अपनी बहस जारी रखते हुए कहा कि इन अधिकारियों के झगड़े से जांच एजेंसी की छवि और प्रतिष्ठा प्रभावित हो रही थी. अटॉर्नी जनरल ने कहा कि केंद्र का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जनता में इस प्रतिष्ठित संस्थान के प्रति भरोसा बना रहे. वेणुगोपाल ने कहा, जांच ब्यूरो के निदेशक और विशेष निदेशक के बीच विवाद इस प्रतिष्ठित संस्थान की निष्ठा और सम्मान को ठेस पहुंच रहा था. दोनों अधिकारी, आलोक कुमार वर्मा और राकेश अस्थाना एक दूसरे से लड़ रहे थे और इससे जांच ब्यूरो की स्थिति हास्यास्पद हो रही थी.
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि इन दोनों अधिकारियों के बीच चल रही लड़ाई से सरकार अचंभित थी कि ये क्या हो रहा है. वे बिल्लियों की तरह एक दूसरे से लड़ रहे थे. वेणुगोपाल ने कहा कि दोनों के बीच चल रही इस लड़ाई ने अभूतपूर्व और असाधारण स्थिति पैदा कर दी थी. ऐसी स्थिति में सरकार के लिए इसमें हस्तक्षेप करना बेहद जरूरी हो गया था. शीर्ष अदालत आलोक वर्मा को जांच ब्यूरो के निदेशक के अधिकारों से वंचित करने और उन्हें अवकाश पर भेजने के सरकार के निर्णय के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है. इस मामले में गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज, लोकसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य ने भी याचिका एवं आवेदन दायर कर रखे हैं. इस मामले में बहस बुधवार को अधूरी रही और सुनवाई गुरुवार को भी होगी
न्यायालय ने 29 नवंबर को कहा था कि वह पहले इस सवाल पर विचार करेगा कि क्या सरकार को किसी भी परिस्थिति में जांच ब्यूरो के निदेशक को उसके अधिकारों से वंचित करने का अधिकार है या उसे निदेशक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में कोई कार्रवाई करने से पहले प्रधानमंत्री की अध्यक्षतावाली चयन समिति के पास जाना चाहिए था. न्यायालय ने इससे पहले यह स्पष्ट कर दिया था कि वह जांच एजेंसी के दोनों शीर्ष अधिकारियों से संबंधित आरोपों और प्रत्यारोपों पर गौर नहीं करेगा. आलोक वर्मा का दो साल का कार्यकाल 31 जनवरी, 2019 को समाप्त हो रहा है.
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