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दिल्ली में अब ट्रांसफर-पोस्टिंग पर छिड़ी जंग, जानें सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मायने

Updated at : 05 Jul 2018 10:49 AM (IST)
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दिल्ली में अब ट्रांसफर-पोस्टिंग पर छिड़ी जंग, जानें सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मायने

नयी दिल्ली : दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है. अब केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारियों पर अधिकार को लेकर घमासान के संकेत मिलने लगे हैं. आम आदमी पार्टी ने गुरुवार को आरोप लगाया कि अधिकारी दिल्ली सरकार […]

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नयी दिल्ली : दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है. अब केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारियों पर अधिकार को लेकर घमासान के संकेत मिलने लगे हैं. आम आदमी पार्टी ने गुरुवार को आरोप लगाया कि अधिकारी दिल्ली सरकार का आदेश नहीं मान रहे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन के तौर पर देखा जा सकता है.

खबरों की मानें तो दिल्ली सरकार अधिकारियों का तबादला करने की योजना बना रही है जिसका अधिकारी विरोध कर सकते हैं.अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से एक सीनियर ब्यूरोक्रेट्स ने कहा कि सर्विसेज डिपार्टमेंट मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों के निर्देश पर किये गये इंटरनल ट्रांसफर और पोस्टिंग का विरोध करेंगे.

यहां चर्चा कर दें कि सर्विसेज पर अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश में स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं कहा गया है. वहीं केजरीवाल सरकार यह दावा कर रही है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से सर्विसेज पर अब उनका अधिकार हो चुका है. दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया और कहा कि चुनी हुई सरकार के पास लैंड, पब्लिक ऑर्डर और पुलिस को छोड़कर सभी मामलों में फैसला लेने की शक्ति है, जिसमें सर्विसेज भी शामिल है.

क्या कहा कोर्ट ने

दिल्ली के उप-राज्यपाल अनिल बैजल के साथ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अधिकारों की रस्साकशी के मामले में बुधवार को आप सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने राष्ट्रीय राजधानी के शासन के लिए व्यापक पैमाना निर्धारित कर दिया है. पीठ ने कहा कि उप-राज्यपाल को फैसले लेने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है. वह निर्वाचित सरकार की सलाह से काम करने के लिए बाध्य हैं. वह मतैक्य नहीं होने की स्थिति में अपवाद स्वरूप मामलों को राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं. उप-राज्यपाल को कैबिनेट के साथ सद्भावना पूर्ण तरीके से काम करना चाहिए और मतभेदों को विचार-विमर्श के साथ दूर करने का प्रयास करना चाहिए. पीठ ने कहा कि चुनी हुई सरकार लोकतंत्र में अहम है, इसलिए कैबिनेट के पास फैसले लेने का अधिकार है. वह जनता के प्रति जवाबदेह है. पीठ ने कहा कि कैबिनेट के सभी फैसलों की जानकारी उप-राज्यपाल को दी जानी चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इसमें उनकी सहमति की जरूरत है. निरंकुशता के लिए कोई स्थान नहीं है. उप-राज्यपाल ‘विघ्नकारक’ के रूप में काम नहीं कर सकते. इस फैसले ने पहली बार उप-राज्यपाल के आचरण को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किये और दिल्ली में कार्यपालिका की दो शाखाओं की शक्तियों को स्पष्ट किया. केजरीवाल लंबे समय से उप-राज्यपाल पर आरोप लगा रहे थे कि वह केंद्र के इशारे पर उन्हें ठीक से काम नहीं करने दे रहे हैं. फैसले ने उन्हें सही ठहराया है. दिल्ली सरकार बनाम उप-राज्यपाल के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में 11 याचिकाएं दाखिल हुई थीं. छह दिसंबर, 2017 को मामले में पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा था. संविधान पीठ में प्रधान न्यायाधीश के अलावा जस्टिस एके सिकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस धनन्जय वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे.

फैसले के मायने

सभी सेवाएं दिल्ली सरकार के अधीन आ जायेंगी. नौकरशाहों के तबादले और तैनाती में दखल होगा.

एलजी कैबिनेट के फैसलों में अड़ंगा नहीं लगा सकेंगे, असहमति पर ही मामला राष्ट्रपति के पास जायेगा

चर्चा के बाद गृह मंत्रालय उपयुक्त कदम उठायेगा

गृह मंत्रालय ने कहा कि दिल्ली सरकार के कामकाज के विषय पर सुप्रीम कोर्ट के आये फैसले पर वह वाजिब चर्चा के बाद उपयुक्त कदम उठायेगा. मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि शीर्ष न्यायालय के फैसले की प्रति गृह मंत्रालय को उपलब्ध हो गयी है. इस पर वाजिब चर्चा की जायेगी तथा उपयुक्त कदम उठाया जायेगा.

लोकतंत्र के लिए बड़ी जीत : केजरीवाल

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्वीट कर कहा कि दिल्ली के लोगों के लिए बड़ी जीत. लोकतंत्र के लिए एक बड़ी जीत. वहीं, उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने फैसले को ‘ऐतिहासिक’करार दिया. कहा कि दिल्ली के लोगों की ओर से इस ऐतिहासिक निर्णय के लिए मैं सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद देना चाहता हूं.

हार पर जश्न मना रहे केजरीवाल : भाजपा

भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि हमने केजरीवाल को धरना और अराजकता की राजनीति करते देखा है. उन्हें अब अराजकता की राजनीति छोड़कर शासन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए. कहा कि केजरीवाल अपनी हार का जश्न मना रहे हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी संपूर्ण शक्ति प्रदान करने की मांग को खारिज कर दिया.

उप-राज्यपाल का पद राज्यपाल जैसा नहीं

पीठ ने कहा कि यह पूरी तरह साफ है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली को संविधान की मौजूदा व्यवस्था के अंतर्गत राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता है. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का एक विशिष्ट दर्जा है और दिल्ली के उप-राज्यपाल का पद राज्य के राज्यपाल जैसा नहीं है, बल्कि वह एक सीमित तात्पर्य में एक प्रशासक ही हैं और उप-राज्यपाल के पद के साथ काम करते हैं. लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि के मुद्दों को छोड़कर दिल्ली सरकार को अन्य मुद्दों पर कानून बनाने और शासन की शक्ति प्राप्त है.

दिल्ली हाइकोर्ट के फैसले पर पीठ असहमत : पीठ ने कहा कि अब दिल्ली हाइकोर्ट के छह अगस्त, 2016 के फैसले के खिलाफ दायर तमाम अपीलें नियमित उचित पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होंगी. हाइकोर्ट ने कहा था कि उप-राज्यपाल दिल्ली के प्रशासनिक मुखिया हैं. पीठ ने कहा कि उप-राज्यपाल और कैबिनेट को किसी भी विषय पर मतभेदों को बातचीत के जरिये सुलझाने का प्रयास करना चाहिए.

आप सरकार व एलजी के बीच इन मुद्दों पर रही तकरार

नौकरशाहों का तबादला, भ्रष्टाचार रोधी शाखा (एसीबी) पर नियंत्रण और मुख्य सचिव पर हमला जैसे विषयों को लेकर केजरीवाल सरकार और एलजी कार्यालय के बीच तकरार रही है. उनके बीच पिछले साढ़े तीन साल के दौरान बड़े मुद्दे रहे हैं…

एसीबी का मुद्दा
केजरीवाल सरकार ने मई, 2015 में कहा कि एसीबी का नियंत्रण एलजी (तत्कालीन) नजीब जंग को दे दिये जाने से वह भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं कर पा रही है. सरकार ने आरोप लगाया कि ऐसा पूर्ववर्ती शीला दीक्षित (कांग्रेस) नीत शासन के दौरान नहीं था.

नौकरशाहों का तबादला और उनकी तैनाती का मुद्दा
मई, 2015 में तत्कालीन एलजी ने वरिष्ठ नौकरशाह शकुंतला गैमलिन को दिल्ली का मुख्य सचिव नियुक्त किया. एलजी के इस कदम से नाराज आप सरकार ने तत्कालीन प्रधान सचिव (सेवा) अनिंदो मजूमदार के कार्यालय में ताला जड़ दिया था. मजूमदार ने एलजी के निर्देश के बाद गैमलिन की नियुक्ति का आदेश दिया था.

सीसीटीवी कैमरों का मुद्दा

मई, 2018 में केजरीवाल ने एलजी कार्यालय के पास धरना दिया. उन्होंने एलजी पर आरोप लगाया कि शहर में 1.4 लाख सीसीटीवी लगाने की आप सरकार के प्रोजेक्ट को भाजपा के इशारे पर अटका रहे हैं. वहीं, एलजी कार्यालय ने कहा कि सरकार की फाइलों को मंजूरी दे दी गयी है.

मुख्य सचिव अंशु प्रकाश पर हमला

फरवरी, 2018 में मुख्य सचिव अंशु प्रकाश को रात में केजरीवाल के आवास पर कथित तौर पर बुलाया गया था और आप विधायकों के एक समूह ने उन पर हमला किया. इसके बाद, नौकरशाहों ने आप मंत्रियों के साथ होने वाली बैठकों का बहिष्कार करने का फैसला किया. यह गतिरोध जून के आखिरी हफ्ते तक जारी रहा.

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