क्या, इन चुनौतियों से पार पा पायेंगे राहुल गांधी ?

Updated at : 11 Dec 2017 5:13 PM (IST)
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क्या, इन चुनौतियों से पार पा पायेंगे राहुल गांधी ?

राहुल गांधी आज निर्विरोध रूप से कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिये गये. चुनाव के दौरान 132 साल पुरानी पार्टी में राहुल गांधी के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं था. लिहाजा राहुल गांधी का अध्यक्ष चुना जाना तय था. कांग्रेस में अब राहुल युग की शुरुआत हो गयी है. 1998 में सोनिया गांधी ने जब कांग्रेस अध्यक्ष […]

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राहुल गांधी आज निर्विरोध रूप से कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिये गये. चुनाव के दौरान 132 साल पुरानी पार्टी में राहुल गांधी के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं था. लिहाजा राहुल गांधी का अध्यक्ष चुना जाना तय था. कांग्रेस में अब राहुल युग की शुरुआत हो गयी है. 1998 में सोनिया गांधी ने जब कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभाली थी, कुछ वैसे ही मिलती – जुलती स्थिति आज की कांग्रेस की है.अध्यक्ष की कुर्सी संभालते ही सोनिया गांधी ने खामोशी से संगठन में जान फूंकना शुरू किया. कांग्रेस सत्ता में फिर से वापस आ गयी.

भाजपा मजबूत स्थिति में है और लगातार चुनाव जीत रही है. नये इलाकों में भी भाजपा की पैठ बढ़ी है. वहीं विधानसभा चुनावों में कांग्रेस लगातार हार रही है. अब जब पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. ऐसे नाजुक घड़ी में राहुल गांधी का अध्यक्ष पद संभालना पार्टी के लिए ऐतिहासिक घटनाक्रम है. राहुल के सामने कई चुनौतियां हैं

1.हताश कांग्रेस कार्यकर्ता – लोकसभा के बाद विधानसभा चुनाव में लगातार हार का सामना कर रही कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा हुआ है. वैसे कार्यकर्ता जो कांग्रेस में बेहद सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं, वह अपना पहचान बताने में भी संकोच महसूस करने लगे हैं. चुनावों के दौरान भाजपा आक्रमक तेवर में दिखती है. ऐसे वक्त में राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार करना होगा.
2. पार्टी में नये नेतृत्व की कमी – भाजपा ने अपने नेताओं की पूरी पीढ़ी ही बदल डाली. अमित शाह ने देवेंद्र फडणवीस, धर्मेंद्र प्रधान जैसे नेताओं को आगे कर भाजपा में नयापन लाने की कोशिश की. बिहार छोड़ प्राय : हर राज्य में भाजपा को नया नेतृत्व मिला. अगर बीजेपी की नयी पीढ़ी के नेताओं के उम्र पर नजर डालें तो आने वाले दो दशकों तक ये नेता राजनीति में सक्रिय रह सकते हैं. कांग्रेस में अब भी पुरानी पीढ़ी के नेता ही सक्रिय दिखते हैं. जो नये चेहरे हैं. उनके पास निर्णय लेने का अधिकार नहीं है. ऐसे देश जहां औसत आयु 40 से कम हो, वहां पुराने नेताओं के साथ चुनावी मैदान में जाना किसी जोखिम से कम नहीं हो सकता है.राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद संभव हो कांग्रेस में नयी पीढ़ी का नेतृत्व देखने को मिले.
3. कार्यकर्ता के बीच जाकर काम करने वाले नेताओं का आभाव: पार्टी थिंक टैंक किस्म के नेताओं से भरी – पड़ी है लेकिन जमीन पर जाकर काम करने वाले नेताओं का आभाव है. जयराम रमेश, पी चिदंबरम, अहमद पटेल जैसे तमाम बड़े नेता ड्राइंग रूमपॉलिटिक्सके माहिर खिलाड़ी हैं लेकिन चुनावी राजनीति में ये राजनेता भाजपा के मुकाबले पिछड़ते नजर आते हैं. पार्टी में क्षत्रपों की कमी है. राज्य स्तर पर नेतृत्व मजबूत नहीं रहने की वजह से पार्टी विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन का रिकार्ड कायम रहा है.
4. भाजपा का कांग्रेस के परंपरागत वोट पर सेंध : नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने वोटर का नया वर्ग तैयार किया है. दलित और आदिवासी वर्ग के वोटर में भाजपा ने पहुंच बनायी है. यही नहीं अमित शाह ने कई दलित व पिछड़े नेताओं की फौज तैयार कर दी है. आमतौर पर कांग्रेस का वोट बैंक दलित व आदिवासी वर्ग हुआ करता था. कांग्रेस को फिर से दलितों के वोट को अपने खेमे में खींचने के लिए नये नेता तैयार करने होंगे.
5. मोदी और अमित शाह की जोड़ी:राहुल गांधी कम उम्र के हैं. इसलिए उनके पास काफी वक्त है. राहुल गांधी की छवि विवादित नहीं रही है. उनके नेतृत्व कौशल को लेकर जरूर सवाल उठते रहे हैं लेकिन हाल ही के दिनों में उनके सक्रियता से कुछ उम्मीद जरूर जगी है.
इस लिहाज सेराहुल के पास स्पेस की कमी नहीं है. इन सबके बावजूद राहुल गांधी के सामने अमित शाह और मोदी की जोड़ी है, जो पार्टी को नये राज्यों तक ले जाने में सफल रहे हैं.
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