ePaper

बाहर से ज्यादा खतरनाक है घर के अंदर का प्रदूषण, बीमार हो रहे लोग

Updated at : 06 Jun 2019 8:14 AM (IST)
विज्ञापन
बाहर से ज्यादा खतरनाक है घर के अंदर का प्रदूषण, बीमार हो रहे लोग

फ्लैट कल्चर से सिमट रही जिंदगी, शुद्ध हवा के लिए तरस रहे लोग शहरी कल्चर और फ्लैट में सिमटती जिंदगी के बीच शुद्ध हवा के लिए लोगों को संघर्ष करना पड़ रहा है. फ्लैट के हवादार नहीं होने से लोग शुद्ध हवा को तरस रहे हैं. विशेषज्ञ भी यह मानते हैं कि घर के अंदर […]

विज्ञापन
फ्लैट कल्चर से सिमट रही जिंदगी, शुद्ध हवा के लिए तरस रहे लोग
शहरी कल्चर और फ्लैट में सिमटती जिंदगी के बीच शुद्ध हवा के लिए लोगों को संघर्ष करना पड़ रहा है. फ्लैट के हवादार नहीं होने से लोग शुद्ध हवा को तरस रहे हैं. विशेषज्ञ भी यह मानते हैं कि घर के अंदर का प्रदूषण बाहर के प्रदूषण से ज्यादा खतरनाक है. इसकी सबसे ज्यादा शिकार किचन में काम करनेवाली महिलाएं होती हैं. रिम्स के टीबी एंड चेस्ट विभाग के आंकड़ें की मानें, तो हर माह घरेलू प्रदूषण के करीब 40 नये मरीज इलाज के लिए ओपीडी मेें आते हैं.
रांची : विशेषज्ञों के अनुसार खाना पकाने के अलावा हानिकारक रसायनों व अन्य सामग्रियों के उपयोग से घर के अंदर की हवा खराब हो जाती है. यह बाहरी वायु प्रदूषण की तुलना में 10 गुना अधिक नुकसानदायक है. घरों में जगह की कमी के कारण हवा का आदान-प्रदान (वेंटिलेशन) नहीं होता है.
इससे फेफड़ों में संक्रमण सहित सांस की बीमारी होने की आशंका रहती है. पुणे स्थित चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक डॉ संदीप साल्वी ने बताया कि घर के अंदर के वायु की शुद्धता मापने का कोई मानक नहीं होता है. ऐसे में घर के अंदर के वायु प्रदूषण को हम अपने ऊपर होनेवाले प्रभाव से ही समझ सकते हैं.
डाॅ साल्वी ने बताया कि लोग अपने जीवन का अधिकांश घर की चाहरदीवारी में व्यतीत करते हैं. घर मेें रहने के अलावा ऑफिस में काम करने के लिए कमरों में बंद रहना पड़ता है. इससे शरीर को शुद्ध हवा नहीं मिलती है. हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने भी माना है कि लोगों के जीवन का 90 फीसदी समय घरों के अंदर व्यतीत होता हैं. वहीं 50 प्रतिशत से अधिक कामकाजी लोगों का समय आॅफिस में बीतता है. ऐसे लोगों को भी सांस की गंभीर बीमारी का खतरा रहता है.
फ्लोर क्लीनर और रूम फ्रेशनर भी खतरनाक
आॅर्किड के फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डाॅ निशीथ कुमार ने बताया कि घर के अंदर फ्लाेर क्लीनर व रूम फ्रेशनर भी बहुत खतराक है. इससे निकलने वाला रसायन वायु को प्रभावित करता है. इससे भी सांस की बीमारी होने की आशंका रहती है. इसके अलावा परफ्यूम व डियोड्रेंट भी सांस की समस्या का कारक है. अस्थमा व दमा के मरीजों को इससे बचना चाहिए.
घरेलू प्रदूषण से पीड़ितों में महिलाओं की संख्या ज्यादा
रिम्स के टीबी एंड चेस्ट विभाग के आंकड़ों की मानें तो घरेलू प्रदूषण से पीड़ित करीब 40 नये मरीज हर माह इलाज के लिए आते है. रिम्स के छाती रोग विशेषज्ञ डॉ ब्रजेश मिश्रा ने बताया कि घरेलू प्रदूषण के मामले में महिलाओं की संख्या ज्यादा होती है. यह मरीज घर मेें खेत के अवेशष को जलावन के रूप में उपयोग करने से प्रभावित होते है. वहीं, मल्टी स्टोरेज बिल्डिंग के निर्माण मेंं काम करने वाले मजदूर भी अस्थमा व सांस लेने की शिकायत लेकर आते हैं.
इसका रखें ख्याल
घर के खिड़की को सुबह-शाम खोलकर रखें, ताकि शुद्ध हवा का आदान-प्रदान हो
किचेन में एक की जगह दो या अधिक खिड़की बनवायें
खाना बनाते समय खिड़की खोल दें, किचेन का एक्जॉस्ट फैन चला दें
स्ट्रांग फ्लोर क्लीनर को प्रयाेग नहीं करें
दमा के मरीज परफ्यूम और डियोड्रेंट का उपयोग नहीं करें
घरेलू प्रदूषण भी खतरनाक है, क्योंकि खाना बनाने के दौरान जो धुंआ हमारे फेफड़ा तक पहुंचता है, वह नुकसान पहुंचाता है. फ्लैट में रहने वाले लोगों को सुबह-शाम खिड़की खोलकर रखना चाहिए, जिससे शुद्ध हवा घर में आ सके.
डॉ निशीथ कुमार, फेफड़ा रोग विशेषज्ञ, आॅर्किड
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola