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गोविंदपुर से शुरू हुई थी ब्लू रंग में ‘रॉक पेंटिंग’

Updated at : 10 Feb 2019 12:20 PM (IST)
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गोविंदपुर से शुरू हुई थी ब्लू रंग में ‘रॉक पेंटिंग’

रविशंकर उपाध्यायपटना : जब आदिमानव ने पेंटिंग की शुरुआत की तो उस वक्त बहुत ही कम विकल्प हुआ करते थे. कंदराओं में रहने वाले आदि मानवों ने पत्थरों पर पेंटिंग उकेरना शुरू किया. मध्य भारत में प्राग ऐतहासिक काल में लाल रंगों से रॉक पेंटिंग के शुरुआती प्रमाण मिले हैं लेकिन ब्लू रंग निर्माण और […]

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रविशंकर उपाध्याय
पटना : जब आदिमानव ने पेंटिंग की शुरुआत की तो उस वक्त बहुत ही कम विकल्प हुआ करते थे. कंदराओं में रहने वाले आदि मानवों ने पत्थरों पर पेंटिंग उकेरना शुरू किया. मध्य भारत में प्राग ऐतहासिक काल में लाल रंगों से रॉक पेंटिंग के शुरुआती प्रमाण मिले हैं लेकिन ब्लू रंग निर्माण और उससे शैल चित्र उकेरने के शुरुआत नवादा के गोविंदपुर में हुई थी.

इस पर लंबे समय तक अध्ययन करनेवाले देश के जाने माने पुरातत्वविद् डॉ एके प्रसाद कहते हैं कि शुरुआत में तो लोगों को यह जानकारी थी कि आदि मानव के द्वारा बनाये शैल चित्र केवल मध्य भारत में ही हैं लेकिन जब 1994 से अध्ययन की शुरुआत हुई तो पता चला कि मगध में शैल चित्र की समृद्ध परंपरा रही है. सबसे पहले प्राग ऐतिहासिक काल के शैल चित्र कौआकोल के रानीगदर जंगल में 26 जनवरी 94 को मिले और उसके बाद सरकंडा की पहाड़ियों में ब्लू रंग की रॉक पेंटिंग मिली तो यह हर्ष का विषय बन गया क्योंकि भारत में किसी अन्य जगह ब्लू रंग में रॉक पेंटिंग नहीं मिली है.

ये वह शैलचित्र हैं जो बिहार में निवास करने वाले आदि मानवों ने पत्थरों पर उकेरे थे. इसमें रंग भी थे और समझ के ढंग भी थे.

रंगों से निर्मित चित्रों की मात्रा ज्यादा
बिहार-झारखंड में शैल कला की विशेषत: रंगों से निर्मित चित्रों की प्रबलता है. सजावटी रूपांकन में दोनों ज्यामितीय और अमूर्त गुण देखे जा सकते हैं. शैल चित्र लाइम स्टोन पर और सैंड स्टोन पर ही ये बनाये गये हैं. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नयी दिल्ली के परियोजना निदेशक बीएल मल्ला ने बताया कि विश्व के शैल चित्र मानवीय प्रयासों की रोचक गाथा है, जिनके द्वारा मानव ने अपने सौंदर्य बोध को वास्तविक रूप देने का प्रयास किया. बिहार में भी उन्होंने प्राकृतिक कंदराओं और आश्रयणियों में निवास करते हुए चित्रों और नक्काशियों से सजाया-संवारा.

शैल चित्र कला परंपरा में विशिष्ट चित्रांकन का उदाहरण

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नयी दिल्ली ने अपने अध्ययन में यह बताया है कि बिहार के गया, नवादा, गोपालगंज, कैमूर और जमुई जिले में पुराने शैल चित्र मिले हैं. बिहार के शैल चित्र कला परंपरा में विशिष्ट चित्रांकन का उदाहरण है. यह परंपरा कैमूर जिले के विंध्य क्षेत्र में और नवादा जिले से मिले हैं. इसके अतिरिक्त जमुई जिले से भी चित्रित शैलाश्रयों की प्राप्ति हुई है. राष्ट्रीय कला केंद्र के मुताबिक पूर्वी भारत के शैलचित्र कला में बिहार और झारखंड का स्थान महत्वपूर्ण है. इनमें विषय पर आधारित प्रेरक और शैलीगत लक्षणों को दिखाया गया है. यहां तक कि ये मुख्यत: मध्य भारत की शैलचित्र कला से भी अलग हैं. इनमें विषय वस्तु में प्रमुख रूप से प्रतीकों, ज्यामितीय संकेतों, जटिल संरचनाओं और कर्मकांड के दृश्य दिखाये गये हैं. दोनों राज्यों में शुभ अवसरों पर अपने घरों की दीवारों पर स्वतंत्र रूप से चित्रण करने की परंपरा है. इन चित्रों में भी वही रूपांकन दिखाई देते हैं जो चित्रण शैल कला पुरास्थलों पर दिखाई देते हैं.

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