प्रीमेच्योर बर्थ से हो सकती है लैक्टोज इन्टॉलरेंस, इस दूध का करें उपयोग

Updated at : 27 Jan 2018 5:46 AM (IST)
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प्रीमेच्योर बर्थ से हो सकती है लैक्टोज इन्टॉलरेंस, इस दूध का करें उपयोग

लैक्टोज प्राकृतिक शूगर है, जो दूध एवं दूध से बनी चीजों में पाया जाता है. हमारे शरीर के छोटी आंत में अधिकतर पोषक तत्वों का पाचन एवं अवशोषण होता है. इसी अंग से लैक्टोज एंजाइम स्रावित होता है, जो लैक्टोज शूगर को ग्लूकोज एवं गैलेक्टोज में तोड़ता है और शरीर में अवशोषित होता है. जब […]

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लैक्टोज प्राकृतिक शूगर है, जो दूध एवं दूध से बनी चीजों में पाया जाता है. हमारे शरीर के छोटी आंत में अधिकतर पोषक तत्वों का पाचन एवं अवशोषण होता है. इसी अंग से लैक्टोज एंजाइम स्रावित होता है, जो लैक्टोज शूगर को ग्लूकोज एवं गैलेक्टोज में तोड़ता है और शरीर में अवशोषित होता है.

जब दूध या उससे बनी चीजें हजम नहीं होती हैं, तो उसे लैक्टोज इन्टॉलरेंस कहते हैं. इससे पेट में दर्द, सूजन, पेट फूलने, उल्टी, दस्त, खाना न पचना जैसी समस्या भी हो सकती हैं. यह समस्या ज्यादातर बच्चों में देखी जाती है, लेकिन कभी-कभी बड़े लोगों को पेट की बीमारी के उपचार के बाद समस्या हो जाती है.

लैक्टोज इन्टॉलरेंस तीन तरह के होते हैं- पहला, जन्मजात. ऐसी स्थिति में लैक्टोज एंजाइम का निर्माण नहीं हो पाता, यह जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है. दूसरा है डेवलपमेंटल लैक्टोज इन्टॉलरेंस, यह वैसे बच्चों को होता है, जो प्रीमेच्योर पैदा होते हैं. तीसरा कंडीशन होता है सेकेंडरी लैक्टोज इन्टॉलरेंस, जो आंत में किसी कारण से चोट लग जाने की वजह से होती है. इसके उपचार के बाद यह समस्या ठीक हो जाती है.

30 मिनट में ही शुरू हो जाती है इन्टॉलरेंस से परेशानी

दूध कैल्शियम का मुख्य स्रोत है और हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है. कैल्शियम हड्डियों द्वारा अवशोषित हो, इसके लिए विटामिन-डी जरूरी है. लैक्टोज इन्टॉलरेंस के मामले में इसके लक्षण दूध लेने के 30 मिनट से दो घंटे के अंदर उत्पन्न हो जाती है.

इनके अलावा लैक्टोज इन्टॉलरेंस में मरीज को कैल्शियम और विटामिन-डी की कमी भी हो जाती है, क्योंकि उन्हें यह समुचित मात्रा में नहीं मिल पाती. वैसे मरीज जो कैल्शियम सहित भोजन या सप्लीमेंट नहीं लेते, उन्हें इसकी कमी हो जाती है. लैक्टोज इन्टॉलरेंस के मरीज को पूरी तरह से दूध एवं दूध से बनी चीजों को अवायड करने की जरूरत नहीं, क्योंकि इससे शरीर में कैल्शियम एवं विटामिन डी की कमी हो जाती है.

थोड़ी मात्रा में इन्टॉलरेंस के बावजूद लैक्टोज का पाचन हो जाता है. मरीज को दूध, खोया, मिल्क ब्रेड, क्रीम बिस्कुट, क्रीमयुक्त सूप, क्रीमयुक्त सब्जियां, मिठाई, चॉकलेट, खोये की मिठाई, दूध से बनी पुडिंग, आइसक्रीम इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए. रिसर्च में सिद्ध हो चुका है कि वयस्क एवं बच्चों को प्रतिदिन 12 ग्राम लैक्टोज बिना किसी लक्षण या थोड़ी लक्षण के साथ ले सकते हैं.

यह लैक्टोज हमें एक कप दूध से मिल सकता है. ऐसे मरीजों को डेयरी उत्पादों में तालमेल बिठाने की जरूरत होती है. दही लेना चाहिए. इसमें लैक्टोज तो होता है, लेकिन यह पचने में आसान होता है. घर में बने दही में लैक्टोज की मात्रा कम होती है. टोंड दूध यानी क्रीम रहित दूध से बेहतर है कि फुल क्रीम दूध का सेवन करें. फुलक्रीम दूध में मौजूद वसा दूध में मौजूद शूगर को धीरे-धीरे पचाने में सहायक होती है.

इसके अलावा पनीर का सेवन कर सकते हैं. इसमें लैक्टोज की मात्रा कम होती है. ऐसे मरीज दूध एवं दूध से बनी चीजों को अनाज के साथ ले सकते हैं. कैल्शियम की कमी को पूरा करने के लिए कैल्शियम सप्लीमेंट या अन्य भोजन जिससे कैल्शियम की पूर्ति हो सके लेनी चाहिए.

सोया दूध का करें उपयोग

सोयाबीन द्वारा निर्मित दूध और अन्य पदार्थों में लैक्टोज नहीं पाया जाता है. इसलिए इससे निर्मित खाद्य पदार्थ ऐसे लोगों के लिए बहुत ही लाभदायक होते हैं, जो लैक्टोज एंजाइम की कमी के कारण दूध एवं दूध से बनी चीजों का सेवन नहीं कर पाते हैं.

कैल्शियम एवं विटामिन डी की कमी को पूरा करने के लिए अनय स्रोतों से पोषक तत्वों को प्राप्त किया जाना चाहिए. मीट, मेवा, मछली, हरी सब्जियां, बाजरा, ज्वार आदि में कैल्शियम और विटामिन डी की मात्रा पूरी की जा सकती है.

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