भावनात्मक कमजोरी से पर्सनैलिटी पर पड़ता है फर्क

Updated at : 16 Jul 2017 1:27 PM (IST)
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भावनात्मक कमजोरी से पर्सनैलिटी पर पड़ता है फर्क

आज हमें जितनी सुविधाएं उपलब्ध हैं, उतनी पहले कोई सोच भी नहीं सकता था. घर, कार, भोजन, डॉक्टर आदि सब कुछ मात्र एक क्लिक पर मौजूद है. फिर भी लोग उदास हैं. उनमें आत्म-संतुष्टि का अभाव है. स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, वैवाहिक जीवन कहीं भी, किसी भी जगह व्यक्ति संतुष्ट नहीं है. हर जगह वह स्ट्रेस […]

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आज हमें जितनी सुविधाएं उपलब्ध हैं, उतनी पहले कोई सोच भी नहीं सकता था. घर, कार, भोजन, डॉक्टर आदि सब कुछ मात्र एक क्लिक पर मौजूद है. फिर भी लोग उदास हैं. उनमें आत्म-संतुष्टि का अभाव है. स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, वैवाहिक जीवन कहीं भी, किसी भी जगह व्यक्ति संतुष्ट नहीं है. हर जगह वह स्ट्रेस और टेंशन का अनुभव करता है. इस वजह से अकसर वह किसी काम को अपना 100% नहीं दे पाता. आखिर क्यों? कोई मानसिक बीमारी नहीं, कोई शारीरिक तकलीफ नहीं, फिर ऐसा क्यों?

बिना किसी वजह के भी परेशान होने का मतलब है कि इनसान इमोशनली वीक है. वह अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पा रहा. जो लोग इमोशनली स्ट्रॉन्ग होते हैं, वे अपनी भावनाओं से भली-भांति अवगत होते हैं. परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों, वे उन्हें नकारने के बजाय स्वीकार करने की हिम्मत रखते हैं. वे इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि दुख-सुख, समस्याएं, चुनौतियां और निराशा आदि तो हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा हैं. ये अगर न हों, तो जीवन में एक अजीब-सी नीरसता न छा जाये.

क्यों होते हैं इमोशनली वीक : हमारे इमोशनल हेल्थ को प्रभावित करनेवाले कारकों में जॉब छूट जाना, तलाक होना, किसी करीबी की मृत्यु होना, जॉब प्रमोशन न होना, संतान की कमी, घर छूटना, जीवनसाथी से अनबन आदि प्रमुख हैं. हम जो कुछ भी करते, देखते, सुनते या महसूस करते हैं, उन असर हमारे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ पर पड़ता है. हमारे मन और शरीर एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं. यही कारण है कि मानसिक परेशानी की वजह से पेट में अल्सर, रक्तचाप अस्थिरता, माइग्रेन, किसी तरह का दर्द आदि समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं.

कैसे बनाएं खुद को स्ट्रॉन्ग : सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम अपनी भावनाओं को पहचानना सीखें. उसके कारणों, दु:ख, चिंता, तनाव को समझ कर जीवन में उसे किस रूप में अपनाना है, इस पर ध्यान केंद्रित करें. अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सीखें. अगर आपको किसी भी तरह की उदासी, दुख, कष्ट या तनाव हो, तो उसे अपने तक रखने के बजाय किसी मित्र या परिजन से शेयर करें. इससे बेहतर महसूस करेंगे. अगर तनाव या दुख की वजह से आपकी दिनचर्या प्रभावित हो रही हो, तो किसी काउंसेलर से परामर्श करने से भी न हिचकें. याद रखें, मन स्वस्थ रहेगा, तभी आप तन को भी स्वस्थ रख पायेंगे.

संतुलन बनाना सीखें : अपने जीवन के सभी पहलूओं पर ध्यान देने की कोशिश करें. जो आपके पास नहीं है, उसके लिए अफसोस करने के बजाय जो है, उसके लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा करें. परेशानियों को खुद पर हावी न होने दें. उनके बारे में सोचना बंद कर दें. आपके परेशान होने से वे खत्म नहीं होंगी. बेहतर होगा खुद को किसी काम में व्यस्त रखें. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि आप अपनी भावनाओं से दूर भागने की कोशिश करें. आपको उन्हें स्वीकार करना सीखना है. सकारात्मक नजरिया अपनाते हुए जीवन की हर परिस्थिति का सामना करना है.

मेघना गुप्ता

चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट अहमदाबाद

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