सुअर के स्कीन से चमत्कार, 20 मरीजों की लौटी रोशनी, जानें कैसे हुआ संभव

Published by : Agency Updated At : 13 Aug 2022 2:12 PM

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अनुसंधान दल से जुड़े स्वीडन स्थित लिनकोपिंग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नील लगाली ने कहा कि नतीजे दर्शाते हैं कि एक ऐसी जैविक सामग्री को विकसित करना मुमकिन है, जो मनुष्यों में प्रतिरोप‍ण से जुड़े सभी मापदंडों पर खरी उतरती है.

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सुअर की त्वचा से तैयार कॉर्निया ‘इम्प्लांट’ से भारत और ईरान के 20 मरीजों के आंखों की रोशनी लौटाने में सफलता मिली है. कॉर्निया के प्रतिरोपण से जुड़ी सर्जरी से पहले इनमें से अधिकतर मरीज दृष्टिहीन थे. अंतरराष्ट्रीय अनुसंधानकर्ताओं के एक दल‍ ने मरीजों में मानव डोनर से प्राप्त कॉर्निया की जगह सुअर की त्वचा से तैयार कॉर्निया ‘इम्प्लांट’ का प्रत्यारोपण किया. इस दल में एम्स दिल्ली के अनुसंधानकर्ता भी शामिल थे.

इस कामयाबी से कॉर्निया (आंखों की पुतली की रक्षा करने वाला सफेद कठोर भाग) में विकार के चलते दृष्टिहीनता या कम रोशनी की शिकायत से जूझ रहे मरीजों के लिए उम्मीद की नयी किरण जगी है. यह अनुसंधान ‘जर्नल नेचर बायोटेक्नोलॉजी’ में कल प्रकाशित किया गया है.

अनुसंधान दल से जुड़े स्वीडन स्थित लिनकोपिंग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नील लगाली ने कहा कि नतीजे दर्शाते हैं कि एक ऐसी जैविक सामग्री को विकसित करना मुमकिन है, जो मनुष्यों में प्रतिरोप‍ण से जुड़े सभी मापदंडों पर खरी उतरती है, जिसका बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता है और जिसे दो साल तक सहेजकर रखा जा सकता है. इस तरह दृष्टि संबंधी समस्याओं से जूझ रहे अधिक लोगों की सहायता करना संभव है. लगाली के अनुसार, यह अनुसंधान प्रतिरोपण के लिए कॉर्निया के ऊत्तकों की कमी की समस्या से निपटने और आंखों के अन्य रोगों का उपचार विकसित करने में सहायक साबित होगा.

दो साल में पूरी तरह लौट आयी दृष्टि

अनुसंधानकर्ताओं का दावा है कि सर्जरी में कोई जटिलता नहीं आयी. मरीज का शरीर बाहरी ऊत्तकों को शीघ्र स्वीकार करने लगा. महज आठ सप्ताह तक प्रतिरोधक क्रिया को दबाने वाले ‘आई-ड्रॉप’ डालने से ‘इम्प्लांट’ के खारिज होने का खतरा टल गया. प्रतिरोपण के दो साल के भीतर सभी प्रतिभागियों की दृष्टि लौट आयी.

कैसे हुआ संभव

कॉर्निया में मुख्य रूप से प्रोटीन कोलाजन पाया जाता है. मानव कॉर्निया का विकल्प तैयार करने के लिए अनुसंधानकर्ताओं ने सुअर की त्वचा से प्राप्त कोलाजन के अणुओं का उपयोग किया. इन अणुओं को अति कठिन परिस्थितियों में उच्च शुद्धीकरण की प्रक्रिया से गुजारा गया. मानव डोनर से प्राप्त कॉर्निया का जहां दो सप्ताह के भीतर इस्तेमाल होना जरूरी है, वहीं सुअर की त्वचा से तैयार कॉर्निया को दो वर्ष तक सहेजकर रखा जा सकता है. पायलट परीक्षण में केराटोकोनस के कारण आंखों का प्रकाश गंवा चुके या रोशनी खोने की कगार पर पहुंचे 20 रोगियों में सुअर की त्वचा से तैयार कॉर्निया ‘इम्प्लांट’ प्रतिरोपित किया गया.

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