Manoj Bajpayee :गवर्नर में अर्थशास्त्री बना हूं रियल लाइफ में गणित में मुश्किल से होता था पास

Published by : Urmila Kori Updated At : 13 Jun 2026 5:40 PM

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गवर्नर फिल्म पर मनोज बाजपेयी, फोटो- इंस्टाग्राम

अभिनेता मनोज बाजपेयी ने इस इंटरव्यू अपनी हालिया रिलीज फिल्म गवर्नर पर बातचीत की है

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manoj bajpayee :रुपहले पर्दे पर अनसंग हीरोज की कहानियों में बीते 12 जून से फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ के साथ एक नया नाम जुड़ चुका है. यह फिल्म पूर्व आरबीआइ गवर्नर एस वेंकटरमणन के जीवन से प्रेरित है. उनके साहसिक और जोखिम भरे फैसलों की कहानी को बड़े पर्दे पर अभिनेता मनोज बाजपेयी साकार करते नजर आयेंगे. ‘गवर्नर’ की भूमिका और फिल्म से जुड़े दूसरे पहलुओं पर मनोज बाजपेयी की उर्मिला कोरी से हुई बातचीत .

घटना को जाना तो लगा बहुत जोखिम भरा कदम था

मैंने जब इस कहानी को सुना कि 90 के दशक में आरबीआई के गवर्नर के तौर पर वेंकिटरमनन ने जो कदम उठाए थे.वह साहसी से ज्यादा बहुत जोखिम भरा था लेकिन उन्हें अंदर से पता था कि इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है. जब रिज़र्व खाली हो जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से आप अपनी बचत की ओर देखते हैं. यहाँ तक कि एक माँ भी संकट के समय अपने गहने बेच देती है. उनकी परवरिश इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर हुई थी और उन्होंने तय किया कि वे देश को भी इसी तरह बचाएंगे. इस संकट के समय कोई भी उनके साथ खड़ा नहीं था। कोई भी ऐसा जोखिम नहीं उठा सकता, लेकिन वे मजबूर थे. उन्हें राजनेताओं को मनाना था. गांधीजी ने उनकी सिफारिश की थी और मनमोहन सिंह ने भी इसे मंज़ूरी दी थी. इतना बड़ा कदम उठाना और मीडिया को पता चले बिना सोना विदेश भेजना बहुत जोखिम भरा काम था.

किसी गवर्नर नहीं मिला

किरदार की तैयारियों में जहाँ तक गवर्नर से मिलने की बात है तो मैं आरबीआई के किसी भी अधिकारी से नहीं मिला. रेफरेंस के लिए मैंने कुछ वीडियो देखे थे और जानकारी पढ़ी थी. जब मैं दिल्ली में पढ़ाई कर रहा था, तब आईएएस और आईपीएस में मेरे कई दोस्त थे, जिनसे मुझे काफी जानकारी मिली. वे अपनी ऑफिशियल और पर्सनल समस्याओं को कैसे संभालते हैं?

जब मधु ने मुझसे ये शिकायत की

एस वेंकिटारमनन जैसे अनसंग हीरो को पर्दे पर निभाते हुए मैं सेट पर भी बहुत सीरियस था. ऐसा काम बहुत मेरी फिल्मों के सेट पर होता है. जो मेरे साथ काम करते हैं.वह इस बात को जानते हैं लेकिन इस फिल्म के लिए मुझे करना पड़ा.इस साथ मैं पुलिस स्टेशन में भूत की भी शूटिंग कर रहा था. उसमें मेरे अपोजिट राम्या कृष्णन हैं। राम्या और मधु अच्छे दोस्त हैं। उन्होंने बताया होगा कि उस सेट पर मैं हंसी रहता हूँ। मधु ने मुझसे इस बारे में पूछा कि क्यों आप इस सेट पर इतना सीरियस रहते हैं। हम पहली बार साथ में काम कर रहे हैं इसलिए। जिसे सुनने के बाद मैं हंसने लगा और फिर मैंने उन्हें बताया कि क्यों सेट सीरियस रहता हूँ.

आरबीआइ गवर्नर की भूमिका के लिए सीखा अर्थशास्त्र का पाठ

इस फिल्म में मैं पहली बार साउथ इंडियन की भूमिका में हूं लेकिन भाषा पर कम इकोनॉमिक्स पर ज्यादा मेहनत करनी पड़ी. मैं इकोनॉमिक्स का छात्र नहीं हूं. मैंने इतिहास में ऑनर्स किया है और गणित में मुश्किल से पास होता था, फिजिक्स तो मेरा सबसे खराब विषय था, इसलिए जब मुझे यह भूमिका ऑफर हुई, तो मैंने यह सुनिश्चित किया कि मुझे विषय का बुनियादी ज्ञान हो, मैंने जीडीपी, फिजिकल डैफिसिट या पेमेंट ऑफ बैलेंस के बारे में सीखा. इस प्रकार, जब आप किसी विषय पर लगातार काम करते हैं, तो ज्ञान बढ़ता है, आप उसके शारीरिक हावभाव को समझने की कोशिश करते हैं, क्योंकि यह आपकी मानसिक स्थिति को दर्शाता है. इस तरह, किरदार के साथ आपका पूरा सफर शुरू हो चुका होता है. मेरे साथ भी यही हुआ

आखिरी वक्त में हुई निर्देशक चिन्मय की एंट्री

फिल्म के निर्देशक चिन्मय आखिरी समय में इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बने थे. निर्माता विपुल अमृतलाल शाह ने मुझे करीब साढ़े चार साल पहले इस फिल्म की स्क्रिप्ट दी थी. मुझे स्क्रिप्ट बहुत पसंद आयी, लेकिन मुझे इस बात का संशय था कि मैं एक इकोनॉमिस्ट और आरबीआइ गवर्नर की भूमिका को कैसे निभा पाऊंगा? मैंने स्क्रिप्ट के दो-तीन ड्राफ्ट पढ़े. इसके बाद विपुल जी ने मुझसे कहा कि वह फिल्म बनाने के लिए तैयार हैं और मुझे भी इसके लिए तैयार रहना चाहिए. मैंने उनसे पूछा कि फिल्म का निर्देशन कौन करेगा, क्या आप खुद निर्देशन करेंगे? उन्होंने कहा, ‘नहीं.’ तब मैंने उनसे कहा कि मैं आपको एक निर्देशक से मिलवाता हूं. मैंने उनके साथ फिल्म ‘इंस्पेक्टर झेंडे’ की है, जो जल्द ही रिलीज होने वाली है. चिन्मय सिर्फ एक अच्छे निर्देशक ही नहीं, बल्कि बेहतरीन अभिनेता भी हैं. तीन महीने के भीतर उन्होंने फिल्म पर गहन रिसर्च की और लेखकों के साथ बैठकर स्क्रिप्ट का एक नया ड्राफ्ट तैयार किया. उनके सुझावों से विपुल जी भी हैरान रह गये थे.

आर्थिक संकट से देश को विशेषज्ञ ही बाहर निकाल सकते हैं

मुझे लगता है कि यह फिल्म आज के दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक है. मौजूदा हालात कई मायनों में उस समय से मिलते-जुलते हैं. युद्ध का संकट, क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें और गिरता हुआ रुपया, ये सभी विषय एक बार फिर सामयिक हो गये हैं. यही वजह है कि यह फिल्म भी आज के समय में बेहद प्रासंगिक लगती है और लोग इससे खुद को ज्यादा जोड़ पायेंगे. आम आदमी अपने खर्चों को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन इस तरह के आर्थिक संकटों से देश को बाहर निकालने का काम नौकरशाह और विशेषज्ञ करते हैं. ऐसे समय में कई बार राजनेताओं से भी ज्यादा महत्वपूर्ण ब्यूरोक्रेट्स हो जाते हैं. वे अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं. उन्हें पता होता है कि मुश्किल हालात से निकलने के क्या रास्ते हैं? वे सरकार को एक-दो नहीं, बल्कि चार-पांच विकल्प देते हैं, जिसके बाद सरकार कोई फैसला लेती है.


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Urmila Kori

लेखक के बारे में

By Urmila Kori

I am an entertainment lifestyle journalist working for Prabhat Khabar for the last 14 years. Covering from live events to film press shows to taking interviews of celebrities and many more has been my forte. I am also doing a lot of feature-based stories on the industry on the basis of expert opinions from the insiders of the industry.

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