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Film Review: फिल्‍म देखने से पहले जानें कैसी है ''जवानी जानेमन''

Updated at : 31 Jan 2020 2:26 PM (IST)
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Film Review: फिल्‍म देखने से पहले जानें कैसी है ''जवानी जानेमन''

II उर्मिला कोरी II फ़िल्म: जवानी जानेमन निर्देशक: नितिन कक्कड़कलाकार : सैफ अली खान,तब्बू,अलाया फर्नीचरवाला, चंकी पांडेय, कुमुद मिश्रा और अन्यरेटिंग : ढाई पिता और बेटी के रिश्ते पर बनी फिल्मों में ‘जवानी जानेमन’ आधुनिक फ़िल्म है. यहां बेटी अपनी मां को बताती है कि उसका पिता कौन है. फ़िल्म गुदगुदाने के साथ-साथ यह संदेश […]

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II उर्मिला कोरी II

फ़िल्म: जवानी जानेमन
निर्देशक: नितिन कक्कड़
कलाकार : सैफ अली खान,तब्बू,अलाया फर्नीचरवाला, चंकी पांडेय, कुमुद मिश्रा और अन्य
रेटिंग : ढाई

पिता और बेटी के रिश्ते पर बनी फिल्मों में ‘जवानी जानेमन’ आधुनिक फ़िल्म है. यहां बेटी अपनी मां को बताती है कि उसका पिता कौन है. फ़िल्म गुदगुदाने के साथ-साथ यह संदेश भी देती है कि मौजूदा दौर में लोग जिम्मेदारी और परिवार से भागते हैं लेकिन आखिर में अपनी ज़िन्दगी में वो भी अकेलापन नहीं चाहते हैं.

फ़िल्म की कहानी 40 प्लस जैज उर्फ जस्सी (सैफ)की है जो शादी और परिवार की जिम्मेदारियों को नहीं लेना चाहता है. उसके लिए ज़िन्दगी का मतलब पार्टी, दारू और हर दिन एक नयी लड़की के साथ होना है.

जैज अपने इस बेफिक्र और बिंदास ज़िन्दगी से बहुत खुश है लेकिन अच्छा 21 वर्षीय टिया (आलिया फर्नीचरवाला) की उसकी जिंदगी में एंट्री होती है. जैज़ को मालूम पड़ता है कि टिया उसकी बेटी है. कहानी में सिर्फ यही ट्विस्ट नहीं है. जैज़ को मालूम पड़ता है कि वो नाना बनने वाला है. अपनी प्रेग्नेंट बेटी का क्या बिंदास जैज़ ख्याल रख पाएगा. क्या वह इस जिम्मेदारी को निभाएगा. यही बात फ़िल्म की आगे की कहानी में बुनी गयी है.

फ़िल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ा स्लो है. कहानी दूसरे हाफ में रफ्तार पकड़ती है. फ़िल्म की कहानी प्रेडिक्टेबल और पहले से सारे ट्विस्ट खुल जाते है लेकिन जिस तरह से इसे प्रस्तुत किया है वो ज़रूर रोचक है. जिस वजह से फ़िल्म आपको शुरुआत से अंत तक बांधे रखती है. फ़िल्म में कई संदेश भी छिपे हैं. फ़िल्म प्यार,परिवार, भरोसे और जिम्मेदारी की बात करती है लेकिन फ़िल्म का एक कमज़ोर पहलू ये भी फ़िल्म अपने ट्रीटमेंट की वजह से अर्बन दर्शकों तक सीमित रह सकती है.

अभिनय की बात करें तो सैफ अली खान पूरी तरह जैज़ के किरदार में रच बस गए हैं. अपने पूरे स्वैग के साथ उन्होंने अपने किरदार को जिया है. आलिया की तारीफ करनी होगी. उन्होंने बहुत ही आत्म्विश्वास के साथ अपने किरदार को जिया है. उन्हें परदे पर देखकर एक बार भी नहीं लगता कि ये उनकी डेब्यू फिल्म है. हां उन्हें थोड़े अपने हिंदी उच्चारण पर काम करने की जरुरत थी.

फ़िल्म में तब्बू कुछ ही दृश्यों में नज़र आयी हैं हालांकि वे हमेशा की तरह मनोरंजक रही है लेकिन उतनी छोटी भूमिका में उनको देखना खलता है. कुबरा,चंकी और कुमुद मिश्रा ने अपने हिस्से की भूमिका बखूबी निभायी है. गीत संगीत की बात करें तो फ़िल्म में गाने तो बहुत सारे हैं लेकिन उनपर मेहनत नहीं की गयी है. जिस वजह से वो कब आए गए पता नहीं चलता है. फ़िल्म के संवाद अच्छे बन पड़े हैं जो कहानी को मनोरंजक बनाते हैं. सिनेमाटोग्राफी अच्छी है.

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